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    सूरए हज, आयतें 77-78, (कार्यक्रम 606)

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    आइये पहले सूरए हज की आयत क्रमांक 77 की तिलावत सुनें।
    يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آَمَنُوا ارْكَعُوا وَاسْجُدُوا وَاعْبُدُوا رَبَّكُمْ وَافْعَلُوا الْخَيْرَ لَعَلَّكُمْ تُفْلِحُونَ (77)
    हे ईमान लाने वालो! रुकू करो, सजदा करो और अपने पालनहार की उपासना करो और भलाई करो ताकि तुम्हें कल्याण प्राप्त हो जाए। (22:77)
    सूरए हज की अंतिम आयतों में ईश्वर, ईमान वालों को संबोधित करते हुए उपासना, शिष्टाचार, नैतिकता और सामाजिक मामलों के संबंध में कुछ मूल आदेश बयान करता है। यह आयत उनमें से कुछ की ओर संकेत करती है जबकि कुछ अन्य का उल्लेख अगली आयत में किया गया है। इस आयत के आरंभ में नमाज़ के दो मुख्य आधार समझे जाने वाले रुकू व सजदे की ओर विशेष रूप से बल दिया गया है। इसके बाद सार्वजनिक रूप से ईश्वर की उपासना की बात कही गई है कि जिसमें सभी उपासनाएं और धार्मिक कर्तव्य शामिल होते हैं।
    अलबत्ता क़ुरआने मजीद में इबादत या उपासना दो अर्थों में वर्णित हुई है। नमाज़ अदा करना, रोज़ा रखना और हज करना ऐसी विशेष उपासनाएं हैं जिनका ईश्वर ने विशेष रूप से उल्लेख किया है और उन्हें अदा करने की शैली का वर्णन किया है। ये उपासनाएं सभी ईमान वालों के लिए अनिवार्य हैं।
    किंतु ईश्वर की उपासन कुछ विशेष स्थानों और समय तक सीमित नहीं हैं बल्कि मानव जीवन का हर क्षण ईश्वर की बंदगी में गुज़रना चाहिए। जो व्यक्ति ईश्वर पर ईमान रखता है उसे कार्य के समय भी आर्थिक मामलों में ईश्वरीय आदेशों का पालन करना चाहिए। अन्य धर्मों के विपरीत इस्लाम में ईश्वर का स्थान केवल मस्जिद या उपासना स्थल तक सीमित नहीं है बल्कि ईश्वर हमारे कार्यस्थल सहित हर स्थान पर मौजूद है।
    मुस्लिम छात्र को ज्ञानार्जन के दौरान, कॉलेज, विश्वविद्यालय और कक्षा में ईश्वर को उपस्थित समझना चाहिए। उसे ऐसा ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए जो उसके तथा समाज के लिए लाभदायक हो। उसे बुद्धि तथा धार्मिक शिक्षाओं के सहारे अपनी आंख, कान और ज़बान को नियंत्रित करना चाहिए और उन्हें वासनाओं तथा आंतरिक इच्छाओं के हवाले नहीं करना चाहिए कि यह उसके लिए अत्यंत हानिकारक है।
    मुस्लिम महिला को भी स्वयं को फ़ैशन वाले वस्त्रों व गहनों की नहीं अपितु ईश्वर की दासी तथा मानवीय प्रतिष्ठा व मान-मर्यादा से सुसज्जित समझना चाहिए क्योंकि फ़ैशन और नए नए गहनों, वस्त्रों इत्यादि का शौक़ उपभोगवाद, अपव्यय और अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा का कारण बनता है और समाज में नग्नता व उच्छृंखलता को प्रचलित करता है।
    वास्तव में यह अन्याय है कि हमारे दिन-रात के चौबीस घंटों के समय में से ईश्वर का भाग केवल लगभग आधे घंटे और वह भी अनिवार्य नमाज़ पढ़ने के लिए हो और जीवन के अन्य समय में दयालु व कृपालु ईश्वर का कोई स्थान न हो। यही कारण है कि आगे चल कर आयत एक महत्वपूर्ण विषय की ओर संकेत करती है और वह यह कि ईमान वाले व्यक्ति को सदैव ही भले कर्म करने चाहिए और अन्य लोगों के साथ भलाई और उनकी सेवा करने का प्रयास करना चाहिए। यदि कोई अपने दायित्वों का पालन करता है, धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करता है और भले कर्म करता है तो उसे कल्याण व सौभाग्य प्राप्त होगा।
    इस आयत से हमने सीखा कि यद्यपि नमाज़ सबसे बड़ी उपासना और धार्मिक कर्तव्य है किंतु उसे अदा करना संपूर्ण ईमान नहीं अपितु ईमान का एक भाग है।
    रचयिता की उपासना, रचनाओं की सेवा के साथ होनी चाहिए ताकि मुक्ति व कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो जाए।
    आइये अब सूरए हज की आयत क्रमांक 78 की तिलावत सुनें।
    وَجَاهِدُوا فِي اللَّهِ حَقَّ جِهَادِهِ هُوَ اجْتَبَاكُمْ وَمَا جَعَلَ عَلَيْكُمْ فِي الدِّينِ مِنْ حَرَجٍ مِلَّةَ أَبِيكُمْ إِبْرَاهِيمَ هُوَ سَمَّاكُمُ الْمُسْلِمِينَ مِنْ قَبْلُ وَفِي هَذَا لِيَكُونَ الرَّسُولُ شَهِيدًا عَلَيْكُمْ وَتَكُونُوا شُهَدَاءَ عَلَى النَّاسِ فَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآَتُوا الزَّكَاةَ وَاعْتَصِمُوا بِاللَّهِ هُوَ مَوْلَاكُمْ فَنِعْمَ الْمَوْلَى وَنِعْمَ النَّصِيرُ (78)
    और ईश्वर के मार्ग में जेहाद करो जैसा कि जेहाद करने का हक़ है। उसने तुम्हें चुना और धर्म के मामले में तुम पर कोई कठिनाई नहीं रखी। यह तुम्हारे पिता इब्राहीम का ही पंथ है (तो इसका पालन करो)। उसने इससे पहले और इस किताब में तुम्हारा नाम मुस्लिम (अर्थात आज्ञाकारी) रखा ताकि पैग़म्बर तुम पर गवाह रहें और तुम लोगों पर गवाह रहो। तो नमाज़ क़ाएम करो, ज़कात दो और ईश्वर (के सहारे) को मज़बूती से पकड़े रहो कि वही तुम्हारा स्वामी है। तो वह क्या ही अच्छा स्वामी है और क्या ही अच्छा सहायक है। (22:78)
    यह आयत, कि जो सूरए हज की अंतिम आयत है, पिछली आयत के क्रम को जारी रखते हुए ईमान वालों के समक्ष ईश्वर के कुछ अन्य आदेशों का उल्लेख करती है। आरंभ में आयत कहती है कि अब जब ईश्वर ने तुम्हें चुन लिया है अपने पैग़म्बर के माध्यम से तुम्हारा मार्गदर्शन कर दिया है तो उसके मार्ग में प्रयासरत रहो और ईमान को सुदृढ़ बनाने एवं धर्म के प्रचार व प्रसार के अपने दायित्व का पालन करो। अलबत्ता इस मार्ग में जो बात महत्वपूर्ण है वह कर्म में निष्ठा और हर कर्म को केवल ईश्वर के लिए अंजाम देना है।
    इस आयत में प्रयोग होने वाला जेहाद का शब्द काफ़िरों से जेहाद के अर्थ में भी है और अपनी आंतरिक इच्छाओं से संघर्ष के अर्थ में भी है। इस्लामी इतिहास के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम जब एक युद्ध से वापस लौट रहे थे तो उन्होंने अपने साथियों से कहा कि हम छोटे जेहाद से वापस लौट आए और अभी बड़ा जेहाद बचा हुआ है। उनसे पूछा गया कि बड़ा जेहाद क्या है? तो उन्होंने कहा कि अपने आपसे जेहाद।
    आगे चलकर आयत कहती है कि ईश्वर ने इस्लाम धर्म और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पंथ को तुम्हारे लिए चुना है कि जिसमें कोई भी कठिन दायित्व नहीं है। इसके सभी दायित्व मनुष्य की प्रवृत्ति और लोगों की क्षमता के अनुकूल हैं। उदाहरण स्वरूप नमाज़ एक साधारण एवं सरल धार्मिक दायित्व है। इसमें इतनी लचक है कि यदि कोई बीमार व्यक्ति उठने और बैठने में अक्षम हो तो वह लेटे-लेटे ही नमाज़ पढ़ सकता है तथा उसे खड़े होने, रुकू के लिए झुकने या सजदे के लिए ज़मीन पर माथा टेकने की आवश्यकता नहीं है। रोज़ा रखना कमज़ोर व अक्षम लोगों के लिए अनिवार्य नहीं है तथा हज केवल उन्हीं लोगों के लिए अनिवार्य है जो आर्थिक व शारीरिक क्षमता रखते हैं।
    स्वाभाविक है कि इस प्रकार का धर्म ईश्वर की उपासना के लिए सर्वोत्तम है। इसके पैग़म्बर ईमान वालों के लिए आदर्श और इसके वास्तविक अनुयाई संसार के लोगों के लिए आदर्श हैं और उन्हें इस स्थिति की रक्षा के लिए सदैव नमाज़ अदा करना व ज़कात देना चाहिए, स्वयं को ईश्वर का बंदा समझना चाहिए और ईश्वर की उपासना को अपने जीवन में सर्वोपरि रखना चाहिए।
    इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय आदेशों के पालन में हमें अपने दायित्वों का निर्वाह करना चाहिए और इस संबंध में ढिलाई से काम नहीं लेना चाहिए।
    धार्मिक कर्तव्यों के पालन के संबंध में लोगों के साथ कड़ाई नहीं करनी चाहिए बल्कि सरल और व्यवहारिक ढंग से धर्म को पेश करना चाहिए।
    केवल इस्लाम और मुसलमान का नाम पर्याप्त नहीं है क्योंकि कर्म के बिना ईमान प्रभावी और लाभदायक नहीं होता।
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