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    सूरए हिज्र, आयतें 1-6, (कार्यक्रम 431)

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    इससे पहले क़ुरआने मजीद के सूरए इब्राहीम की आयतों की व्याख्या समाप्त हुई। आज से हम क़ुरआने मजीद के पंद्रहवें सूरे अर्थात सूरए हिज्र की व्याख्या आरंभ करेंगे। इस सूरे में ९९ आयतें हैं और यह पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के मदीना पलायन से पूर्व ईश्वर की ओर से उतरा है। हिज्र, एक नगर का नाम है जिसमें ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की जाति रहती थी। यह नाम इस सूरे के ८०वीं आयत में वर्णित है। तो आइये सबसे पहले सूरए हिज्र की पहली, दूसरी और तीसरी आयत की तिलावत सुनें।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ الر تِلْكَ آَيَاتُ الْكِتَابِ وَقُرْآَنٍ مُبِينٍ (1) رُبَمَا يَوَدُّ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْ كَانُوا مُسْلِمِينَ (2) ذَرْهُمْ يَأْكُلُوا وَيَتَمَتَّعُوا وَيُلْهِهِمُ الْأَمَلُ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ (3)ईश्वर के नाम से जो अत्यंत कृपाशील और दयावान है। अलिफ़. लाम. रा. ये (आसमानी) किताब और स्पष्ट क़ुरआन की आयतें हैं। (15:1) कितने ही ऐसे काफ़िर हैं जो यह कामना करेंगे कि काश वे मुस्लिम होते।(15:2) इन्हें इन की स्थिति पर छोड़ दीजिए कि खाते और मज़े उड़ाते रहें तथा इनकी कामना, इन्हें भुलावे में डाले रहे। तो शीघ्र ही ये समझ जाएंगे।(15:3)क़ुरआने मजीद के अन्य बहुत से सूरों की भांति इस सूरे के आरंभ में भी क़ुरआने मजीद के उच्च स्थान तथा मनुष्यों के समक्ष वास्तविकताओं को स्पष्ट ढंग से प्रस्तुत करने में क़ुरआने मजीद की आयतों की भूमिका की ओर संकेत किया गया है। क़ुरआने मजीद के अन्य २९ सूरों की भांति सूरए हिज्र का आरंभ भी हुरूफ़े मुक़त्तआत से हुआ है कि जिससे यह पता चलता है कि इस किताब में और मनुष्यों द्वारा लिखी जाने वाली पुस्तकों में अंतर है।अगली आयतों में एक महत्वपूर्ण बिंदु की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि कितने ही ऐसे काफ़िर हैं जो इस संसार में और विशेष कर प्रलय में यह कामना करेंगे कि काश वे मुस्लिम होते और उन्हें भी वही आत्मिक संतोष और स्वर्ग की अनुकंपाएं प्राप्त होतीं जो ईमान वालों को प्राप्त हैं किंतु यह केवल कामना ही है और वे ईमान लाने के संबंध में कोई व्यवहारिक क़दम नहीं उठाएंगे। वे सांसारिक आनंदों में पूर्ण रूप से लिप्त रहेंगे और अपने आपराधिक और हराम कार्यों को छोड़ने के लिए कदापि तैयार नहीं होंगे। अतः हे पैग़म्बर! और हे मुसलमानो! उन्हें उनकी स्थिति पर छोड़ दो कि वे अपने इन कार्यों का परिणाम शीघ्र ही देख लेंगे।स्वाभाविक है कि काफ़िर उसी स्थिति में छोड़े जाएंगे जब उन्हें तर्क व बुद्धि के आधार पर सच्चे धर्म की ओर आने का निमंत्रण दिया जा चुका होगा किंतु उन्होंने उद्दण्डता से काम लिया होगा अन्यथा ईश्वर ने इन्हीं लोगों के मार्गदर्शन के लिए अपने पैगम्बरों को इस संसार में भेजा है किंतु जब ये लोग सत्य बात को सुनने और उसके बारे में चिंतन करने के लिए तैयार ही नहीं हैं तो हमें अकारण उनकी ओर से चिंतित नहीं होना चाहिए कि वे क्यों ईमान नहीं लाते।इन आयतों से हमने सीखा कि आज जो लोग मुसलमानों का परिहास करते हैं, एक दिन वे कामना करेंगे कि काश वे ईमान वाले होते।अच्छे होने की केवल कामना करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अच्छे होने के मार्ग में व्यवहारिक क़दम उठाना चाहिए।धर्म के प्रचार में अपने समय को अयोग्य व उद्दण्डी लोगों को सुधारने के प्रयास में नष्ट नहीं करना चाहिए क्योंकि इसका कोई लाभ नहीं है।ईश्वर इतना दयालु व कृपालु है कि वह काफ़िरों तक को अपनी अनुकंपाओं से वंचित नहीं करता, किंतु वे इन अनुकंपाओं का मूल्य नहीं समझते।आइये अब सूरए हिज्र की चौथी और पांचवीं आयतों की तिलावत सुनें।وَمَا أَهْلَكْنَا مِنْ قَرْيَةٍ إِلَّا وَلَهَا كِتَابٌ مَعْلُومٌ (4) مَا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَأْخِرُونَ (5)और हमने किसी भी बस्ती को विनष्ट नहीं किया सिवाय इसके कि उसके लिए एक निश्चित समय था। (15:4) (क्योंकि) कोई भी गुट न तो अपने निर्धारित समय से आगे बढ़ सकता है और न ही पीछे रह सकता है।(15:5)पिछली आयतों में ईश्वर ने यह कहा था कि वह काफ़िरों को इस संसार में मोहलत देता है, ये आयतें कहती हैं कि ईश्वर की ओर से दी जाने वाली मोहलत भी एक न एक दिन समाप्त हो जाती है और उसके समाप्त होने का समय ईश्वर के निकट निर्धारित है। जब वह समय आ जाता है तो पापी जाति तबाह हो जाती है और कोई भी उस निर्धारित समय से न तो आगे बढ़ सकता है और न ही पीछे रह सकता है। ईश्वर की ओर से मनुष्य को दी जाने वाली मोहलत दो प्रकार की होती है, एक निर्धारित और दूसरी अनिर्धारित। इस आयत में निर्धारित मोहलत के बारे में कहा गया है जिसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता किंतु अनिर्धारित मोहलत को दान-दक्षिणा तथा भले कर्मों के माध्यम से टाला जा सकता है।इन आयतों से हमने सीखा कि काफ़िरों को मोहलत देना, ईश्वर की परंपरा है किंतु निर्धारित समय में उनकी मृत्यु भी ईश्वर की ही परंपरा है।केवल लोगों की मृत्यु का ही निर्धारित समय नहीं होता बल्कि जातियों और समाजों की समाप्ति का भी एक निश्चित समय होता है जिससे केवल ईश्वर ही अवगत होता है।आइये अब सूरए हिज्र की छठी आयत की तिलावत सुनें।وَقَالُوا يَا أَيُّهَا الَّذِي نُزِّلَ عَلَيْهِ الذِّكْرُ إِنَّكَ لَمَجْنُونٌ (6)काफ़िरों ने कहा, हे वह व्यक्ति जिस पर क़ुरआन उतरा है, निश्चित रूप से तू दीवाना है।(15:6)यह आयत ईश्वरीय पैग़म्बरों के संबंध में काफ़िरों के व्यवहार की ओर संकेत करते हुए कहती है कि वे पैग़म्बरों को पागल और स्वयं को बुद्धिमान समझते थे। उनकी दृष्टि में जो कोई यह दावा करता है कि वह ईश्वरीय पैग़म्बर है तथा उसके पास ईश्वर का विशेष संदेश आता है, वह एक प्रकार के पागलपन में ग्रस्त है और इसी कारण वह इस प्रकार के बड़े-बड़े दावे करता है।अल्बत्ता अज्ञानता के काल के अरबों की संस्कृति में पागल और दीवाना उस व्यक्ति को कहा जाता था जिसके ऊपर जिन्न आते थे और इसी कारण वह विशेष प्रकार के कार्य करने लगता था या विशेष प्रकार की बातें करता था। इसी प्रकार प्राचीन अरबों का यह भी मानना था कि कवि वह व्यक्ति होता है जो जिन्नों से संपर्क के कारण शेर कहने लगे।किंतु ईश्वरीय पैग़म्बरों से इस प्रकार से बातें करने से दो बातें स्पष्ट होती हैं, प्रथम काफ़िरों द्वारा लोगों के परिहास व अपमान की शैली जिससे उनके दुस्साहस का पता चलता है और दूसरे यह कि पैग़म्बरों की शिक्षाओं और सत्य कथनों को रद्द करने का उनके पास कोई तर्क नहीं है और वे केवल बुरा भला कहने तथा अपमान करने को ही पर्याप्त समझते हैं। यह वही शैली है जिससे आज भी ईश्वरीय पैग़म्बरों के मत के विरोधी लाभ उठा रहे हैं। यदि क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं के बारे में उनके मन में कोई बात है तो उसे तर्क के साथ प्रस्तुत करने के स्थान पर वे व्यंग्य, कैरिकैचर और अपमान द्वारा इस्लामी मान्यताओं का परिहास करने का प्रयास करते हैं।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों की ओर से लगाए जाने वाले आरोपों या उनके द्वारा किए जाने वाले अपमान के समक्ष डटे रहना चाहिए कि यह ईमान वालों के संबंध में उनकी पुरानी शैली है।सत्य व सत्यता के प्रति कुछ लोगों का हठधर्म इस सीमा तक पहुंच जाता है कि वे अपने आपको पूर्ण बुद्धिमान तथा ईश्वरीय पैग़म्बरों को पागल कहने लगते हैं।