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    सूरए हिज्र, आयतें 12-20, (कार्यक्रम 433)

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    आइये सूरए हिज्र की आयत नंबर १२ और १३ की तिलावत सुनें।كَذَلِكَ نَسْلُكُهُ فِي قُلُوبِ الْمُجْرِمِينَ (12) لَا يُؤْمِنُونَ بِهِ وَقَدْ خَلَتْ سُنَّةُ الْأَوَّلِينَ (13)इस प्रकार हम क़ुरआन को उनके हृदयों में उतार देते हैं (15:12) (किंतु) वे उस पर ईमान नहीं लाते और पिछले लोगों की परंपरा भी यही रही है।(15:13)इससे पहले क़ुरआने मजीद के उतरने के संबंध में बात की गई थी और क़ुरआन को ईश्वर के स्मरण अथवा ज़िक्र का नाम दिया गया था। ये आयतें कहती हैं कि जिस प्रकार से अतीत में बहुत सी जातियां सत्य की बात को सुनती और समझती थीं किंतु उस पर ईमान नहीं लाती थीं उसी प्रकार क़ुरआने मजीद जिन लोगों को संबोधित करता है उनमें से अनेक के हृदय में क़ुरआन की वास्तविकताएं उतर चुकी हैं और वे उन्हें समझते भी हैं किंतु उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते।इस प्रकार इन आयतों में दो प्रकार की परंपराओं का वर्णन किया गया है, एक ईश्वरीय परंपरा जो काफ़िरों के संबंध में तर्क प्रस्तुत करने पर आधारित है ताकि वे प्रलय में यह न कह सकें कि हमने ईश्वर की बात ही नहीं सुनी और हमें कुछ ज्ञात नहीं है। दूसरी अपराधियों की परंपरा है जो सत्य के मुक़ाबले में द्वेष एवं हठधर्म पर आधारित है। पूरे मानव इतिहास में ये दोनों परंपराएं रही हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर ने सभी लोगों के मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध कराए हैं ताकि उनके पास कोई बहाना बाक़ी न बचे।जो बात मनुष्य को सत्य स्वीकार करने से रोकती है वह पाप तथा अपराध से दूषित होना है। पाप और अपराध के कारण मनुष्य का हृदय सत्य को स्वीकार नहीं करता।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर १४ और १५ की तिलावत सुनें।وَلَوْ فَتَحْنَا عَلَيْهِمْ بَابًا مِنَ السَّمَاءِ فَظَلُّوا فِيهِ يَعْرُجُونَ (14) لَقَالُوا إِنَّمَا سُكِّرَتْ أَبْصَارُنَا بَلْ نَحْنُ قَوْمٌ مَسْحُورُونَ (15)और यदि हम आकाश से उनके लिए एक द्वार भी खोल दें ताकि वे उससे ऊपर चढ़ जाएं (15:14) तब भी वे कहेंगे कि हमारी नज़रबंदी कर दी गई है बल्कि हम पर जादू कर दिया गया है।(15:15)पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के विरोधी उनसे मांग करते थे कि उनके समक्ष फ़रिश्ते उतरें। यह आयत कहती है कि यदि इनके समक्ष आकाश के द्वार भी खोल दिए जाएं और उन्हें उस स्थान तक पहुंचा दिया जाए जहां फ़रिश्तों की आवाजाही रहती है तब भी ये ईमान नहीं लाएंगे और यह बहाना बनाएंगे कि हमारी नज़रबंदी कर दी गई है, हम पर जादू का प्रभाव है और जो कुछ हम देख रहे हैं वह वास्तविकता नहीं बल्कि केवल कल्पना है।इन आयतों से हमने सीखा कि सत्य को स्वीकार करने के लिए उसे जानना तथा समझना पर्याप्त नहीं है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि हठधर्म के कारण मनुष्य सत्य को स्वीकार नहीं करता।जो सत्य को स्वीकार ही नहीं करना चाहता, वह बड़े से बड़े चमत्कार को भी जादू-टोना बताता है ताकि उसे सत्य को स्वीकार न करना पड़े।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर १६, १७ और १८ की तिलावत सुनें।وَلَقَدْ جَعَلْنَا فِي السَّمَاءِ بُرُوجًا وَزَيَّنَّاهَا لِلنَّاظِرِينَ (16) وَحَفِظْنَاهَا مِنْ كُلِّ شَيْطَانٍ رَجِيمٍ (17) إِلَّا مَنِ اسْتَرَقَ السَّمْعَ فَأَتْبَعَهُ شِهَابٌ مُبِينٌ (18)और निश्चित रूप से हमने आकाशों में स्तंभ बनाए हैं और उन्हें देखने वालों के लिए सुसज्जित किया है (15:16) तथा उन्हें हर दुत्कारे हुए शैतान से सुरक्षित रखा है (15:17) सिवाय इसके कि वह चोरी-छिपे कुछ सुन गुन लेना चाहे तो उसके पीछे एक दहकता हुआ अंगारा लगा दिया जाता है।(15:18)पिछली आयतों में कहा गया था कि यदि काफ़िरों तथा विरोधियों को आकाश पर पहुंचा दिया जाए ताकि वे फ़रिश्तों को देख सकें और उनकी बातों को सुन सकें तब भी वे ईमान नहीं लाएंगे। ये आयतें कहती हैं कि आकाशों पर पहुंचना इतना सरल भी नहीं है क्योंकि शैतान वहां पहुंचने तथा वहां की बातों की सुन गुन लेने के प्रयास में रहते हैं किंतु ईश्वर उन्हें दुत्कार देता है और आग का गोला उनके पीछे लगा कर उन्हें दण्डित करता है।भौतिक व प्राकृतिक दृष्टि से भी ईश्वर ने आकाश को सुंदर बनाया है, इस प्रकार से कि हर समय विशेष कर रात्रि में धरती के लोगों को आकाश का सुंदर व मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। यह सब ईश्वर की इच्छा व इरादे से हुआ है।इन आयतों से हमने सीखा कि आकाश में मौजूद सितारे तथा विभिन्न ध्रुवों पर उनकी परिक्रमा, एकेश्वरवाद का एक प्रमाण है।जब भी और जहां भी कोई शैतानी व्यक्तित्व वाला, छिप कर बातें सुनना चाहे तो उसके साथ कड़ा व्यवहार किया जाना चाहिए ताकि समाज के संचालन का केंद्र, जासूसों से सुरक्षित रहे।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर १९ और २० की तिलावत सुनें।وَالْأَرْضَ مَدَدْنَاهَا وَأَلْقَيْنَا فِيهَا رَوَاسِيَ وَأَنْبَتْنَا فِيهَا مِنْ كُلِّ شَيْءٍ مَوْزُونٍ (19) وَجَعَلْنَا لَكُمْ فِيهَا مَعَايِشَ وَمَنْ لَسْتُمْ لَهُ بِرَازِقِينَ (20)और हमने धरती को फैलाया तथा उसमें ठोस व अटल पर्वत डाल दिए तथा उसमें हर वस्तु (और हर पौधे) को एक प्रकार से उगाया। (15:19) और उसमें तुम्हारे तथा उन लोगों के लिए जीवन के साधन रखे जिन्हें तुम आजीविका देने वाले नहीं हो।(15:20)सृष्टि की रचना में ईश्वर की शक्ति व महानता के वर्णन के पश्चात क़ुरआने मजीद इन आयतों में मनुष्य को प्राप्त असीम अनुकंपाओं तथा धरती से प्राप्त होने वाली अनेक नेमतों की ओर संकेत करते हुए कहता है कि धरती पर उगने वाली सभी वस्तुएं, पर्वत, मरुस्थल तथा नदी व समुद्र बहुत ही सूक्ष्म युक्ति के साथ अस्तित्व में आई हं और यह कोई संयोग नहीं है।मनुष्य पर ईश्वर की इस असीम कृपा का कारण यह है कि उसके जीवन की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाए और उसे जीवन यापन के लिए किसी भी प्रकार की कठिनाई का सामना न करना पड़े। क़ुरआने मजीद कहता है कि धरती में मनुष्य के अतिरिक्त बहुत से अन्य जीव-जंतु भी जीवन यापन करते हैं तथा ईश्वर ने उनकी आजीविका भी इसी धरती में रखी है ताकि उनकी आवश्यकताओं की भी पूर्ति हो सके।इन आयतों से हमने सीखा कि धरती में वनस्पतियों तथा पेड़-पौधों का उगना, ईश्वर की बहुत बड़ी कृपा है अन्यथा शुष्क व बंजर धरती मनुष्य के किस काम की थी।ईश्वर ने मनुष्य तथा सभी जीवों की आजीविका को सुनिश्चित बनाया है, इस संबंध में यदि कोई समस्या है तो हमारे कार्यक्रमों की कमी के कारण है।