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    सूरए हिज्र, आयतें 21-25, (कार्यक्रम 434)

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    आइये पहले सूरए हिज्र की आयत नंबर २१ की तिलावत सुनें।وَإِنْ مِنْ شَيْءٍ إِلَّا عِنْدَنَا خَزَائِنُهُ وَمَا نُنَزِّلُهُ إِلَّا بِقَدَرٍ مَعْلُومٍ (21)और कोई भी वस्तु ऐसी नहीं जिसके ख़ज़ाने हमारे पास न हों और हम हर वस्तु को एक निर्धारित मात्रा में ही उतारते हैं।(15:21)ईश्वर ने, जो संपूर्ण सृष्टि तथा सभी जीवों व वस्तुओं का रचयिता है, हर जीव के लिए एक निर्धारित क्षमता रखी है और यह उसकी तत्वदर्शिता का चिन्ह है। चूंकि वह सभी जीवों व वस्तुओं का रचयिता है अतः उसे सभी की आवश्यकताओं का ज्ञान है और वह उनकी पूर्ति करता है। रचनाओं में पाई जाने वाली सभी क्षमताओं का स्रोत भी रचयिता ही है और किसे कितना दिया जाना चाहिए, यह एक निर्धारित मात्रा में होता है तथा इससे केवल ईश्वर ही अवगत है। यह बात क़ुरआने मजीद की विभिन्न आयतों में तक़दीर शब्द के साथ वर्णित है जिसका अर्थ होता है किसी के लिए निर्धारित मात्रा।अल्बत्ता इसका अर्थ ईश्वरीय नेमतों तथा अनुकंपाओं से लाभ उठाने में मनुष्य की भूमिका की अनदेखी करना नहीं है। बल्कि इससे यह पता चलता है कि यदि मनुष्य प्रयास करे तो वह अनुकंपा की उक्त मात्रा को प्राप्त कर सकता है। स्वाभाविक है कि यदि वह प्रयास नहीं करेगा तो ईश्वरीय अनुकंपाओं तथा उसके ख़ज़ानों से लाभ उठाने का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा।इस आयत से हमने सीखा कि सभी वस्तुओं का जीवन, उनकी क्षमताएं तथा विशेषताएं ईश्वर के हाथ में है और वह अपनी तत्वदर्शिता के आधार पर हर किसी को उसकी आवश्यकता के अनुसार प्रदान करता है।हमें ईश्वर को छोड़ कर किसी की शरण में नहीं जाना चाहिए कि हर वस्तु का स्रोत ईश्वर ही है।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर २२ की तिलावत सुनें।وَأَرْسَلْنَا الرِّيَاحَ لَوَاقِحَ فَأَنْزَلْنَا مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَسْقَيْنَاكُمُوهُ وَمَا أَنْتُمْ لَهُ بِخَازِنِينَ (22)और हमने हवाओं को बादलों का बोझ उठाने वाला तथा वर्षा लाने वाला बना कर भेजा तथा आकाश से पानी बरसाया जिसके माध्यम से तुम्हें तृप्त किया और तुममें उसकी रक्षा की क्षमता नहीं थी।(15:22)यह आयत, पिछली आयत में वर्णित ईश्वरीय ख़ज़ानों के एक प्रतीक की ओर संकेत करते हुए कहती है कि जीवन जारी रखने के लिए तुम्हारे लिए सबसे अधिक आवश्यक वस्तु पीने का पानी है जिसकी आपूर्ति करने की तुममें क्षमता नहीं है किंतु ईश्वर, हवा की शक्ति से बादलों को एक स्थान से दूसरे स्थान भेजता है तथा बादलों को आपस में टकरा कर तुम पर पानी बरसाता है ताकि तुम्हारी प्यास दूर हो जाए और तुम तृप्त हो सको।इस आयत से हमने सीखा कि बादल, हवाएं तथा वर्षा ईश्वर की ओर से मनुष्य को दी जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण अनुकंपाएं हैं और मानव जीवन इन पर निर्भर है।सृष्टि, ईश्वर की युक्ति के अधीन है। उसने सृष्टि को उसकी स्थिति पर नहीं छोड़ दिया है कि प्राकृतिक कारक, सृष्टि का संचालन करते रहें।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर २३, २४ और २५ की तिलावत सुनें।وَإِنَّا لَنَحْنُ نُحْيِي وَنُمِيتُ وَنَحْنُ الْوَارِثُونَ (23) وَلَقَدْ عَلِمْنَا الْمُسْتَقْدِمِينَ مِنْكُمْ وَلَقَدْ عَلِمْنَا الْمُسْتَأْخِرِينَ (24) وَإِنَّ رَبَّكَ هُوَ يَحْشُرُهُمْ إِنَّهُ حَكِيمٌ عَلِيمٌ (25)और निश्चित रूप से हम ही जीवन व मृत्यु प्रदान करने वाले हैं और हम ही उत्तराधिकारी हैं।(15:23) निसंदेह हम तुम से पहले वालों के बारे में (भी) जानते हैं और तुम्हारे बाद आने वालों के बारे में भी ज्ञान रखते हैं।(15:24) (हे पैग़म्बर!) निश्चित रूप से आपका पालनहार उन (सबको प्रलय में) एकत्रित करेगा कि वह सबसे अधिक ज्ञानी भी है और तत्वदर्शी भी।(15:25)ये आयतें मनुष्य के जीवन तथा मृत्यु के विषय की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि तुम्हारा जीवन और मरना तुम्हारे तथा अन्य लोगों के हाथ में नहीं बल्कि ईश्वर के नियंत्रण में है। वह सदैव रहने वाला और अनंत है और वही सभी वस्तुओं व जीवों का उत्तराधिकारी है। मरने के पश्चात तथा प्रलय में सभी जीवों को ईश्वर के आदेश से जीवित किया जाएगा और अपने ज्ञान व तत्वदर्शिता के आधार पर उनका हिसाब किताब करेगा।आयत कहती है कि इस मामले में तुम्हारे तथा पिछले व आने वाले लोगों के बीच में कोई अंतर नहीं है क्योंकि ईश्वर की दृष्टि में अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का कोई अर्थ नहीं है और हर बात को पूर्ण रूप से तथा भलिभांति जानता है। उसे किसी प्रकार का भुलावा नहीं होता कि वह अतीत की बातों को भूल जाए और न ही उसकी दृष्टि में कोई बात अस्पष्ट है कि वह भविष्य की बातों से अनभिज्ञ रहे।इस आयत में प्रयोग होने वाले शब्द मुस्तक़देमीन अर्थात पिछले और मुस्ताख़ेरीन अर्थात अगले के व्यापक अर्थ हैं। ये दोनों शब्द काल और समय की दृष्टि से पिछले और अगले लोगों पर भी चरितार्थ होते हैं और भले कर्मों तथा शत्रु के साथ संघर्ष करने में आगे तथा पीछे रहने वालों का भी अर्थ देते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि समय और काल बीतने से ईश्वर के ज्ञान पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में उसका ज्ञान एकसमान है।यदि ईश्वर सभी मनुष्यों का उत्तराधिकारी है तो हमें प्रयास करना चाहिए कि अच्छे कर्मों की धरोहर छोड़कर जाएं जो प्रलय में भी हमारे काम आए।ईश्वर की तत्वदर्शिता कहती है कि इस संसार में सभी मरने वालों को प्रलय में एक बार फिर जीवित किया जाए क्योंकि यदि मृत्यु के साथ ही मनुष्य का मामला समाप्त हो जाए और हिसाब-किताब न हो तो फिर सृष्टि का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा।