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    सूरए हिज्र, आयतें 26-31, (कार्यक्रम 435)

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    आइये पहले सूरए हिज्र की आयत नंबर २६ और २७ की तिलावत सुनें।وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ (26) وَالْجَانَّ خَلَقْنَاهُ مِنْ قَبْلُ مِنْ نَارِ السَّمُومِ (27)और निश्चित रूप से हमने मनुष्य की रचना काली और दुर्गंध वाली मिट्टी में से सूखी हुई मिट्टी से की (15:26) और (उससे पूर्व) जिन्नों की रचना गर्म तथा जलाने वाली आग से की।(15:27)इससे पहले आकाश, धरती, हवा तथा वर्षा सहित विभिन्न अनुकंपाओं की रचना का उल्लेख किया गया था। इन आयतों में मनुष्यों तथा जिन्नों की सृष्टि की ओर संकेत किया गया है और संक्षेप में कहा गया है कि मनुष्य को पानी व मिट्टी से बनाया गया है जबकि जिन्नों की रचना आग से की गई है।क़ुरआने मजीद की विभिन्न आयतों में मनुष्य की रचना का उल्लेख किया गया है। इन आयतों से पता चलता है कि मनुष्य की सृष्टि अन्य जीवों से अलग थी और वह पशुओं का विकसित रूप नहीं है बल्कि प्रथम मनुष्य अर्थात हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की रचना ईश्वर ने सीधे मिट्टी से की थी और उन्हें जीवन प्रदान किया था। इसी प्रकार मनुष्य का जीवन जिन वस्तुओं पर निर्भर है वे भी मिट्टी से ही उगती हैं। क़ुरआने मजीद की कुछ आयतों में इस विषय की ओर भी संकेत किया गया है, जैसा कि सूरए कह्फ़ की आयत नंबर ३७ में कहा गया है कि आरंभ में मनुष्य की रचना मिट्टी से की गई तथा बाद में उसे माता-पिता के माध्यम से पैदा किया गया।ईश्वर ने मनुष्य के अतिरिक्त जिन्न के नाम से एक अदृश्य जीव की भी रचना की है जिसका अस्तित्व मनुष्य से पहले से है तथा जिन्नों की संख्या भी मनुष्यों से अधिक है। क़ुरआने मजीद की विभिन्न आयतों में उनकी ओर संकेत किया गया है, यहां तक कि क़ुरआने मजीद के एक सूरे का नाम ही सूरए जिन्न है। क़ुरआन कहता है कि मनुष्यों की भांति जिन्नों पर भी कुछ दायित्व हैं और वे ईश्वर के संबोधन का पात्र बनते हैं तथा उसे समझते हैं। मनुष्यों की ही भांति जिन्नों में स्त्री व पुरूष होते हैं तथा उनमें भी जीवन व मृत्यु का चक्र चलता रहता है। जिन्नों में से भी कुछ ईमान वाले होते हैं तथा कुछ ईश्वर का इन्कार कर देते हैं।हज़रत आदम तथा हव्वा को धोखा देने वाला इब्लीस भी जिन्नों में से था किंतु ईश्वर की अत्यधिक उपासना करने के कारण फ़रिश्तों की पंक्ति में आ गया था। ईश्वर ने हज़रत आदम की रचना के पश्चात फ़रिश्तों को उनके समक्ष नतमस्तक होने का जो आदेश दिया था उसमें वह भी संबोधन का पात्र था किंतु उसने ईश्वर के इस आदेश की अवहेलना की तथा काफ़िर हो गया।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य का मूल्य उसके शरीर से नहीं बल्कि उसकी आत्मा से है क्योंकि शरीर काले रंग की तुच्छ मिट्टी से बना है।ईमान वाला व्यक्ति विदित बातों के अतिरिक्त, फ़रिश्तों तथा जिन्नों की भांति आंखों से ओझल रहने वाली तथा अदृश्य बातों व वस्तुओं पर भी ईमान रखता है।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर २८ और २९ की तिलावत सुनें।وَإِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَائِكَةِ إِنِّي خَالِقٌ بَشَرًا مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ (28) فَإِذَا سَوَّيْتُهُ وَنَفَخْتُ فِيهِ مِنْ رُوحِي فَقَعُوا لَهُ سَاجِدِينَ (29)और जब तुम्हारे पालनहार ने फ़रिश्तों से कहा कि मैं सूखी, काली व दुर्गंध वाली मिट्टी से मनुष्य की रचना करने वाला हूं (15:28) तो जब मैं उसे सुदृढ़ कर लूं तथा उसमें अपनी आत्मा फूंक दूं तो तुम सब उसके समक्ष नतमस्तक हो जाना।(15:29)ये आयतें इस बात की ओर संकेत करती हैं कि ईश्वर ने मनुष्य की रचना का विषय फ़रिश्तों के बीच रखा था। यह बात क़ुरआने मजीद के विभिन्न सूरों में वर्णित है। इन आयतों से यह बात भी समझी जा सकती है कि फ़रिश्तों की रचना, मनुष्य की रचना से पहले हुई थी। इन आयतों में एक अन्य बिंदु यह है कि मनुष्य के समक्ष फ़रिश्तों के नतमस्तक होने का आदेश इस कारण नहीं था कि उसकी रचना मिट्टी से हुई थी, बल्कि इस कारण था कि उसमें ईश्वर ने अपनी आत्मा फूंक दी थी और उसे अपने विशेष ध्यान का पात्र बनाया था।स्पष्ट है कि मनुष्य में ईश्वर की आत्मा फूंके जाने का अर्थ जीवन तथा सांस लेना नहीं है क्योंकि यह बात तो पशुओं में भी पाई जाती है बल्कि इसका अर्थ वह क्षमता व योग्यता है जो ईश्वर ने मनुष्य को प्रदान की है जिसके माध्यम से वह ज्ञान तथा रचनात्मकता जैसे गुण प्राप्त कर सकता है।इसी प्रकार मनुष्य के समक्ष फ़रिश्तों का सजदा, ईश्वर को किए जाने वाले सजदे जैसा नहीं था बल्कि उसका अर्थ यह था कि वे आदम तथा उनके वंश के समक्ष नतमस्तक हैं क्योंकि फ़रिश्ते मनुष्य की सेवा में हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य दो आयामों वाला जीव है, वह भौतिक भी है और आध्यात्मिक भी, शारीरिक भी है और आत्मिक भी, अतः उसकी शारीरिक भावनाएं भी होती हैं और आध्यात्मिक आवश्यकताएं भी।मनुष्य, ईश्वर के कुछ गुणों एवं विशेषताओं का प्रतिबिंब है और यह क्षमता स्वयं ईश्वर ने उसके भीतर रखी है।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ३० और ३१ की तिलावत सुनें।فَسَجَدَ الْمَلَائِكَةُ كُلُّهُمْ أَجْمَعُونَ (30) إِلَّا إِبْلِيسَ أَبَى أَنْ يَكُونَ مَعَ السَّاجِدِينَ (31)तो सभी फ़रिश्तों ने सजदा किया (15:30) सिवाय इब्लीस के कि जिसने सजदा करने वालों में शामिल होने से इन्कार किया।(15:31)मनुष्य की रचना के बाद उसके समक्ष सजदा करने के ईश्वरीय आदेश का सभी फ़रिश्तों ने बिना किसी इन्कार और आपत्ति के पालन किया क्योंकि फ़रिश्तों की बुद्धि परिपूर्ण है और उनमें ईश्वरीय आदेश की अवहेलना की कल्पना भी नहीं की जा सकती, जैसा की क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों में भी संकेत किया गया है कि वे किसी भी स्थिति में ईश्वर के प्रति उद्दण्डता नहीं करते।इस बीच इब्लीस ने, कि जो क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों के अनुसार जिन्नों में से था और विरोध की क्षमता रखता था, ईश्वरीय आदेश की अवहेलना की और हज़रत आदम को सजदा करने के लिए तैयार नहीं हुआ क्योंकि वह स्वयं को उनसे श्रेष्ठ समझता था। जबकि उसका दायित्व था कि आदम से अपनी तुलना के स्थान पर ईश्वरीय आदेश का पालन करता और यदि मनुष्य, जिन्नों से श्रेष्ठ न होता, तब भी उसके समक्ष नतमस्तक हो जाता।इन आयतों से हमने सीखा कि जो लोग अन्य नमाज़ियों की पंक्ति में शामिल होने तथा उनके साथ सजदा करने के लिए तैयार नहीं होते उनमें शैतान घुसा होता है।ईमान वाला व्यक्ति, ईश्वरीय आदेशों का तर्क और कारण खोजने का प्रयास नहीं करता कि यदि वह बात उसकी समझ में न आई या ग़लत लगी तो उसका विरोध करने लगे।