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    सूरए हिज्र, आयतें 32-38, (कार्यक्रम 436)

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    आइये पहले सूरए हिज्र की आयत नंबर ३२ और ३३ की तिलावत सुनें।قَالَ يَا إِبْلِيسُ مَا لَكَ أَلَّا تَكُونَ مَعَ السَّاجِدِينَ (32) قَالَ لَمْ أَكُنْ لِأَسْجُدَ لِبَشَرٍ خَلَقْتَهُ مِنْ صَلْصَالٍ مِنْ حَمَإٍ مَسْنُونٍ (33)ईश्वर ने कहा, हे इब्लीस तुझे क्या हुआ है कि तू सजदा करने वालों के साथ नहीं है? (15:32) उसने कहा मैं ऐसा नहीं हूं कि उस मनुष्य को सजदा करूं जिसकी रचना तूने काली और दुर्गंध वाली मिट्टी में से सूखी हुई मिट्टी से की है।(15:33)इससे पूर्व आदम की सृष्टि, फ़रिश्तों को उनके समक्ष सजदा करने के ईश्वरीय आदेश तथा इब्लीस की ओर से इस आदेश की अवहेलना का वर्णन किया गया। ये आयतें कहती हैं कि इब्लीस ने ईश्वरीय आदेश की अवहेलना का कारण यह बताया कि वह मिट्टी से बनने वाले मनुष्य से श्रेष्ठ है। उसने बड़े अहंकार से कहा कि मैं मिट्टी से बने इस तुच्छ जीव के समक्ष किस प्रकार सिर झुका सकता हूं?यह ऐसी स्थिति में था कि शैतान यह भूल गया था कि हज़रत आदम ने उससे नहीं कहा था कि मेरे सामने सिर झुकाओ बल्कि ईश्वर ने आदेश दिया था कि आदम को सजदा करो। यदि यह आदेश आदम की ओर से होता तो शायद शैतान की बात किसी सीमा तक ठीक समझी जा सकती थी जो यह कहता कि मैं तुम से पहले से हूं अतः इस आयाम से तुमसे श्रेष्ठ हूं किंतु जब सजदे का आदेश ईश्वर ने दिया तो इब्लीस को आंख बंद करके उसे स्वीकार कर लेना चाहिए था और आज्ञापालन करना चाहिए था।इन आयतों से हमने सीखा कि घमण्ड और अहं की भावना इतनी ख़तरनाक है कि यदि कोई फ़रिश्तों के बीच भी रहे तो भी इसके कारण ईश्वर के सामने भी द्वेष और हठधर्म में ग्रस्त हो सकता है।जातीय श्रेष्ठता, एक शैतानी विचार है, ईश्वर के निकट उसकी सभी रचनाएं एक समान हैं सिवाय उसके जिसे स्वयं ईश्वर वरीयता दे।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ३४ और ३५ की तिलावत सुनें।قَالَ فَاخْرُجْ مِنْهَا فَإِنَّكَ رَجِيمٌ (34) وَإِنَّ عَلَيْكَ اللَّعْنَةَ إِلَى يَوْمِ الدِّينِ (35)ईश्वर ने कहा तो फिर फ़रिश्तों के उस स्थान से निकल जा कि निश्चित रूप से तू दुत्कारा हुआ है (15:34) और निसंदेह तुझ पर प्रलय के दिन तक धिक्कार होती रहेगी।(15:35)जब इब्लीस ने अपनी उद्दण्डता को स्वीकार कर लिया और उसके लिए कोई स्वीकार्य तर्क प्रस्तुत न कर सका तो ईश्वर ने उसे उस स्थान से बाहर निकाल दिया जो उसने उपासना करके प्राप्त किया था। ईश्वर ने कहा कि प्रलय के दिन तक तू मेरी दया व कृपा से वंचित रहेगा। जैसा कि इससे पूर्व कहा गया कि इब्लीस जिन्नों में से था और ईश्वर की अत्यधिक उपासना करने के कारण फ़रिश्तों की पंक्ति में आ गया था अतः ईश्वर ने जब हज़रत आदम को सजदा करने का आदेश दिया तो वह भी फ़रिश्तों में शामिल था और उस पर भी यह आदेश लागू होता था किंतु उसने आदेश की अवहेलना की और उस स्थान से निकाल दिया गया और ईश्वरीय धिक्कार का पात्र बना।इन आयतों से हमने सीखा कि घमण्ड व श्रेष्ठताप्रेम से महानता प्राप्त नहीं होती बल्कि इससे व्यक्ति अपमानित ही होता है। शैतान, जिसने घमण्ड किया था, ईश्वरीय धिक्कार का पात्र बना।कभी कभी एक आदेश की अवहेलना, एक लंबे समय के आज्ञापालन के अकारत हो जाने का कारण बनती है। जिस प्रकार से एक लंबे समय तक स्वास्थ्य का ध्यान रखने के बाद थोड़े से विष का सेवन आयु की समाप्ति का कारण बनता है।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ३६, ३७ और ३८ की तिलावत सुनें।قَالَ رَبِّ فَأَنْظِرْنِي إِلَى يَوْمِ يُبْعَثُونَ (36) قَالَ فَإِنَّكَ مِنَ الْمُنْظَرِينَ (37) إِلَى يَوْمِ الْوَقْتِ الْمَعْلُومِ (38)इब्लीस ने कहा, प्रभुवर! मुझे उस दिन तक के लिए मोहलत दे जब लोगों को मरने के पश्चात पुनः उठाया जाएगा। (15:36) ईश्वर ने कहा, निश्चित रूप से तू मोहलत दिए जाने वालों में से है, (15:37) अलबत्ता केवल उस दिन तक के लिए जिसका समय ज्ञात है।(15:38)जब शैतान यह समझ गया कि वह प्रलय के दिन तक के लिए ईश्वरीय धिक्कार का पात्र बन गया है तो उसने ईश्वर से कहा कि उस दिन तक के लिए उसे मोहलत दी जाए और वह उस दिन तक जीवित रहे। चूंकि ईश्वर की परंपरा मोहलत देने पर आधारित है, अलबत्ता केवल तब तक के लिए जब तक वह उचित समझे, तो उसने शैतान को मोहलत दे दी किंतु यह मोहलत प्रलय तक की नहीं है बल्कि केवल उसी समय तक के लिए है जो ईश्वर के निकट स्पष्ट है।रोचक बात यह है कि शैतान ने अपनी उद्दण्डता पर क्षमा मांगने और पाप पर तौबा करने के स्थान पर ईश्वर से मोहलत मांगी और ईश्वर के प्रभुवर होने की बात स्वीकार करते हुए इस प्रकार इच्छा जताई कि प्रभुवर! मुझे मोहलत दे। उसने मोहलत मांगने का कारण भी नहीं बताया। ईश्वर ने भी उसकी इस इच्छा को स्वीकार कर लिया और उसे मोहलत दे दी।इन आयतों से हमने सीखा कि जब ईश्वर ने अपने सबसे बड़े शत्रु अर्थात शैतान की प्रार्थना भी स्वीकार कर ली और उसे मोहलत दे दी तो हम मनुष्यों को कभी भी उसकी दया की ओर से निराश नहीं होना चाहिए।शैतान का लक्ष्य, मनुष्यों को पथभ्रष्ठ करना है अतः हमें सचेत रहना चाहिए और ईश्वर से डरते हुए स्वयं को हर प्रकार के शैतानी बहकावे से सुरक्षित रखना चाहिए।