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    सूरए हिज्र, आयतें 39-44, (कार्यक्रम 437)

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    आइये सूरए हिज्र की आयत नंबर ३९ और ४० की तिलावत सुनें।قَالَ رَبِّ بِمَا أَغْوَيْتَنِي لَأُزَيِّنَنَّ لَهُمْ فِي الْأَرْضِ وَلَأُغْوِيَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ (39) إِلَّا عِبَادَكَ مِنْهُمُ الْمُخْلَصِينَ (40)इब्लीस ने कहा, प्रभुवर! जिस प्रकार से तूने मुझे बहकाया मैं भी उसी प्रकार धरती में (मनुष्यों के समक्ष बुराइयों को) सुंदर बना कर प्रस्तुत करूंगा तथा सबको बहकाऊंगा (15:39) सिवाय उनके जो तेरे चुने हुए बंदे होंगे।(15:40)इससे पहले बताया गया था कि यद्यपि इब्लीस फ़रिश्तों की पंक्ति में रहता था किंतु हज़रत आदम को सजदा करने के ईश्वर के आदेश की अवहेलना के कारण वह उस स्थान से निकाल दिया गया और वह ईश्वरीय धिक्कार का पात्र बन गया।यह आयत कहती है कि चूंकि आदम को सजदा न करने के कारण शैतान को ईश्वर के दरबार से निकलना पड़ा, इसलिए उसने सौगंध खाई कि वह मनुष्यों की पथभ्रष्टता का मार्ग प्रशस्त करेगा किंतु ईश्वर के पवित्र और निष्ठावान बंदे जिन पर ईश्वर की विशेष कृपा रहती है, इस ख़तरे से बचे रहेंगे। उसने स्वीकार किया कि वह इन लोगों को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रखता।आयत में कहा गया है कि मनुष्य के विचारों तथा कर्मों में शैतान के प्रवेश का मार्ग, बुरे कर्मों को अच्छा बना कर प्रस्तुत करना है क्योंकि यदि मनुष्य बुराई को बुरा देखेगा तो स्वाभाविक रूप से कभी भी उसके निकट नहीं जाएगा किंतु जब बुराई उसके समक्ष अच्छाई बना कर प्रस्तुत की जाएगी तो वह बड़ी सरलता से उसे स्वीकार कर लेगा। दूसरे शब्दों में शैतान, मनुष्य को पाप करने पर बाध्य नहीं करता बल्कि वह पाप को सुंदर बना कर उसके समक्ष प्रस्तुत कर देता है और फिर वह पाप की ओर खिंचा चला जाता है।इसी प्रकार शैतान ने भी अपनी पथभ्रष्टता को अकारण, ईश्वर से संबंधित कर दिया और कहा कि प्रभुवर! तूने मुझे पथभ्रष्ट कर दिया जबकि ईश्वर कभी किसी को पथभ्रष्ट नहीं करता किंतु यदि कोई ग़लत मार्ग का चयन करे तो ईश्वर उसमें रुकावट नहीं डालता क्योंकि यह मनुष्यों तथा जिन्नों को चयन का अधिकार देने की उसकी परंपरा के विरुद्ध है।इब्लीस ने अपने चयन और अधिकार के साथ ईश्वर के आदेश की अवहेलना की और ईश्वर ने उसे उसकी स्थिति पर छोड़ दिया। पापी मनुष्यों के साथ भी ईश्वर यही व्यवहार करता है और पाप करते ही उन्हें दण्डित नहीं करता।इन आयतों से हमने सीखा कि कभी-२ पापी व्यक्ति अपने कार्य का औचित्य दर्शाने के लिए ईश्वर को दोषी बताता है और अपने पाप को उससे संबंधित कर देता है।लोगों को बहकाने तथा पथभ्रष्ट करने के लिए शैतान का हथकण्डा, बुराइयों को अच्छा बना कर प्रस्तुत करना है। हमें शैतान के धोखे में नहीं आना चाहिए।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ४१ और ४२ की तिलावत सुनें।قَالَ هَذَا صِرَاطٌ عَلَيَّ مُسْتَقِيمٌ (41) إِنَّ عِبَادِي لَيْسَ لَكَ عَلَيْهِمْ سُلْطَانٌ إِلَّا مَنِ اتَّبَعَكَ مِنَ الْغَاوِينَ (42)ईश्वर ने कहा, यह सीधा मार्ग है जिसका दायित्व मुझ पर है। (15:41) निश्चित रूप से तू मेरे बंदों पर नियंत्रण नहीं पा सकेगा सिवाय उन पथभ्रष्ठों के जो तेरा अनुसरण करें।(15:42)शैतान ने कहा था कि मैं सभी मनुष्यों को पथभ्रष्ट कर दूंगा और केवल कुछ ही लोग मेरे धोखे से सुरक्षित रहेंगे। इन आयतों में ईश्वर ईमान वालों को सांत्वना देता है कि यह मत सोचो कि तुम शैतान के नियंत्रण में हो और उसके धोखे से बचने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसा नहीं है बल्कि इसके विपरीत ईमान वालों पर नियंत्रण के लिए शैतान के पास कोई मार्ग नहीं है और केवल वही लोग शैतान के धोखे में आते हैं जो पथभ्रष्ट होना चाहते हैं।ईश्वर स्वयं सीधे मार्ग का रक्षक है और उसे हर प्रकार की पथभ्रष्टता से सुरक्षित रखता है। शैतान सत्य को नहीं छिपा सकता कि लोग समझ ही न पाएं कि सत्य क्या है और असत्य क्या है।इन आयतों से हमने सीखा कि पापी अपने चयन से शैतान का अनुसरण करते हैं, शैतान उन्हें पाप करने पर बाध्य नहीं करता। उसका काम बहकाना है, विवश करना नहीं।यदि हम उपासना तथा ईश्वर के भय के साथ उसके सच्चे बंदों में शामिल हो जाएं तो शैतान हम पर नियंत्रण नहीं कर सकेगा और हम पाप एवं पथभ्रष्टता से दूर रहेंगे।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ४३ और ४४ की तिलावत सुनें।وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمَوْعِدُهُمْ أَجْمَعِينَ (43) لَهَا سَبْعَةُ أَبْوَابٍ لِكُلِّ بَابٍ مِنْهُمْ جُزْءٌ مَقْسُومٌ (44)और निश्चित रूप से उन सबका ठिकाना नरक है (15:43) जिसके सात द्वार हैं और हर द्वार पर उन (पथभ्रष्ठों) की एक निर्धारित संख्या बंटी हुई होगी।(15:44)क़ुरआने मजीद की एक विशेषता, लोगों को चेतावनी देना है ताकि लोग, ख़तरों से डरें और उनसे दूर रहें। चेतावनी देना ईश्वरीय पैग़म्बरों का एक महत्वपूर्ण कर्तव्य है जो लोगों के प्रति उनकी सद्भावना का सूचक है। इस आयत में ईश्वर सचेत करता है कि शैतान के अनुसरण का परिणाम, नरक है। अतः इस बात का ध्यान रहे कि सांसारिक मोहमाया तुम्हें अपने जाल में न फंसा ले और एक क्षण के आनंद के कारण मनुष्य सदा के लिए नरक में ग्रस्त हो जाए।नरक के सात द्वार हैं अर्थात मनुष्य की पथभ्रष्टता के कारण अनेक और बहुत विविध हैं। ऐसा नहीं है कि सभी पथभ्रष्ट लोग एक कारण ही से नरक में जाएंगे। शैतान, युवा को किसी बात से पथभ्रष्ट करता है और वृद्ध को किसी अन्य बात से। पुरुषों को किसी मार्ग से और महिलाओं को किसी अन्य मार्ग से। धनवान को किसी चाल से और निर्धन को किसी अन्य चाल से। प्रत्येक दशा में लोगों को बहकाने और पथभ्रष्ट करने के लिए शैतान के पास बहुत अधिक मार्ग हैं और एक व्यक्ति को बहकाने का मार्ग दूसरे से भिन्न होता है।इन आयतों से हमने सीखा कि स्वर्ग की भांति ही नरक के भी दर्जे हैं हर किसी को उसके अपराध के अनुसार ही दण्ड दिया जाएगा।संसार को कर्मों का अंत नहीं समझना चाहिए अन्यथा हम चयन में ग़लती करने लगेंगे। हर चयन में प्रलय को दृष्टिगत रखना चाहिए।