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    सूरए हिज्र, आयतें 45-53, (कार्यक्रम 438)

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    आइये सूरए हिज्र की आयत नंबर ४५, ४६, ४७ और ४८ की तिलावत सुनें।إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ (45) ادْخُلُوهَا بِسَلَامٍ آَمِنِينَ (46) وَنَزَعْنَا مَا فِي صُدُورِهِمْ مِنْ غِلٍّ إِخْوَانًا عَلَى سُرُرٍ مُتَقَابِلِينَ (47) لَا يَمَسُّهُمْ فِيهَا نَصَبٌ وَمَا هُمْ مِنْهَا بِمُخْرَجِينَ (48)निश्चित रूप से ईश्वर से डरने वाले (स्वर्ग के) बाग़ों तथा सोतों के किनारे होंगे। (15:45) (बाग़ों में आते समय कहा जाएगा) इनमें शांति के साथ और निश्चिंत हो कर प्रविष्ट हो जाओ। (15:46) उनके सीनों में जो द्वेष होगा उसे हम समाप्त कर देंगे, वे भाइयों की भांति एक दूसरे के सामने सिंहासनों पर बैठे होंगे। (15:47) वहां न उन्हें किसी प्रकार की पीड़ा का सामना करना पड़ेगा और न ही वे कभी वहां से निकाले जाएंगे।(15:48)इससे पूर्व नरक में पापियों के ठिकाने की ओर संकेत करने के पश्चात इन आयतों में स्वर्ग में पवित्र तथा ईश्वर से डरने वाले लोगों के ठिकाने की ओर संकेत करते हुए कहा गया है कि जो लोग इस संसार में पापों से दूर रहते हैं तथा अपने हृदय में ईश्वर का भय रखते हैं, ईश्वर पारितोषिक स्वरूप उन्हें स्वर्ग की बेहिसाब अनुकंपाओं का पात्र बनाता है तथा उन्हें आत्मिक दृष्टि से शांति, सुरक्षा व संतोष प्रदान करता है।इन आयतों का एक रोचक बिंदु ईमान वालों के हृदय से एक दूसरे के प्रति पाए जाने वाले द्वेष की समाप्ति है और जब तक यह बात व्यवहारिक नहीं हो जाती तब तक स्वर्ग में उनके प्रवेश का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा क्योंकि स्वर्ग द्वेष और लड़ाई-झगड़े का स्थान नहीं है तथा उसमें सभी लोग शांति व सुरक्षा से रहेंगे, इस संसार के ठीक विपरीत जिसमें कभी कभी आराम तो होता है किंतु आत्मिक संतोष नहीं होता और कभी कभी आत्मिक संतोष होता है तो सांसारिक आराम नहीं होता किंतु प्रलय में स्वर्ग वालों को हर प्रकार की अनुकंपा प्राप्त होगी। उन्हें हर प्रकार का आराम भी मिलेगा, आत्मिक संतोष भी प्राप्त होगा और सभी के एक दूसरे के साथ घनिष्ठ संबंध होंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि इस सीमित संसार में पापों से दूरी, अनंत सफलता व कल्याण का कारण बनती है अतः हमें प्रलय को संसार के लिए नहीं बेचना चाहिए।स्वर्ग की अनुकंपाएं, व्यापक आयाम वाली हैं, वहां भौतिक व आध्यात्मिक दृष्टि से, व्यक्तिगत व सामाजिक आयाम से तथा सुरक्षा की दृष्टि से लोगों को असंख्य अनुकंपाएं प्राप्त होंगी किंतु सबसे महत्वपूर्ण बात ईश्वरीय प्रसन्नता है।वह परिवार तथा समाज जिसके सदस्यों के बीच द्वेष व शत्रुता पाई जाती हो, स्वर्ग में नहीं जा सकता। स्वर्ग वालों के बीच द्वेष का कोई अस्तित्व नहीं होगा।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ४९ और ५० की तिलावत सुनें।نَبِّئْ عِبَادِي أَنِّي أَنَا الْغَفُورُ الرَّحِيمُ (49) وَأَنَّ عَذَابِي هُوَ الْعَذَابُ الْأَلِيمُ (50)(हे पैग़म्बर!) मेरे बंदों को सूचना दे दीजिए कि निश्चित रूप से मैं अत्यंत क्षमाशील और दयावान हूं। (15:49) और निश्चित रूप से मेरा दण्ड भी बहुत कड़ा व पीड़ादायक दण्ड है।(15:50)ईश्वर से डरने वाले लोगों को मिलने वाले पारितोषिक के वर्णन के पश्चात ये आयतें पापियों को संबोधित करते हुए कहती हैं कि यदि वे तौबा कर लें और पापों को छोड़ दें तो उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि ईश्वर अत्यंत कृपालु व दयावान है और उनके पापों को क्षमा कर देगा किंतु यदि उन्होंने अपने पाप पर आग्रह किया और पाप करते रहे तो फिर उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि ईश्वर का कड़ा दण्ड उनकी प्रतीक्षा में है जिससे बचने का उनके पास कोई मार्ग न होगा।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बर का दायित्व है कि वे ईश्वरीय दया व प्रेम को लोगों तक पहुंचा दें तथा उन्हें ईश्वरीय कृपा व क्षमा के प्रति आशावान रखें।ईश्वर की दया व कृपा उसके क्रोध व कोप से आगे रहती है किंतु उसकी दया पर घमण्डी नहीं होना चाहिए कि ऐसी स्थिति में नरक हमारा भाग्य बन जाएगा।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ५१, ५२ और ५३ की तिलावत सुनें।وَنَبِّئْهُمْ عَنْ ضَيْفِ إِبْرَاهِيمَ (51) إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا قَالَ إِنَّا مِنْكُمْ وَجِلُونَ (52) قَالُوا لَا تَوْجَلْ إِنَّا نُبَشِّرُكَ بِغُلَامٍ عَلِيمٍ (53)और (हे पैग़म्बर!) लोगों को इब्राहीम के अतिथियों (की घटना) के बारे में सूचना दे दीजिए (15:51) जब वे उनके पास आए और सलाम किया तो इब्राहीम ने कहा कि हम तुम लोगों से भयभीत हैं। (15:52) उन्होंने कहा कि आप भयभीत न हों कि हम आपको एक ज्ञानी पुत्र की शुभ सूचना देते हैं।(15:53)इन आयतों में ईश्वरीय पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की घटना की ओर संकेत किया गया है कि कुछ फ़रिश्ते मानव वेष में उनके पास पहुंचे। वे उन लोगों को पहचान न सके और भयभीत हो गए किंतु उन लोगों ने स्वयं को ईश्वरीय दूत बताया और कहा कि वे उन्हें एक पुत्र की शुभ सूचना देने आए हैं जो भविष्य में ज्ञानियों में से होगा तथा उनका नाम इतिहास में अमर कर देगा।रोचक बात यह है कि ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के दोनों पुत्रों के बारे में शुभ सूचना दी है। पहली बार उनकी पत्नी हाजेरा से जन्म लेने वाले इस्माईल नामक पुत्र की और इस बार उनकी पत्नी सारा से जन्म लेने वाले पुत्र इस्हाक़ की। हज़रत इस्माईल के बारे में ईश्वर ने कहा है कि वे विनम्र पुत्र होंगे जबकि हज़रत इस्हाक़ के बारे में ज्ञानी पुत्र कहा गया है।ये शुभ सूचनाएं इस कारण दी गई थीं कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम, वृद्धावस्था में थे और साधारणतः उनके यहां संतान होने की कोई संभावना नहीं थी किंतु ईश्वर अपने पवित्र बंदों पर विशेष कृपा करता है, उनकी प्रार्थनाओं को स्वीकार करता है तथा उन्हें इस प्रकार की पवित्र संतान प्रदान करता है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की इच्छा से कभी कभी फ़रिश्ते मनुष्य के रूप में प्रकट होते हैं और संभव है कि उन्हें पहचाना न जा सके, जिस प्रकार से हज़रत इब्राहीम उन्हें नहीं पहचान सके थे, जबकि वे पैग़म्बर थे।सलाम करना, एक ईश्वरीय संस्कार है। फ़रिश्तों ने भी हज़रत इब्राहीम से भेंट के अवसर पर उन्हें पहले सलाम ही किया था।पैग़म्बरों के जीवन का इतिहास, पवित्र लोगों पर ईश्वरीय दया व कृपा का उत्तम उदाहरण है।