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    सूरए हिज्र, आयतें 54-64, (कार्यक्रम 439)

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    आइये सूरए हिज्र की आयत नंबर ५४, ५५ और ५६ की तिलावत सुनें।

    قَالَ أَبَشَّرْتُمُونِي عَلَى أَنْ مَسَّنِيَ الْكِبَرُ فَبِمَ تُبَشِّرُونَ (54) قَالُوا بَشَّرْنَاكَ بِالْحَقِّ فَلَا تَكُنْ مِنَ الْقَانِطِينَ (55) قَالَ وَمَنْ يَقْنَطُ مِنْ رَحْمَةِ رَبِّهِ إِلَّا الضَّالُّونَ (56)हज़रत इब्राहीम ने कहा क्या तुम मुझे वृद्धावस्था तक पहुंच जाने के बाद इस प्रकार की शुभ सूचना दे रहे? तो तुम किस बात की शुभ सूचना दे रहे हो? (15:54) फ़रिश्तों ने कहा, हम आपको सत्य की शुभ सूचना दे रहे हैं और आप निराश लोगों में शामिल न हो जाइए। (15:55) उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से पथभ्रष्ठों के अतिरिक्त कौन अपने पालनहार की दया की ओर से निराश हो सकता है? (15:56)इससे पहले बताया गया कि कुछ फ़रिश्ते मनुष्यों के वेष में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास पहुंचे और चूंकि वे उन्हें पहचान नहीं सके अतः घबरा गए किंतु उन लोगों ने अपना परिचय दिया और कहा कि वे उनके पालनहार की ओर से एक शुभ सूचना ले कर आए हैं और वह यह है कि उनके यहां एक पुत्र जन्म लेगा।ये आयतें कहती हैं कि हज़रत इब्राहीम ने उनकी शुभ सूचना के उत्तर में कहा कि पुत्र के जन्म की शुभ सूचना और वह भी वृद्धावस्था में, एक विचित्र बात है किंतु उन्होंने कहा कि यह शुभ सूचना सत्य है और वास्तविक हो कर रहेगी तथा किसी को भी, चाहे वह जिस आयु का भी हो, ईश्वर की दया और कृपा की ओर से निराश नहीं होना चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर को विवश नहीं समझना चाहिए क्योंकि उसके लिए कोई भी बात असंभव नहीं है, अलबत्ता स्वाभाविक है कि मनुष्य को असाधारण बातों पर आश्चर्य होता है चाहे वह किसी पैग़म्बर की ओर से ही क्यों न हो और यह बात एकेश्वरवाद की आस्था से विरोधाभास नहीं रखती।पैग़म्बरों के लिए ईश्वर का यह संबोधन कि तुम निराश लोगों में शामिल न हो जाओ, उन्हें सचेत करने के लिए है और इसका अर्थ यह नहीं है कि वे निराश लोगों में शामिल ही हो जाते।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ५७ और ५८ की तिलावत सुनें।قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا الْمُرْسَلُونَ (57) قَالُوا إِنَّا أُرْسِلْنَا إِلَى قَوْمٍ مُجْرِمِينَ (58)(इसके बाद हज़रत इब्राहीम ने) कहा कि हे ईश्वर के संदेशवाहको! तुम्हारा दायित्व क्या है? (15:57) उन्होंने कहा कि हमें एक पापी जाति की ओर भेजा गया है।(15:58)हज़रत इब्राहीम तथा फ़रिश्तों के बीच होने वाली वार्ता से पता चलता है कि फ़रिश्तों के आने का मुख्य लक्ष्य, हज़रत इब्राहीम को शुभ सूचना नहीं देना था बल्कि उन पर लूत जाति को समाप्त करने का दायित्व था। उल्लेखनीय है कि हज़रत लूत, जिन पर उक्त जाति के मार्गदर्शन का दायित्व था, उन पैग़म्बरों में से थे जो हज़रत इब्राहीम के अधीन थे। इसी कारण फ़रिश्ते पहले हज़रत इब्राहीम की सेवा में उपस्थित हुए और उन्हें इस विषय की सूचना दी ताकि उन्हें ईश्वर के आदेश का ज्ञान हो जाए।इन आयतों से हमने सीखा कि फ़रिश्तों पर सृष्टि की व्यवस्था चलाने तथा ईश्वर के आदेशों को लागू करने का दायित्व है। वे ईमान वालों के लिए प्रार्थना तथा उनके पापों को क्षमा किए जाने की दुआ करते हैं तथा पापियों को ईश्वरीय दण्ड में ग्रस्त करते हैं।यदि कोई पाप लोगों के बीच व्यापक रूप से प्रचलित हो जाए तो ईश्वरीय दण्ड का आना निश्चित है तथा लोगों को इसी संसार में दण्डित किया जाएगा।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ५९ और ६० की तिलावत सुनें।إِلَّا آَلَ لُوطٍ إِنَّا لَمُنَجُّوهُمْ أَجْمَعِينَ (59) إِلَّا امْرَأَتَهُ قَدَّرْنَا إِنَّهَا لَمِنَ الْغَابِرِينَ (60)सिवाय लूत के परिवार के जिनमें से सबको हम बचा लेंगे (15:59) सिवाय उनकी पत्नी के जिसके लिए हमने यह निर्धारित कर दिया है कि वह तबाह होने वालों में से होगी।(15:60)स्वाभाविक है कि यदि ईश्वर किसी नगर को नष्ट करता है तो उसके अच्छे और बुरे लोगों में कोई अंतर नहीं रहता और सभी लोग मारे जाते हैं, इसी कारण फ़रिश्तों ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से कहा कि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम का परिवार जो पापी नहीं था, दण्ड का पात्र नहीं बनेगा और हमने उन्हें दण्ड आने की सूचना पहले ही दे दी है ताकि वे नगर से निकल जाएं।अलबत्ता हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की पत्नी, जो उनकी शत्रु थी और उनके कार्यक्रमों की सूचना उनके शत्रुओं तक पहुंचा दिया करती थी, इस दण्ड में लोगों की सहभागी थी अतः हज़रत लूत के परिजनों के नगर से निकलने की बात उसे ज्ञात नहीं होनी चाहिए थी ताकि वह नगर में ही रुकी रहे और दण्ड की पात्र बने।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों के वास्तविक अनुयायी, सांसारिक दण्ड से भी सुरक्षित रहते हैं और ईश्वर उनकी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।पैग़म्बरों के मत में मूल बात संबंध नहीं बल्कि सिद्धांत है तथा मत का संबंध मानवीय संबंधों से श्रेष्ठ होता है इसी कारण हज़रत लूत की पत्नी दण्ड में ग्रस्त हुई।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ६१ से ६4 तक की तिलावत सुनें।فَلَمَّا جَاءَ آَلَ لُوطٍ الْمُرْسَلُونَ (61) قَالَ إِنَّكُمْ قَوْمٌ مُنْكَرُونَ (62) قَالُوا بَلْ جِئْنَاكَ بِمَا كَانُوا فِيهِ يَمْتَرُونَ (63) وَأَتَيْنَاكَ بِالْحَقِّ وَإِنَّا لَصَادِقُونَ (64)तो जब ईश्वर के भेजे हुए दूत, लूत के परिजनों के पास आए (15:61) तो हज़रत लूत ने कहा कि तुम अपरिचित लोगों में से हो, (15:62) उन्होंने कहा कि नहीं, बल्कि हम तो आपके पास वही वस्तु लेकर आए हैं जिसमें आपकी जाति के लोग संदेह किया करते थे। (15:63) हम आपके पास एक अटल वास्तविकता लेकर आए हैं और निश्चित रूप से हम सच्चे हैं।(15:64)जैसा कि हमने कहा, ईश्वरीय फ़रिश्तों का मुख्य दायित्व हज़रत लूत की जाति को तबाह करना था और हज़रत इब्राहीम के पास उनका आना बड़े पैग़म्बर के सम्मान के कारण था, यद्यपि उन्होंने हज़रत लूत की जाति की तबाही से पूर्व उन्हें पुत्र के जन्म की शुभ सूचना भी दी थी।प्रत्येक दशा में फ़रिश्ते हज़रत इब्राहीम के पास आने के बाद हज़रत लूत के पास गए और वे भी हज़रत इब्राहीम की भांति उन्हें पहचान नहीं पाए और चूंकि फ़रिश्ते सुंदर युवाओं के रूप में आए थे, अतः हज़रत लूत को भय हुआ कि कहीं उनकी जाति के लोग उनके साथ दुर्व्यवहार न करें किंतु उन्होंने अपना परिचय देने के बाद कहा कि जिस दण्ड का आपकी जाति इन्कार कर रही थी, हम वही दण्ड लेकर आए हैं और यह ईश्वर का अटल वचन है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय चेतावनियों को मज़ाक़ नहीं समझना चाहिए तथा उनके बारे में तनिक भी संदेह नहीं करना चाहिए क्योंकि हो सकता है कि हम दण्ड में ग्रस्त हो जाएं।ईश्वरीय दण्ड न्याय के आधार पर और पापियों के पाप के अनुसार होता है।