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    सूरए हिज्र, आयतें 65-73, (कार्यक्रम 440)

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    आइये सूरए हिज्र की आयत नंबर ६५ और ६६ की तिलावत सुनें।فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ وَاتَّبِعْ أَدْبَارَهُمْ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ وَامْضُوا حَيْثُ تُؤْمَرُونَ (65) وَقَضَيْنَا إِلَيْهِ ذَلِكَ الْأَمْرَ أَنَّ دَابِرَ هَؤُلَاءِ مَقْطُوعٌ مُصْبِحِينَ (66)हे लूत! अपने परिवार वालों को लेकर रात के किसी भाग में निकल जाओ और स्वयं उनके पीछे-पीछे चलो तथा तुममें से कोई भी पीछे मुड़ कर न देखे और जिस ओर तुम्हें आदेश दिया गया है चलते चले जाओ। (15:65) और हमने उन तक अपनी यह निश्चित बात पहुंचा दी कि भोर समय तक इस गुट की जड़ कट चुकी होगी।(15:66)इससे पहले हमने कहा था कि ईश्वरीय फ़रिश्ते हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से भेंट के पश्चात हज़रत लूत के पास गए तथा उन्हें, उनकी जाति के विनाश की सूचना दी। इस आयत में फ़रिश्ते हज़रत लूत तथा उनके परिवार में ईमान वाले लोगों के नगर से निकलने के समय तथा शैली की घोषणा करते हैं और उन्हें बताते हैं कि इस दुष्ट एवं व्यभिचारी जाति के विनाश के संबंध में ईश्वर का वचन अटल है।जी हां! जो लोग ईश्वरीय दण्ड का परिहास करते हैं और ईश्वरीय पैग़म्बरों की चेतावनियों के बावजूद यह कहते हें कि यदि तुम लोग सच कह रहे हो तो ईश्वर से कहो कि वह यथाशीघ्र हमें दण्डित करे, वे इस बात के योग्य हैं कि उन्हें इसी संसार में ईश्वरीय कोप का पात्र बनाया जाए।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के दण्ड में गेहूं के साथ घुन नहीं पिसता और केवल पापी ही दण्ड में ग्रस्त होते हैं जबकि ईमान वाले ईश्वरीय युक्ति से मुक्ति पा जाते हैं।जब पाप व्यक्तिगत स्थिति से निकल कर सार्वजनिक हो जाए तो फिर ईश्वरीय दण्ड की प्रतीक्षा करनी चाहिए।आइए अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ६7 से ६9 की तिलावत सुनें।وَجَاءَ أَهْلُ الْمَدِينَةِ يَسْتَبْشِرُونَ (67) قَالَ إِنَّ هَؤُلَاءِ ضَيْفِي فَلَا تَفْضَحُونِ (68) وَاتَّقُوا اللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ (69)और (इतने में) नगर के लोग ख़ुशी मनाते हुए (हज़रत लूत के घर तक) पहुंच गए।(15:67) हज़रत लूत ने कहा निश्चित रूप से ये मेरे अतिथि हैं तो मेरा अपमान न करो, (15:68) और ईश्वर से डरो तथा मुझे लज्जित व अपमानित न करो।(15:69)फ़रिश्तों के हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के घर में आने के बाद उनकी पत्नी ने, जो उनके शत्रुओं से सहयोग कर रही थी, उन्हें जा कर सूचना दे दी कि इस प्रकार के अतिथि हज़रत लूत के घर में आए हैं। उन लोगों ने अपनी अवैध इच्छाओं की पूर्ति के लिए हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के घर का घेराव कर लिया। हज़रत लूत अपने विरोधियों के पास गए और उनसे कहा कि ये लोग मेरे अतिथि हैं अतः ऐसा कोई काम न करो जिससे मुझे लज्जित होना पड़े।इन आयतों से हमने सीखा कि पापी समाज के लोग एक दूसरे को पाप करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं तथा पाप करने पर एक दूसरे को बधाई देते हैं।अतिथि का एक विशेष सम्मान होता है और मेज़बान का दायित्व है कि उसके सम्मान तथा अधिकार की रक्षा करे।आइए अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ७० और ७१ की तिलावत सुनें।قَالُوا أَوَلَمْ نَنْهَكَ عَنِ الْعَالَمِينَ (70) قَالَ هَؤُلَاءِ بَنَاتِي إِنْ كُنْتُمْ فَاعِلِينَ (71)उन्होंने कहा, हे लूत! क्या हमने तुम्हें संसार के लोगों (को अतिथि बनाने) से नहीं रोका है? (15:70) उन्होंने कहा कि यदि तुम वासना की पूर्ति करना चाहते हो तो ये (मेरी जाति की) बेटियां हैं, (तुम इनसे वैध रूप से विवाह कर सकते हो) (15:71)हज़रत लूत द्वारा अपनी जाति के लोगों को अपने अतिथियों के अनादर से रोके जाने के बाद उन लोगों ने उनसे कहा कि आपको इस बात का अधिकार नहीं था इन लोगों को अपना अतिथि बनाएं अतः इन्हें अपने घर से निकाल कर हमारे हवाले कर दीजिए। हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने, जो उन लोगों की भ्रष्ट नीयत से अवगत थे, कहा कि यदि तुम अपनी आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति ही करना चाहते हो तो मेरी जाति की लड़कियों से विवाह कर लो और पाप की बुराई से भी बच जाओ तथा मेरे अतिथियों का भी अनादर न करो।हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने उनसे कहा कि अपनी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए विवाह जैसे प्राकृतिक मार्ग पर चलने के स्थान पर वे क्यों समलैंगिकता में ग्रस्त हैं? किंतु स्पष्ट सी बात है कि उनके पास अपने अवैध कर्म का कोई औचित्य नहीं था और वे केवल अपनी मांग पर ही आग्रह करते रहे।इन आयतों से हमने सीखा कि यदि समाज भ्रष्ट हो जाए तो कभी कभी अपराधी और पापी ऐसे दावेदारों में परिवर्तित हो जाते हैं जो पवित्र व भले लोगों पर दबाव डाल कर उनसे अपनी बुराइयों व पापों में सहयोग करने की आशा रखते हैं।लोगों को पापों से दूर रखने के लिए पहले उन्हें सही, वैध एवं हलाल मार्गों से अवगत कराना चाहिए, फिर पाप से रोकना चाहिए क्योंकि ईश्वरीय मत में आवश्यक इच्छाओं को कुचला नहीं जाता बल्कि उनसे सही लाभ उठाने हेतु मनुष्य का मार्गदर्शन किया जाता है।आइए अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ७२ और ७३ की तिलावत सुनें।لَعَمْرُكَ إِنَّهُمْ لَفِي سَكْرَتِهِمْ يَعْمَهُونَ (72) فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ مُشْرِقِينَ (73)(हे पैग़म्बर!) आपकी सौगंध! कि वे लोग नशे में चूर थे (15:72) तो भोर समय एक विनाश करने वाली चिंघाड़ ने उन्हें आ लिया।(15:73)यद्यपि हज़रत लूत ने अपनी जाति के व्यभिचारी लोगों को सही प्रस्ताव दिया था किंतु पापी केवल अपराध करना चाहते थे और पाप के आनंद ने उन्हें इस प्रकार नशे में चूर कर रखा था कि वे सत्य को देख ही नहीं पा रहे थे और वे सत्य को पहचानने की क्षमता खो बैठे थे।इन परिस्थितियों में ईश्वर ने हज़रत लूत की जाति के पास अपना दण्ड भेजा। एक आसमानी चिंघाड़ ने, जो भीषण भूकंप का कारण बनी, उन सभी को समाप्त कर दिया ताकि वे भविष्य में आने वाले सभी लोगों तथा उन लोगों के लिए शिक्षा सामग्री बन जाएं जो भलाई को बुराई और बुराई को भलाई समझते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि पाप, नशे की भांति मनुष्य की बुद्धि को कुंठ बना देता है, यहां तक कि वह पथभ्रष्टता को समझ नहीं पाता और उसी की ओर आगे बढ़ता रहता है।ईश्वरीय दण्ड प्रलय से विशेष नहीं हैं और पापी जातियों को इस संसार में भी दण्ड का पात्र बनना पड़ता है।