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    सूरए हिज्र, आयतें 7-11, (कार्यक्रम 432)

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    आइये पहले सूरए हिज्र की आयत नंबर ७ और ८ की तिलावत सुनें।لَوْ مَا تَأْتِينَا بِالْمَلَائِكَةِ إِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِقِينَ (7) مَا نُنَزِّلُ الْمَلَائِكَةَ إِلَّا بِالْحَقِّ وَمَا كَانُوا إِذًا مُنْظَرِينَ (8)(विरोधियों ने कहा, हे पैग़म्बर!) यदि आप सच बोल रहे हैं तो फ़रिश्तों को हमारे पास क्यों नहीं लाते?(15:7) (जबकि) हम तो फ़रिश्तों को केवल सत्य के आधार पर ही भेजते हैं और ऐसी स्थिति में उन्हें कोई मोहलत नहीं दी जाएगी।(15:8)इससे पहले बताया गया था कि पैग़म्बरों के विरोधी, जो उनके स्पष्ट तर्कों तथा प्राकृतिक शिक्षाओं का मुक़ाबला करने की क्षमता नहीं रखते, उनका अनादर तथा परिहास करते हुए उनके बारे में कुछ अनुचित शब्दों का प्रयोग करते हैं, उदाहरण स्वरूप वे उन्हें पागल कहते हैं और स्वयं को बुद्धिमान समझते हैं।ये आयतें उनकी तर्कहीन बातों की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि वे सत्य को स्वीकार करने के लिए फ़रिश्तों को देखने और ईश्वर की वाणी को सीधे अपने कानों से सुनने की मांग करते हैं जबकि यदि कोई पैग़म्बर की बात को न मानना चाहे तो वह फ़रिश्ते की बात को भी स्वीकार नहीं करेगा और विभिन्न प्रकार के बहाने बनाएगा।इसके अतिरिक्त इस बात का कोई अर्थ ही नहीं है कि ईश्वर, ईमान लाने वाले हर व्यक्ति की मांग को पूरा करे और उदाहरण स्वरूप उसके पास फ़रिश्ता भेजे। महत्वपूर्ण बात पैग़म्बरों के चमत्कार, उनकी सत्य बातें तथा तर्क हैं जो यदि संतोषजनक हैं तो उन्हें स्वीकार करना चाहिए अन्यथा रद्द कर देना चाहिए। पैग़म्बरी का दावा करने वाले की बातें तर्कसंगत न हों तो यदि उसके साथ दस फ़रिश्ते भी दिखाई दें तो उसकी बातों को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि आज भी बहुत से ऐसे जादूगर हैं जो विचित्र काम करके दिखाते हैं किंतु केवल इस आधार पर उनकी बातों पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि उनकी बातों का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है।आगे चलकर आयतें कहती हैं कि यदि ईश्वर विरोधियों की बात स्वीकार कर लेता और किसी फ़रिश्ते को भेज देता तो उनके पास धर्म को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई मार्ग न बचता और यदि वे इसके बाद भी विरोध करते तो तुरंत ही ईश्वरीय दण्ड आ जाता और यह बात विरोधियों को मोहलत देने की ईश्वर की परंपरा से मेल नहीं खाती है।इन आयतों से हमने सीखा कि विरोधियों तथा काफ़िरों की ओर से बनाए जाने वाले बहानों पर ध्यान नहीं देना चाहिए क्योंकि यदि उनकी एक मांग को स्वीकार कर लिया जाए तो वे दूसरी मांग प्रस्तुत कर देंगे।फ़रिश्तों को लोगों की मांग तथा उनकी इच्छा पर नहीं भेजा जाता बल्कि यह कार्य ईश्वर की इच्छा से तथा आवश्यकता के अनुसार होता है।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ९ की तिलावत सुनें।إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذِّكْرَ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ (9)निश्चित रूप से हमने ही क़ुरआन को उतारा है और निसंदेह हम ही उसकी रक्षा करने वाले हैं।(15:9)विरोधियों की ओर से लगाए जाने वाले आरोपों तथा उनके बुरे व्यवहार के संबंध में ईश्वर, ईमान वालों को सांत्वना देते हुए कहता है कि तुम्हें क़ुरआने मजीद की सत्यता में कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि इसे हमने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के हृदय पर उतारा है और हम ही इसकी रक्षा करने वाले हैं।इस आधार पर क़ुरआने मजीद में, उसके उतरने के समय, लिखे जाने के समय और लोगों के सामने प्रस्तुत किए जाने के समय, किसी प्रकार का फेर बदल नहीं हुआ है और ईश्वर इस बात की कदापि अनुमति नहीं देगा कि उसमें कण बराबर भी परिवर्तन हो। इतिहास भी इस बात का साक्षी है क्योंकि सदैव ही बड़ी संख्या में मुसलमान क़ुरआने मजीद को कंठस्थ करते रहे हैं और नमाज़ तथा अन्य अवसरों पर उसे पढ़ते रहे हैं। क़ुरआने मजीद को लिखने वाले भी अनेक लोग थे तथा वे अपने लिखे हुए क़ुरआन की अन्य लोगों द्वारा लिखे गए क़ुरआन से तुलना करते रहे हैं ताकि इस पवित्र ग्रंथ में किसी भी प्रकार का परिवर्तन न होने पाए।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद, ईश्वरीय कथन है तथा मनुष्य को निश्चेतना से बाहर निकालता है जो उसकी हर प्रकार की बुराई की जड़ है।अन्य आसमानी किताबों के मुक़ाबले में क़ुरआने मजीद की एक विशेषता उसका हर प्रकार के फेर बदल तथा परिवर्तन से सुरक्षित रहना है।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर 10 और 11 की तिलावत सुनें।وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ فِي شِيَعِ الْأَوَّلِينَ (10) وَمَا يَأْتِيهِمْ مِنْ رَسُولٍ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ (11)और (हे पैग़म्बर!) निश्चित रूप से हमने आपसे पूर्व (भी) पिछली जातियों में (पैग़म्बर) भेजे (15:10) और उनके लिए जो भी पैग़म्बर भेजा गया उन्होंने उसका अवश्य ही परिहास किया।(15:11)ईश्वर की एक परंपरा लोगों के बीच पैग़म्बर भेजने की रही है और उसने विभिन्न जातियों में अनेक पैग़म्बर भेजे हैं। इनमें से अधिकांश पैग़म्बर ऐसे थे जो वरिष्ठ पैग़म्बरों द्वारा लाए गए धर्म तथा किताब का प्रचार करते थे और लोगों को उनकी ओर बुलाते थे। इन सभी पैग़म्बरों को समान रूप से जिस समस्या का सामना था वह लोगों के कुछ गुटों की ओर से विरोध था जो अपमान, आरोप और तिरस्कार के माध्यम से लोगों को ईश्वरीय निमंत्रण स्वीकार करने तथा ईमान लाने नहीं देता था।ये आयतें इन बिंदुओं का उल्लेख करके, ईमान वालों को सचेत करती हैं कि वे कदापि निराशा में ग्रस्त होकर अपने धर्म व ईमान को न छोड़ दें बल्कि यह जान लें कि पूरे इतिहास में यह विरोधियों की शैली रही है। वे पैग़म्बरों के स्पष्ट तर्क के मुक़ाबले में अपनी कमज़ोरी को छिपाने के लिए उनका परिहास करते थे और उनके तथा उनके अनुयाइयों के सरल व सादा जीवन को निशाना बनाते थे।इन आयतों से हमने सीखा कि यदि इतिहास का अध्ययन करके पिछले लोगों की समस्याओं पर ध्यान दिया जाए तो मनुष्य के लिए कठिनाइयों को सहन करना सरल हो जाएगा।यद्यपि विरोधी, ईश्वर की ओर से भेजे जाने वाले हर पैग़म्बर का परिहास करते थे किंतु ईश्वर ने मानव समाज में निरंतर पैग़म्बर भेजे क्योंकि हर समय और हर स्थान के लोगों को मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है और यह भी कि प्रलय में कोई इस संबंध में बहाना न बना सके।