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    सूरए हिज्र, आयतें 74-84, (कार्यक्रम 441)

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    आइये पहले सूरए हिज्र की आयत नंबर ७४ से ७७ तक की तिलावत सुनें।فَجَعَلْنَا عَالِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهِمْ حِجَارَةً مِنْ سِجِّيلٍ (74) إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَاتٍ لِلْمُتَوَسِّمِينَ (75) وَإِنَّهَا لَبِسَبِيلٍ مُقِيمٍ (76) إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَةً لِلْمُؤْمِنِينَ (77)तो हमने उस नगर को उलट-पलट कर रख दिया और उन लोगों पर पत्थरों की वर्षा कर दी।(15:74) निश्चित रूप से इस घटना में बुद्धिमान व प्रवीण लोगों के लिए स्पष्ट निशानियां हैं। (15:75) उनकी धरती के खण्डहर अब भी मार्ग के किनारे बाक़ी बचे हुए हैं।(15:76) निश्चित रूप से इस (घटना) में ईमान वालों के लिए स्पष्ट निशानी है।(15:77)इससे कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की जाति ईश्वरीय दण्ड में ग्रस्त हुई और भोर समय एक भीषण चिंघाड़ ने पूरे नगर को अपनी लपेट में ले लिया जिसके बाद नगर के लोग नशे में चूर लोगों की भांति हो गए। ये आयतें कहती हैं कि चिंघाड़ के साथ ही एक भीषण भूकंप भी आया जिसने पूरे नगर को अपनी लपेट में ले लिया और गहरी नींद में सो रहे लोगों पर उनके घर आ गिरे। इसी के साथ उस नगर पर पत्थरों की वर्षा भी होने लगी ताकि यदि कोई मलबे के नीचे आने से बच गया हो और शरण की खोज में हो तो वह भी इन आसमानी पत्थरों का निशाना बन कर हताहत हो जाए।आगे चलकर आयतें कहती हैं कि इस जाति के नगर के खण्डहर अब भी बाक़ी हैं और उसके किनारे से कारवान ग़ुज़रते रहते हैं किंतु केवल बुद्धिमान लोग ही जो, इस प्रकार के अवशेष देख कर वास्तविकता को समझ जाते हैं, खण्डहरों से शिक्षा लेते हैं क्योंकि ये इस संसार में ईश्वरीय शक्ति और उसके वचनों के व्यवहारिक होने की निशानियां हैं जिनसे लोगों का ईमान सुदृढ़ होता है।इन आयतों से हमने सीखा कि जो ईश्वर आकाश से दया की वर्षा करता है वही पत्थरों की वर्षा भी कर सकता है ताकि किसी दुष्ट एवं पापी जाति को तबाह कर दे।पिछली जातियों के अवशेष, आगामी पीढ़ियों के लिए शिक्षा सामग्री और पाठ का कारण होने चाहिए।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ७८ और ७९ की तिलावत सुनें।وَإِنْ كَانَ أَصْحَابُ الْأَيْكَةِ لَظَالِمِينَ (78) فَانْتَقَمْنَا مِنْهُمْ وَإِنَّهُمَا لَبِإِمَامٍ مُبِينٍ (79)और निश्चित रूप से ऐका की धरती के लोग अत्याचारी थे। (15:78) अतः हमने उनसे प्रतिशोध लिया और निसंदेह लूत व ऐका जाति (के खण्डहर) तुम्हारे मार्ग में स्पष्ट हैं।(15:79)हज़रत लूत अलैहिस्सलाम की जाति के बाद इन आयतों में हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की जाति की ओर संकेत किया गया है। यह जाति बहुत ही हरे-भरे क्षेत्र में जीवन व्यतीत करती थी और इस जाति को ऐका कहा जाता था। ऐका का अर्थ झाड़ी और जंगल है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि यह क्षेत्र मदयन के अतिरिक्त था और हज़रत शुऐब ऐका तथा मदयन दोनों क्षेत्रों के पैग़म्बर थे।यद्यपि इन आयतों में इस जाति द्वारा किए जाने वाले पाप की ओर संकेत नहीं किया गया है किंतु इसके लिए अत्याचारी शब्द का प्रयोग किया गया है और अत्याचार में हर प्रकार का पाप और अपराध शामिल होता है। प्रत्येक दशा में हर पाप पहले चरण में स्वयं पापी पर अत्याचार है और फिर धर्म पर अत्याचार है।पिछली आयतों में कहा गया कि हज़रत लूत की जाति के नगर के खण्डहर अब भी बाक़ी हैं, ये आयतें भी कहती हैं कि इस जाति के अवशेष तुम्हारे सामने हैं और तुम्हें उनसे पाठ सीखना चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि अत्याचार का परिणाम, तबाही के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। शायद व्यक्तिगत अत्याचार, सांसारिक दण्ड का कारण न बने किंतु जब अत्याचार सार्वजनिक हो जाता है और एक समाज के अधिकांश लोग अत्याचारी हो जाते हैं तो तबाही और अपमान उनका भाग्य बन जाता है।अच्छे या बुरे, पिछले लोगों के ऐतिहासिक अवशेषों को सुरक्षित रखना आवश्यक है ताकि वे लोगों के लिए पाठ बन जाएं।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ८० से ८४ तक की तिलावत सुनें।وَلَقَدْ كَذَّبَ أَصْحَابُ الْحِجْرِ الْمُرْسَلِينَ (80) وَآَتَيْنَاهُمْ آَيَاتِنَا فَكَانُوا عَنْهَا مُعْرِضِينَ (81) وَكَانُوا يَنْحِتُونَ مِنَ الْجِبَالِ بُيُوتًا آَمِنِينَ (82) فَأَخَذَتْهُمُ الصَّيْحَةُ مُصْبِحِينَ (83) فَمَا أَغْنَى عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَكْسِبُونَ (84)और निश्चित रूप से हिज्र के लोगों ने भी पैग़म्बरों को झुठलाया।(15:80) हमने उन्हें अपनी निशानियां दिखाईं किंतु उन्होंने उनसे मुंह मोड़ लिया। (15:81) वे पर्वतों के बीच में अपने लिए सुरक्षित घर बनाते थे, (15:82) तो भोर समय एक विनाशकारी चिंघाड़ ने उन्हें आ लिया (15:83) और जो कुछ वे कमाते रहे थे वह उनके काम न आया (और उन्हें दण्ड से बचा न पाया।) (15:84)हज़रत लूत और हज़रत शुऐब की जातियों के बाद ये आयतें समूद नामक जाति की ओर संकेत करती हैं। चूंकि यह जाति हिज्र नामक पर्वतीय क्षेत्र में रहती थी इस लिए इस जाति के लोगों को हिज्र वाले कहा जाता था। ये आयतें कहती हैं कि पैग़म्बरों को झुठलाना और ईश्वरीय निशानियों तथा चमत्कारों की ओर से मुंह मोड़ लेना उनकी आदत बन चुकी थी तथा वे किसी भी पैग़म्बर के निमंत्रण व मार्गदर्शन पर तनिक भी ध्यान नहीं देते थे। हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम इस जाति के पैग़म्बर थे और उन्होंने अपनी जाति के लोगों को जितनी भी नसीहत की, उन पर उसका कोई भी प्रभाव नहीं हुआ।हिज्र वाले या समूद जाति के लोग भी हज़रत लूत तथा हज़रत शुऐब की जातियों की भांति सांसारिक दण्ड में ग्रस्त हुए और एक विनाशकारी चिंघाड़ ने उन सबको मौत की नींद सुला दिया। रोचक बात यह है कि इस जाति के लोग पर्वतों के बीच में अपने विचार में अपने लिए अत्यंत सुरक्षित घरों का निर्माण करते थे किंतु ईश्वरीय दण्ड के मुक़ाबले में ये सुरक्षित घर भी उनकी रक्षा नहीं कर सके और वे सबके सब मारे गए।इन आयतों से हमने सीखा कि द्वेष व हठधर्म, पैग़म्बरों के विरोध तथा ईश्वर के इन्कार का कारण बनता है अन्यथा पैग़म्बरों की बातें अत्यंत स्पष्ट और स्वीकार करने योग्य होती हैं।ईश्वरीय इच्छा के सामने कोई भी वस्तु टिक नहीं सकती। हमें अपनी सांसारिक धन-संपत्ति, शक्ति और संभावनाओं पर भरोसा नहीं करना चाहिए कि ये सभी ईश्वरीय दण्ड से हमारी रक्षा नहीं सकतीं।