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    सूरए हिज्र, आयतें 85-89, (कार्यक्रम 442)

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    आइये पहले सूरए हिज्र की आयत नंबर ८५ और ८६ तक की तिलावत सुनें।وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا إِلَّا بِالْحَقِّ وَإِنَّ السَّاعَةَ لَآَتِيَةٌ فَاصْفَحِ الصَّفْحَ الْجَمِيلَ (85) إِنَّ رَبَّكَ هُوَ الْخَلَّاقُ الْعَلِيمُ (86)और निश्चित रूप से हमने आकाशों और धरती की तथा जो कुछ उनके बीच है केवल सत्य के साथ ही रचना की है और प्रलय का आना निश्चित है तो हे पैग़म्बर! आप (लोगों की ग़लतियों की) भले ढंग से अनदेखी कीजिए। (15:85) निसंदेह आपका पालनहार ही ज्ञानी रचयिता है।(15:86)इससे पहले तथा सूरए हिज्र की पिछली आयतों तक में लूत तथा समूद जैसी विभिन्न जातियों के अंत का वर्णन किया गया। इस आयत में और इसके बाद की आयतों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम तथा मुसलमानों को संबोधित किया गया है और कहा गया है कि वे पिछली जातियों के अंत से भी पाठ सीखें तथा ईश्वरीय शिक्षाओं से द्वेष व हठधर्मी न करें तथा अपने विरोधियों के संबंध में उचित शैली भी अपनाएं।ये आयतें ज्ञानी व सक्षम ईश्वर के हाथों सृष्टि की रचना तथा प्रलय के सत्य होने की ओर संकेत करते हुए ईमान वालों से कहती है कि वे अपने विरोधियों को क्षमा कर दिया करें तथा उनकी बुराइयों को अनदेखा करने का व्यवहार अपनाएं।इन आयतों से हमने सीखा कि सृष्टि का एक निर्धारित लक्ष्य है जो प्रलय में सबकी उपस्थिति पर आधारित है।दूसरों को क्षमा करने तथा शिष्टाचार के संबंध में इस्लामी शिक्षाओं का आधार सृष्टि के आरंभ तथा प्रलय पर ईमान है। यदि प्रलय सत्य है और प्रत्येक व्यक्ति के कर्मों का हिसाब-किताब किया जाएगा तो ईमान वालों को क्षमा करना चाहिए ताकि ईश्वर हमें क्षमा करे और काफ़िरों को भी क्षमा करना चाहिए क्योंकि ईश्वर उनका भी हिसाब-किताब करने वाला है।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ८७ की तिलावत सुनें।وَلَقَدْ آَتَيْنَاكَ سَبْعًا مِنَ الْمَثَانِي وَالْقُرْآَنَ الْعَظِيمَ (87)और हे पैग़म्बर! निश्चित रूप से हमने आपको सूरए हम्द तथा महान क़ुरआन प्रदान किया है। (15:87)धरती व आकाशों की रचना तथा सृष्टि के आरंभ के बारे में वर्णन के पश्चात ये आयत धर्म की महान किताब अर्थात क़ुरआन मजीद की महानता की ओर संकेत करती है। इस आयत में सूरए हम्द के लिए सब्ए मसानी के शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है दो बार आने वाला सात। चूंकि सूरए हम्द में सात आयतें हैं और ईश्वर की ओर से इसे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पास दो बार भेजा गया है, इसलिए इसे सब्ए मसानी कहते हैं।कुछ व्याख्याकारों का कहना है कि चूंकि यह सूरा हर नमाज़ में दो बार पढ़ा जाता है इसलिए इसे सब्ए मसानी कहा जाता है जबकि कुछ का कहना है कि सूरए हम्द के दो भाग हैं, एक में ईश्वर की विशेषताओं का वर्णन है तथा दूसरे में ईश्वर के प्रति बंदो की आवश्यकता का उल्लेख है, इसी लिए इसे सब्ए मसानी कहा जाता है।रोचक बात यह है कि सूरए हम्द के नाम के वर्णन के पश्चात महान क़ुरआन का उल्लेख, जबकि स्वयं सूरए हम्द क़ुरआन का ही अंश है, इस सूरे के महत्व और महानता का चिन्ह है क्योंकि कभी कभी किसी वस्तु के भाग का, उसके महत्व के कारण, अलग से उल्लेख किया जाता है।इस आयत से हमने सीखा कि क़ानून बनाना, रचयिता का अधिकार है, जो ईश्वर आकाशों तथा धरती का सृष्टिकर्ता है, उसे अधिकार प्राप्त है कि धरती व आकाशों की अनुकंपाओं से लाभान्वित होने हेतु मनुष्य के लिए क़ानून निर्धारित करे।जिस ईश्वर ने सात आकाशों की रचना की है, उसी ने मनुष्य के मार्गदर्शन और उसके रचयिता से प्रार्थना के लिए सूरए हम्द की सात आयतें धरती पर भेजी हैं।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ८८ और ८९ की तिलावत सुनें।لَا تَمُدَّنَّ عَيْنَيْكَ إِلَى مَا مَتَّعْنَا بِهِ أَزْوَاجًا مِنْهُمْ وَلَا تَحْزَنْ عَلَيْهِمْ وَاخْفِضْ جَنَاحَكَ لِلْمُؤْمِنِينَ (88) وَقُلْ إِنِّي أَنَا النَّذِيرُ الْمُبِينُ (89)(हे पैग़म्बर!) हमने काफ़िरों के गुटों को जो कुछ अनुकंपाएं दे रखी हैं उनको मत देखिए तथा दुखी मत होइए और ईमान वालों के प्रति अत्यधिक विनम्रता से काम लीजिए (15:88) और कह दीजिए कि निश्चित रूप से मैं चेतावनी देने वाला तथा बातों को स्पष्ट करने वाला हूं। (15:89)ये आयतें, जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करती हैं, उन्हें इस संसार में प्राप्त भौतिक व सांसारिक अनुकंपाओं को देखने तथा इस संबंध में दुखी होने से रोकती हैं। अलबत्ता इसका अर्थ यह नहीं है कि पैग़म्बरे इस्लाम इस स्थिति में ग्रस्त थे बल्कि यह अपने पैग़म्बरों के प्रशिक्षण के संबंध में ईश्वर की शैली को दर्शाती है ताकि उनके साथियों तथा ईमान वालों के लिए पाठ बन सके।इसके अतिरिक्त ईमान वालों को यह जानना चाहिए कि न केवल उन्हें बल्कि पैग़म्बरों को भी, जिन्हें ईश्वर ने चुना है, यह अधिकार नहीं है कि वे ईश्वर की ओर से निर्धारित सीमा से आगे बढ़ जाएं।स्पष्ट है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को काफ़िरों को प्राप्त सांसारिक अनुकंपाओं में तनिक भी रुचि नहीं थी और ईश्वर इस आयत के माध्यम से अपने पैग़म्बर को चेतावनी देता है ताकि उनके अनुयाई अपने व्यवहार के संबंध में सचेत रहें।अलबत्ता ईश्वर ने पैग़म्बर को जितना काफ़िरों तथा उनके सांसारिक माल से विमुख रहने का आदेश दिया है उतना ही ईमान वालों विशेष कर भौतिक दृष्टि से वंचितों पर विशेष ध्यान देने का भी आदेश दिया है। ईमान वालों की वंचितता, उनके प्रति अरुचि और निश्चेतना का कारण नहीं बननी चाहिए।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद जैसी महान आध्यात्मिक अनुकंपाओं के प्रति निश्चेतना तथा काफ़िरों की भौतिक अनुकंपाओं पर ध्यान, ईमान वालों के समक्ष मौजूद बड़े ख़तरों में से एक है।लोगों के साथ व्यवहार में विनम्रता और नर्मी, ईश्वरीय नेताओं की विशेषताओं में से है और उनके अनुयाइयों को भी अपने जीवन में इन्हें लागू करना चाहिए।