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    सूरए हिज्र, आयतें 90-99, (कार्यक्रम 443)

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    आइये सूरए हिज्र की आयत नंबर ९० से ९३ तक की तिलावत सुनें।كَمَا أَنْزَلْنَا عَلَى الْمُقْتَسِمِينَ (90) الَّذِينَ جَعَلُوا الْقُرْآَنَ عِضِينَ (91) فَوَرَبِّكَ لَنَسْأَلَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ (92) عَمَّا كَانُوا يَعْمَلُونَ (93)जिस प्रकार से हमने विभाजन करने वालों पर दंड भेजा, (15:90) जिन लोगों ने क़ुरआन का विभाजन तथा उसके टुकड़े कर दिए थे। (15:91) तो तुम्हारे पालनहार की सौगंध हम उन सबसे प्रश्न करेंगे, (15:92) उसके बारे में जो कुछ वे किया करते थे। (15:93)पिछली आयतों में ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहा था हमने आपको क़ुरआन प्रदान किया है, ये आयतें कहती हैं कि हमने अपनी आयतों को वस्तुतः लोगों के पास भेजा है किंतु कुछ लोगों ने उनमें फेर-बदल कर दिया तथा आयतों को इधर-उधर करके उनके टुकड़े कर दिए। अनेकेश्वरवादियों ने कुछ आयतों को जादू, कुछ को कहानी तथा कुछ को कविता बता कर उनका परिहास किया।अन्य धर्मों के लोगों ने, जिनके पास आसमानी ग्रंथ थे, क़ुरआने मजीद की उन आयतों को स्वीकार कर लिया जो उनकी आस्थाओं के अनुकूल थीं और बाक़ी अन्य का इन्कार कर दिया। मुसलमानों के एक गुट ने भी कुछ आयतों पर अमल किया और कुछ अन्य का व्यवहारिक रूप से इन्कार किया।स्वाभाविक है कि इन सभी गुटों व लोगों से क़ुरआने मजीद की आयतों के संबंध में उनके अनुचित व तर्कहीन व्यवहार के बारे में प्रलय में प्रश्न किया जाएगा और उन्हें उनके ग़लत कर्मों का फल मिलेगा।इन आयतों से हमने सीखा कि वास्तविक ईमान वाला व्यक्ति वह है जो ईश्वर की कुछ आयतों व आदेशों को नहीं बल्कि सभी को स्वीकार करते हुए उन्हें व्यवहारिक बनाए।क़ुरआने मजीद की कुछ आयतों पर ध्यान देना व कुछ की अनदेखी कर देना, क़ुरआन की दृष्टि में निंदनीय है। सभी आयतों पर ध्यान देना चाहिए और सभी के बारे में चिंतन करना चाहिए, चाहे उनका आयाम धार्मिक हो, शिष्टाचारिक हो, आर्थिक हो, राजनैतिक हो अथवा किसी अन्य विषय का हो।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ९४ से ९६ तक की तिलावत सुनें।فَاصْدَعْ بِمَا تُؤْمَرُ وَأَعْرِضْ عَنِ الْمُشْرِكِينَ (94) إِنَّا كَفَيْنَاكَ الْمُسْتَهْزِئِينَ (95) الَّذِينَ يَجْعَلُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آَخَرَ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ (96)(हे पैग़म्बर!) तो आपको जिस बात का आदेश दिया गया है उसे स्पष्ट कर दीजिए तथा अनेकेश्वरवादियों से मुंह मोड़ लीजिए, (15:94) निश्चित रूप से आपका परिहास करने वालों के लिए हम पर्याप्त हैं। (15:95) जो लोग अल्लाह के साथ कोई अन्य ईश्वर गढ़ लेते हैं तो शीघ्र ही उन्हें ज्ञात हो जाएगा।(15:96)जैसा कि इस्लामी इतिहास में वर्णित है, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने तीन वर्षों तक गुप्त रूप से दूसरों को इस्लाम का निमंत्रण दिया, यहां तक कि ईश्वर ने ये आयतें भेज कर उन्हें आदेश दिया कि वे स्पष्ट रूप से और खुल कर लोगों को इस्लाम का निमंत्रण दें तथा विरोधियों व अनेकेश्वरवादियों के परिहास पर ध्यान न दें, अब ईश्वर उन्हें शत्रुओं से सुरक्षित रखेगा।इस ईश्वरीय आदेश के बाद पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने मक्का नगर के लोगों के बीच खुल कर धर्म का प्रचार करना और सीधे मार्ग का निमंत्रण देना आरंभ किया। वे कहते थे कि कहो कि ईश्वर के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है ताकि तुम्हें कल्याण प्राप्त हो जाए।क़ुरैश क़बीले के प्रतिष्ठित लोग पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के चाचा हज़रत अबू तालिब के पास आए और उनसे शिकायत की कि मुहम्मद हमारे युवाओं को धोखा दे रहे हैं, यदि वे पैसे चाहते हैं तो हम उन्हें बहुत अधिक धन देने के लिए तैयार हैं और यदि वे विवाह करना चाहते हैं तो हम सबसे सुंदर कन्या से उनका विवाह कराने के लिए भी तैयार हैं किंतु पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि मुझे ईश्वर की ओर से दायित्व सौंपा गया है और मैं कभी भी दायित्व निर्वाह से पीछे नहीं हटूंगा। हज़रत अबू तालिब ने भी पैग़म्बर का समर्थन किया और अनेकेश्वरवादियों को इस बात की अनुमति नहीं दी कि वे उन्हें कोई क्षति पहुंचा सकें।इन आयतों से हमने सीखा कि धर्म के प्रचार तथा सीधे मार्ग की ओर लोगों को निमंत्रित करने में विरोधियों द्वारा अपमान एवं परिहास से घबराना नहीं चाहिए बल्कि अपने दायित्व का निर्वाह करते रहना चाहिए कि इस स्थिति में ईश्वर ने सहायता का वचन दिया है।जो लोग अपनी ग़लत आस्थाओं पर अड़े रहते हैं वे एक न एक दिन अपनी ग़लती को समझ जाते हैं किंतु उस समय क्षतिपूर्ति की संभावना नहीं होती।आइये अब सूरए हिज्र की आयत नंबर ९७ से ९९ तक की तिलावत सुनें जो इस सूरे की अंतिम आयतें हैं।وَلَقَدْ نَعْلَمُ أَنَّكَ يَضِيقُ صَدْرُكَ بِمَا يَقُولُونَ (97) فَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ وَكُنْ مِنَ السَّاجِدِينَ (98) وَاعْبُدْ رَبَّكَ حَتَّى يَأْتِيَكَ الْيَقِينُ (99)(हे पैग़म्बर!) निश्चित रूप से हम जानते हैं कि जो कुछ ये कहते हैं उससे आपका हृदय दुखता है (15:97) तो अपने पालनहार का गुणगान करो उसके समक्ष नतमस्तक होने वालों में सम्मिलित हो जाओ। (15:98) और अपने पालनहार की उपासना करो यहां तक कि निश्चित बात अर्थात मृत्यु तुम्हारे पास आ जाए।(15:99)अनेकेश्वरवादियों की अनुचित बातों से, जो हाथ की बनी प्रतिमाओं को ईश्वर के समान समझते थे, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को हार्दिक दुख होता था। ये आयतें उन्हें सान्तवना देते हुए कहती हैं कि ईश्वर का गुणगान करने से आपके हृदय को शांति प्राप्त होगी। ईश्वर को हर प्रकार के समकक्ष से इतर समझना चाहिए और उसकी अनुकंपाओं पर कृतज्ञ रहना चाहिए। ईश्वर के प्रति कृतज्ञता जताने के लिए सबसे अच्छा मार्ग उसके समक्ष सजदा करना अर्थात नतमस्तक होना है क्योंकि सजदा, नमाज़ और ईश्वर की उपासना की चरम सीमा है। निश्चित रूप से मरते दम तक ईश्वर की उपासना, मनुष्य को विश्वास प्रदान करती है क्योंकि जब मृत्यु आती है तो मनुष्य की आंखों के सामने से सारे पर्दे हट जाते हैं और वह हर वस्तु को उसके वास्तविक रूप में देखता है।इन आयतों से हमने सीखा कि यद्यपि ईश्वर ने पैग़म्बर को बहुत अधिक धैर्य व संयम प्रदान किया था किंतु अनेकेश्वरवादियों की बातें इतनी कष्टदायक थीं कि पैग़म्बर को हार्दिक पीड़ा होती थी।मानसिक दबावों से संघर्ष का मार्ग, ईश्वर का गुणगान करना, नमाज़ पढ़ना तथा उसके समक्ष नतमस्तक होना है।