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    सूरए हूद, आयतें 1-5, (कार्यक्रम 346)

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    पिछले कार्यक्रम में सूरए यूनुस की व्याख्या समाप्त हुई, इस कार्यक्रम में सूरए हूद की व्याख्या आरंभ करेंगे। यह सूरा मक्के में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के निवास के अंतिम वर्षों में उतरा है। इसमें पिछले पैग़म्बरों विशेषकर हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के इतिहास का वर्णन किया गया है और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम तथा उनके अनुयाईयों को विरोधियों के मुक़ाबले में प्रतिरोध करने और ईमान के मार्ग पर सुदृढ़ रहने का निमंत्रण दिया गया है। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के पश्चात हज़रत हूद अलैहिस्सलाम आद नामक जाति में भेजे गए और उन्होंने उस जाति के लोगों को एकेश्वरवाद अपनाने और पापों से दूर रहने का निमंत्रण दिया। इस सूरए की पचासवीं से साठवीं आयत में हज़रत हूद और उनकी जाति के लोगों के बीच होने वाले संवाद और आद जाति के परिणाम का वर्णन किया गया है। आइये पहले इस सूरए की पहली और दूसरी आयतों की तिलावत सुनते हैं।بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَنِ الرَّحِيمِ الر كِتَابٌ أُحْكِمَتْ آَيَاتُهُ ثُمَّ فُصِّلَتْ مِنْ لَدُنْ حَكِيمٍ خَبِيرٍ (1) أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ إِنَّنِي لَكُمْ مِنْهُ نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ (2)अलिफ़ लाम रा (क़ुरआन ऐसी) किताब है जिसकी आयतें सुदृढ़ हैं और फिर जानकार एवं तत्वदर्शी (ईश्वर) की ओर से उन्हें विस्तार से बयान किया गया है। (11:1) अनन्य ईश्वर के अतिरिक्त किसी की उपासना न करो। निसंदेह मैं उसकी ओर से तुम्हारे लिए (नरक से) डराने वाला और (स्वर्ग की) शुभ सूचना देने वाला (पैग़म्बर बना कर भेजा गया) हूं। (11:2)क़ुरआने मजीद के अठ्ठाइस अन्य सूरों की भांति इस सूरे का आरंभ भी हुरूफ़े मुक़त्तेआत से हुआ है कि जो यह दर्शाता है कि क़ुरआने मजीद, जो ईश्वर का अनंतकालीन चमत्कार है, इन्हीं साधारण से अक्षरों से बना है जिन्हें हर व्यक्ति बड़ी सरलता से प्रयोग करता है किन्तु कोई भी इसकी भांति एक सूरा, यहां तक कि एक आयत भी नहीं ला सकता।दूसरी ओर क़ुरआने मजीद की सभी आयतों में एकेश्वरवाद की आत्मा का शासन है कि जो विभिन्न आयतों में प्रतिबिंबित होती है और शिष्टाचारिक शिक्षाओं, उपदेशों और धार्मिक आदेशों के रूप में उसका विस्तार से वर्णन हुआ है। क़ुरआने मजीद की आयतों में तनिक भी फेर बदल नहीं हुआ है और उसकी सत्यता में कोई संदेह नहीं है बल्कि उसकी समस्त आयतें पूर्ण रूप से दृढ़ हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद ने कि जो ईश्वरीय क़ानून की किताब है, सृष्टि की वास्तविकताओं का स्पष्ट रूप से वर्णन किया है और ईश्वर ने अपने असीम ज्ञान व तत्वदर्शिता के आधार पर इसके क़ानूनों का निर्धारण किया है।आसमानी किताबों के आने का उद्देश्य, मानव समाज को अनेकेश्वरवाद से पवित्र करना तथा लोगों को एकेश्वरवाद की ओर निमंत्रण देना है।पैग़म्बरों के प्रचार की पद्धति चेतावनी और शुभ सूचना देने पर अर्थात डराने व प्रोत्साहित करने पर आधारित है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या तीसरी और चौथी की तिलावत सुनते हैं।وَأَنِ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ يُمَتِّعْكُمْ مَتَاعًا حَسَنًا إِلَى أَجَلٍ مُسَمًّى وَيُؤْتِ كُلَّ ذِي فَضْلٍ فَضْلَهُ وَإِنْ تَوَلَّوْا فَإِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ كَبِيرٍ (3) إِلَى اللَّهِ مَرْجِعُكُمْ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ (4)और अपने पालनहार से क्षमा याचना करते हो फिर उसकी ओर लौट कर आओ ताकि वह तुम्हें निर्धारित समय तक उत्तम रूप में संपन्न करे और हर सदगुण वाले व्यक्ति को उसके सदगुणों के बराबर (पारितोषिक) प्रदान करे और यदि तुम ने मुंह मोड़ लिया तो मुझे तुम्हारे प्रति महान दिन के दंड की ओर से भय है।(11:3) तुम्हारी वापसी ईश्वर ही की ओर है और वह हर बात में सक्षम है।(11:4)पैग़म्बर लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण देने के अतिरिक्त उन्हें अपने पिछले पापों से तौबा व प्रायश्चित करने हेतु प्रोत्साहित भी करते थे ताकि उनके लिए ईश्वरीय कृपा प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त हो जाए क्योंकि ईमान और तौबा के प्रभाव केवल प्रलय में ही नहीं बल्कि इस संसार में भी प्रकट होते हैं और ईश्वरीय दया की छाया में मानव समाजों को भला व सुंदर जीवन प्राप्त होता है।इसके विपरीत जो लोग द्वेष के चलते सत्य की ओर मुंह मोड़ लेते हैं और पिछले पापों पर तौबा व प्रायश्चित के स्थान पर हठधर्मी से काम लेते हैं, यदि संसार में विदित रूप से उनका जीवन विलास और ऐश्वर्यपूर्ण हो तो प्रलय में उन्हें कड़ा दंड प्राप्त होने वाला है।पथभ्रष्टों का चरित्र निर्माण व प्रशिक्षण, पैग़म्बरों के दायित्वों में से है।इन आयतों से हमने सीखा कि इस्लाम ने भले व अच्छे जीवन को दृष्टिगत रखा है और तौबा एवं एकेश्वरवाद ऐसे जीवन का मार्ग प्रशस्त करता है।आइये अब सूरए हूद की पांचवी आयत की तिलावत सुनते हैं।أَلَا إِنَّهُمْ يَثْنُونَ صُدُورَهُمْ لِيَسْتَخْفُوا مِنْهُ أَلَا حِينَ يَسْتَغْشُونَ ثِيَابَهُمْ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ (5)जान लो कि ये अपने सीनों को मोड़ते हैं और अपने कपड़ों से अपने आपको ढांपते हैं ताकि स्वयं को पैग़म्बर से छिपा सकें (किन्तु उन्हें पता नहीं है कि) ईश्वर उनके सभी प्रकट व छिपे हुए कर्मों से अवगत है, निसंदेह वह सीनों के भेदों को जानने वाला है। (11:5)धार्मिक समाजों के लिए अत्यंत ख़तरनाक बात मिथ्या है। हृदय और ज़बान के बीच तथा कथनी और करनी के बीच विरोधाभास, मनुष्य को पथभ्रष्टता के अंधकारों में ढकेल देता है। यह आयत उन लोगों की ओर संकेत करती है जो विभिन्न रूपों से अपने विचारों तथा आस्थाओं को छिपाते हैं और अपने हृदय में ईमान वालों के प्रति द्वेष रखते हैं किन्तु विदित रूप से मीठी मीठी बातें करके और मित्रता प्रकट करके ईमान वालों को आकृष्ट करना चाहते हैं।ईश्वर मिथ्याचारियों के इस प्रकार के व्यवहार के संबंध में कहता है कि उन्हें जान लेना चाहिए कि उनके छिपाने या प्रकट करने का ईश्वर की दृष्टि में कोई अंतर नहीं है, और जो कुछ उनके हृदय में है, ईश्वर उससे अवगत है।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म और उसकी मान्यताओं के विरुद्ध षड्यंत्र करने वालों को जान लेना चाहिए कि वे ईश्वर से कोई भी बात नहीं छिपा सकते।ईश्वर गुप्त व स्पष्ट बातों से अवगत है, यह हम हैं जिन्हें लोगों के विचारों और हृदय का ज्ञान नहीं होता।