islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए हूद, आयतें 102-107, (कार्यक्रम 369)

    सूरए हूद, आयतें 102-107, (कार्यक्रम 369)

    Rate this post

    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या एक सौ दो और एक सौ तीन की तिलावत सुनते हैं।وَكَذَلِكَ أَخْذُ رَبِّكَ إِذَا أَخَذَ الْقُرَى وَهِيَ ظَالِمَةٌ إِنَّ أَخْذَهُ أَلِيمٌ شَدِيدٌ (102) إِنَّ فِي ذَلِكَ لَآَيَةً لِمَنْ خَافَ عَذَابَ الْآَخِرَةِ ذَلِكَ يَوْمٌ مَجْمُوعٌ لَهُ النَّاسُ وَذَلِكَ يَوْمٌ مَشْهُودٌ (103)और तुम्हारे पालनहार की पकड़ ऐसी ही होती है जब वह किसी अत्याचारी बस्ती (के लोगों को) पकड़ता है। निसंदेह उसकी पकड़ अत्यंत पीड़ादायक है। (11:102) निसंदेह इसमें उसके लिए निशानी है कि जो प्रलय के दंड से डरता है। (प्रलय) ऐसा दिन होगा जिसमें सभी लोगों को एकत्रित कर दिया जाएगा और वह ऐसा दिन होगा जिसमें सभी वस्तुएं देखी जाएंगी। (11:103)पिछले कार्यक्रम में फ़िरऔन और उसकी सेना के नील नदी में डूब जाने के वृत्तांत का वर्णन किया गया। यह आयतें कहती हैं कि यह मत सोचो कि वह ईश्वरीय दंड उस गुट से विशेष था बल्कि जो भी जाति अत्याचार और अतिक्रमण का मार्ग अपनाएगी उसका यही अंत होगा और ईश्वर अत्याचारियों को अत्यंत कड़ा दंड देगा।अलबत्ता स्पष्ट है कि ऐसे लोग पिछली जातियों के पीड़ादायक अंत से पाठ सीखते हैं कि जो प्रलय पर विश्वास रखते हैं अन्यथा दूसरे लोग अतीत से पाठ नहीं सीखते।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर पर दया और उसका कोप एक स्थाई परंपरा के आधार पर है न कि संयोगवश होने वाला कोई कार्य।जहां कहीं अत्याचार फैल जाए वहां ईश्वरीय कोप और दंड की प्रतीक्षा करनी चाहिए कि यह ईश्वरीय वचन है।प्रलय का दिन गवाही और साक्ष्य का दिन है। उस दिन ईश्वर की आज्ञा से हर वस्तु बोलने लगेगी और गवाही देगी।आइये अब सूरए हूद की आयत नंबर एक सौ चार और एक सौ पांच की तिलावत सुनते हैं।وَمَا نُؤَخِّرُهُ إِلَّا لِأَجَلٍ مَعْدُودٍ (104) يَوْمَ يَأْتِ لَا تَكَلَّمُ نَفْسٌ إِلَّا بِإِذْنِهِ فَمِنْهُمْ شَقِيٌّ وَسَعِيدٌ (105)और हम उस दिन को केवल एक सीमित समय तक ही विलंबित करेंगे, (11:104) वह ऐसा दिन होगा कि जब वह आएगा तो ईश्वर की आज्ञा के बिना बात नहीं कर सकेगा तो एक गुट अभागा होगा जबकि दूसरे गुट को कल्याण प्राप्त होगा। (11:105)पिछली आयतों में प्रलय में लोगों के आगमन के बारे में बात की गई थी किन्तु संभव है कि कुछ लोग यह कहें कि प्रलय का दिन केवल एक कल्पना है और पता नहीं वह कब आएगा। इसी कारण क़ुरआने मजीद इन आयतों में कहता है कि प्रलय का एक निर्धारित समय है और केवल ईश्वर ही उसके बारे में जानता है, अतः तुम यह नहीं कह सकते कि हम संसार को छोड़कर प्रलय के बारे में क्यों विचार करें।आगे चलकर आयत प्रलय के दिन का उल्लेख करते हुए कहती है कि उस दिन कोई भी ईश्वर की अनुमति के बिना बात नहीं कर सकेगा ताकि कोई बहाना बना सके या पश्चाताप कर सके क्योंकि ईश्वर की दृष्टि में हर बात स्पष्ट है। उस दिन ज़बान के स्थान पर शरीर के सभी अंग बोलने लगेंगे और जो कुछ उन्होंने किया है उसका वर्णन करेंगे।वस्तुतः बात इस लिए की जाती है कि लोग अपने भीतर जो कुछ हो रहा है उसके बारे में दूसरों को सूचित करें किन्तु प्रलय के दिन सभी लोगों के भीतर हर बात स्पष्ट होगी और कोई भी बात छिपी नहीं रहेगी जिसे बताने के लिए बोलने की आवश्यकता पड़े।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय आने और संसार के समाप्त होने का समय पूर्व निर्धारित और ईश्वर के ज्ञान में है।प्रलय, अभिव्यक्ति का नहीं कर्मों के सामने आने का दिन है, उस दिन कर्म काम आएंगे न कि बातें।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या एक सौ छह और एक सौ सात की तिलावत सुनते हैं।فَأَمَّا الَّذِينَ شَقُوا فَفِي النَّارِ لَهُمْ فِيهَا زَفِيرٌ وَشَهِيقٌ (106) خَالِدِينَ فِيهَا مَا دَامَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ إِلَّا مَا شَاءَ رَبُّكَ إِنَّ رَبَّكَ فَعَّالٌ لِمَا يُرِيدُ (107)तो जो लोग अभागे होंगे वे नरक में रहेंगे जहां वे चीख़ पुकार मचाएंगे (11:106) और जब तक आकाश और धरती है वे नरक की उस आग में रहेंगे सिवाय इसके कि तुम्हारा पालनहार उन्हें मुक्ति देना चाहे कि निसंदेह तुम्हारा पालनहार जो चाहता है वही करता है। (11:107)जैसा कि पिछली आयतों में कहा गया कि प्रलय के दिन लोगों के दो गुट होंगे, एक को कल्याण प्राप्त होगा जबकि दूसरा घाटा उठाएगा या दूसरे शब्दों में एक गुट भले कर म करने वालों का होगा जबकि दूसरा गुट पापियों का होगा। स्पष्ट है कि ईश्वर ने सभी लोगों की समान रूप से रचना की है और सभी के लिए मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध कराए हैं किन्तु कुछ लोग ग़लत विचारों और कर्मों की ओर उन्मुख होते हैं और अपने घाटे का मार्ग प्रशस्त करते हैं जबकि कुछ लोग ईश्वर की ओर प्रदान किए साधनों का सदुपयोग करके कल्याण प्राप्त करते हैं।इस आधार पर कल्याण प्राप्त करना या घाटा उठाना ऐसी वस्तु नहीं है जिसे ईश्वरर ने पहले से निर्धारित कर रखा हो क्योंकि इस स्थिति में लोगों के लिए अच्दे कर्म करने को अनिवार्य बनाने और प्रलय में उन्हें पारितोषिक देने या दंडित करने का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। वास्तविकता यह है कि मनुष्य इस संसार में अपने जीवन के मार्ग का चयन कर सकता है, और यही चयन कुछ लोगों को भले अंत तक पहुंचाता है जबकि कुछ लोगों का अंत इस चयन के कारण बुरा होता है। यद्यपि गंतव्य लोगों के हाथ में नहीं है किन्तु मार्ग का चयन स्वयं उन्हीं के हाथ में है अतः हम मार्ग का चयन करेंगे हमें उसके परिणामों को भी स्वीकार करना होगा।इस संसार में मनुष्य के बुरे कर्म, प्रलय में आग का स्वरूप ले लेंगे और उसे जलाएंगे। यह आग नरक की बनाई हुई नहीं है बल्कि स्वयं मनुष्य की तैयार की हुई है। इस आग में तब तक रहना होगा जब तक ईश्वर की इच्छा होगी। ईश्वर की ओर से यह निर्धारित है कि अपराधी और पापी तब तक नरक में रहेंगे जब तक वे अपने अपराधों और पापों से पवित्र न हो जाएं फिर इसके बाद यदि उनके कर्मपत्र में कोई भला कर्म होगा तो वे स्वर्ग में जाएंगे। अलबत्ता अपराधियों का एक गुट अनंतकाल तक नरक में रहेगा क्योंकि यदि उन्हें संसार में भी अनंत आयु मिलती तो वे अपने पापों और अपराधियों को कदापि नहीं छोड़ते।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य का कल्याण और दुर्भाग्य उसके चयन और कर्मों पर निर्भर है और हर किसी का अंत स्वयं उसी के हाथ में है।यदि ईश्वर चाहे तो जिसे चाहे नगर की आग से मुक्ति दे सकता है।