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    सूरए हूद, आयतें 108-110, (कार्यक्रम 370)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 108 की तिलावत सुनते हैं।وَأَمَّا الَّذِينَ سُعِدُوا فَفِي الْجَنَّةِ خَالِدِينَ فِيهَا مَا دَامَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ إِلَّا مَا شَاءَ رَبُّكَ عَطَاءً غَيْرَ مَجْذُوذٍ (108)और वे लोग जिन्हें कल्याण प्राप्त हुआ वे तब तक स्वर्ग में रहेंगे जब तक आकाश और धरती रहेंगे सिवाय इसके कि तुम्हारा पालनहार कुछ और चाहे, और यह उसकी ओर से प्रदान किए जाने का ऐसा क्रम है जो कभी नहीं टूटेगा। (11:108)पिछले कार्यक्रम में कहा गया है कि लोग दो प्रकार के होते हैं, एक वह जिन्हें कल्याण प्राप्त होता है और दूसरे वे जो अभागे होते हैं। पिछली आयतों में नरक में जाने वाले अभागों का परिचय कराया गया था और इस आयत में स्वर्ग में जाने वाले कल्याणकारियों का परिचय कराया गया है। यहां पर यह बात उल्लेखनीय है कि ईश्वर जिसे चाहे नरक से निकालकर स्वर्ग में डाल सकता है और इसी प्रकार जिसे चाहे स्वर्ग से निकालकर नरक में डाल सकता है क्योंकि स्वर्ग ईश्वर का उपकार है न कि हमारा अधिकार।इसी के साथ ईश्वर ने यह वचन भी दिया है कि वह स्वर्ग वालों से अपने इस उपकार को वापस नहीं लेगा और उन्हें स्वर्ग से बाहर नहीं निकालेगा और जो कोई स्वर्ग में आ जाएगा वह सदैव उसमें रहेगा।इस आयत से हमने सीखा कि कल्याण की प्राप्ति में मनुष्य की इच्छा और अधिकार के अतिरिक्त पैग़म्बरों के मार्गदर्शन जैसे कारकों की भी भूमिका होती है, इसी कारण आयत में कल्याण प्राप्त करने की क्रिया में कर्ता का उल्लेख नहीं है।स्वर्ग, महान ईश्वर की कृपा और उपकार है न कि हमारा अधिकार।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 109 की तिलावत सुनते हैं।فَلَا تَكُ فِي مِرْيَةٍ مِمَّا يَعْبُدُ هَؤُلَاءِ مَا يَعْبُدُونَ إِلَّا كَمَا يَعْبُدُ آَبَاؤُهُمْ مِنْ قَبْلُ وَإِنَّا لَمُوَفُّوهُمْ نَصِيبَهُمْ غَيْرَ مَنْقُوصٍ (109)तो (हे पैग़म्बर!) अनेकेश्वरवादी जो कुछ पूजते हैं, उसके ग़लत होने में संदेह न करो। ये उसी प्रकार इन्हें पूजते हैं जिस प्रकार इनके पूर्वज इससे पहले पूजते थे और हम दंड में से इनके भाग को बिना किसी कमी के इन्हें प्रदान करेंगे। (11:109)ईमान वालों के समक्ष जो एक बड़ा ख़तरा सदैव रहता है वह अपने मार्ग के सत्य और अन्य लोगों के मार्ग के ग़लत होने के बारे में संदेह है कि जो धार्मिक कर्तव्यों और दायित्वों के पालन में ढिलाई का कारण बनता है। यह आयत इस विषय के महत्त्व को दर्शाने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से कहती है कि आप अनेकेश्वरवादियों के मार्ग के ग़लत होने में संदेह न करें। स्वाभाविक है कि पैग़म्बर को कभी कभी इस संबंध में कोई संदेह नहीं हुआ बल्कि यह ख़तरा ईमान वालों के लिए है किन्तु आयत में पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधन का पात्र बनाया गया है ताकि अन्य लोग सचेत हो जाएं।अलबत्ता वैचारिक और आस्था संबंधी मामलों में एक सीमा तक हर बात में संदेह करना अच्छी बात है किन्तु उसी संदेह में बाक़ी रहना ख़तरनाक है। अध्ययन और चिंतन के माध्यम से संदेह के चरण से निकलकर विश्वास के चरण तक पहुंचना चाहिए और जब किसी बात की सत्यता सिद्ध हो जाए तो फिर उस पर जमे रहना चाहिए। यह बात उचित नहीं है कि मनुष्य प्रतिदिन किसी न किसी बात पर संदेह करने लगे। इस आयत से हमने सीखा कि सत्य के मार्ग में डटे रहना चाहिए चाहे सभी लोग उसे छोड़ ही क्यों न दें। अन्य लोगों के संदेह से मनुष्य की आस्था पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।पूर्वजों की परंपराओं और संस्कारों का पालन, हर स्थान पर मूल्यवान नहीं होता। आस्था संबंधी मामलों में मनुष्य को स्वयं चिंतन करके सही मार्ग का चयन करना चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 110 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ آَتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَاخْتُلِفَ فِيهِ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِنْ رَبِّكَ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ وَإِنَّهُمْ لَفِي شَكٍّ مِنْهُ مُرِيبٍ (110)और निसंदेह हमने मूसा को तौरैत प्रदान की किन्तु उसमें मतभेद हो गया और यदि (काफ़िरों को समय देने के संबंध में) तुम्हारे पालनहार की परंपरा पहले से निर्धारित न होती तो निश्चित रूप से (इसी संसार में) उनके बीच फ़ैसला कर दिया जाता और निसंदेह वे लोग विकलताजनक संदेह में पड़े हुए हैं। (11:110)पिछली आयत में संदेह और उसके ख़तरों से दूर रहने के संबंध में ईमान वालों को सचेत करने के बाद यह आयत कहती है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अनुयायी भी अपनी आसमानी किताब तौरैत के संबंध में मतभेद का शिकार हो गए। इसी प्रकार तुम्हारी आसमानी किताब क़ुरआन के बारे में भी लोग संदेह में ग्रस्त हैं।अलबत्ता संदेह यदि वास्तव में हो तो कोई बुरी बात नहीं है किन्तु महत्त्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य वास्तविकता को समझने के प्रयास में रहे। ऐसा नहीं होना चाहिए कि वह अकारण ही कहने लगे कि मुझे अमुक बात में संदेह है अतः मैं उसे नहीं मान सकता बल्कि मनुष्य को अपने संदेह को समाप्त करने और विश्वास प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।इसी के साथ ईश्वरीय किताब के संबंध में संदेह उत्पन्न करने का अत्यंत कड़ा दंड है और चूंकि ईश्वर ने लोगों को संसार में मोहलत दे रखी है अतः वह उन्हें यहां दंडित नहीं करेगा किन्तु प्रलय में अवश्य ही दंड भोगना पड़ेगा।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म और ईमान के बारे में लोगों के मतभेदों से अपनी आस्था के बारे में संदेह नहीं करना चाहिए क्योंकि यह कोई नई बात नहीं है और इतिहास में इसके निरंतर उदाहरण मिलते हैं।प्रलय तक अपराधियों के दंड को विलंबित रखना, ईश्वर की एक परंपरा है और इस संबंध में मनुष्य को घमंड या निश्चेतना में ग्रस्त नहीं होना चाहिए।यद्यपि तौरैत और क़ुरआन आसमानी और प्रकाशमयी किताबें हैं किन्तु कुछ लोग इनके प्रकाश को नहीं देख पाते और संदेह करते हैं।