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    सूरए हूद, आयतें 111-115, (कार्यक्रम 371)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 111 की तिलावत सुनते हैं।وَإِنَّ كُلًّا لَمَّا لَيُوَفِّيَنَّهُمْ رَبُّكَ أَعْمَالَهُمْ إِنَّهُ بِمَا يَعْمَلُونَ خَبِيرٌ (111)और निश्चित रूप से तुम्हारा पालनहार उनके कर्मों का बदला उन्हें पूर्ण रूप से प्रदान करेगा और निसंदेह वे जो कुछ करते हैं वह उससे पूर्णतः अवगत है। (11:111)ईश्वर की एक परंपरा, पारितोषिक और दंड देने की व्यवस्था है कि जो मनुष्य द्वारा अपने अधिकार से किए गए कर्मों के आधार पर प्रदान किया जाता है। स्वाभाविक है कि किसी भी कर्म का बदला देने के लिए उसे किए जाने की नीयत और प्रणाली से पूर्व रूप से अवगत होना आवश्यक है।ईश्वर लोगों के प्रत्यक्ष और परोक्ष कर्मों से भी पूर्णतः अवगत है और उनके अच्छे-बुरे विचारों का भी उसे पूरा ज्ञान है। कोई भी बात उसकी दृष्टि से छिपी हुई नहीं है। अलबत्ता, कर्मों का बदला देने की मूल व्यवस्था प्रलय से संबंधित है किन्तु ईश्वर इस संसार में भी लोगों को उनके कर्मों पर दंड या पारितोषिक का कुछ भाग प्रदान करता है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय विचारधारा में हर अच्छे या बुरे कर्म का बदला अवश्य दिया जाता है।ईश्वर की ओर से कर्मों पर दिए जाने वाले दंड या पारितोषिक में तनिक भी कमी नहीं होती और किसी पर अत्याचार नहीं किया जाता।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 112 की तिलावत सुनते हैं।فَاسْتَقِمْ كَمَا أُمِرْتَ وَمَنْ تَابَ مَعَكَ وَلَا تَطْغَوْا إِنَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ (112)तो (हे पैग़म्बर!) जैसा कि आपको आदेश दिया गया है कि आप और आपके साथ ईश्वर की ओर आने वाले लोग प्रतिरोध करें और उद्दंडता न करें कि निसंदेह जो कुछ तुम लोग करते हो ईश्वर उसे देखने वाला है। (11:112)पिछली आयतों में अनेकेश्वरवादियों तथा अन्य धर्मों के अनुयाइयों द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के विरोध का वर्णन करने के बाद इस आयत में ईश्वर, पैग़म्बर तथा उनके अनुयायियों को संबोधित करते हुए कहता है कि विरोधियों का व्यवहार तुम्हारे कमज़ोर होने का कारण नहीं बनना चाहिए बल्कि तुम्हें अपने मार्ग पर डटे रहना चाहिए। इसी के साथ अपने विरोधियों के संबंध में ईश्वरीय सीमाओं का उल्लंघन न करो कि ईश्वर तुम्हारे हर कर्म को देख रहा है।पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम का एक कथन है कि सूरए हूद ने मुझे वृद्ध कर दिया। आपका तात्पर्य यही आयत थी कि जिसने न केवल पैग़म्बर को धैर्य व प्रतिरोध का आदेश दिया बल्कि उनके साथियों को भी इस बात का निर्देश दिया।इस आयत से हमने सीखा कि नेता का प्रतिरोध उसके मानने वालों के गतिरोध से जुड़ा होता है बस नेता को सबसे आगे होना चाहिए।विरोधियों के मामले में ढिलाई, सांठगांठ और उद्दंडता से काम नहीं लेना चाहिए, संतुलन और प्रतिरोध सबसे अच्छी शैली है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 113 की तिलावत सुनते हैं।وَلَا تَرْكَنُوا إِلَى الَّذِينَ ظَلَمُوا فَتَمَسَّكُمُ النَّارُ وَمَا لَكُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ أَوْلِيَاءَ ثُمَّ لَا تُنْصَرُونَ (113)और अत्याचारियों पर भरोसा न करो कि (नरक की) आग तुम्हें अपनी चपेट में ले लेगी और यह जान लो कि ईश्वर के अतिरिक्त तुम्हारा कोई सहायक नहीं है और किसी की ओर से तुम्हारी सहायता नहीं की जाएगी। (11:113)ईश्वर की ओर से सत्य के मार्ग पर डटे रहने के आदेश के पश्चात, यह आयत कहती है कि यदि तुम ईश्वरीय धर्म के शत्रुओं से प्रेम व मित्रता व्यक्त करते हो और उन पर भरोसा करते हो तो यह मत सोचो कि वे कड़ाई के समय तुम्हारी सहायता करेंगे।बल्कि यह जान लो कि तुम्हारा वास्तविक सहायक, ईश्वर है और उसके अतिरिक्त कोई भी तुम्हारी सहायता नहीं कर सकता। धर्म के विरोधियों और अत्याचारियों की ओर झुकाव का परिणाम, संसार में ईश्वरीय कोप और प्रलय में नरक की आग के अतिरिक्त कुछ और नहीं है।इस्लामी शिक्षाओं में कहा गया है कि अत्याचारियों से कोई आशा मत रखो, चाहे वे तुम्हारे निकट परिजन ही क्यों न हों। तुम उनके जीवित रहने की जितनी कामना करोगे, उतना ही उनके अपराधों में सहभागी रहोगे।इस आयत से हमने सीखा कि अत्याचारियों पर भरोसा करने के स्थान पर ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए कि वह सबसे बड़ा शक्तिमान है।इस्लामी राजनीति में अत्याचारी व काफ़िर शक्तियों पर किसी भी प्रकार की निर्भरता वैध नहीं है बल्कि इसे महापाप माना जाता है।अत्याचारियों पर भरोसे का परिणाम, प्रलय के दिन अलग थलग पड़ना है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 114 और 115 की तिलावत सुनें।وَأَقِمِ الصَّلَاةَ طَرَفَيِ النَّهَارِ وَزُلَفًا مِنَ اللَّيْلِ إِنَّ الْحَسَنَاتِ يُذْهِبْنَ السَّيِّئَاتِ ذَلِكَ ذِكْرَى لِلذَّاكِرِينَ (114) وَاصْبِرْ فَإِنَّ اللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجْرَ الْمُحْسِنِينَ (115)और (हे पैग़म्बर!) दिन के दोनों ओर और रात्रि के आरंभ में नमाज़ क़ाएम कीजिए। निसंदेह भले कर्म बुराईयों को समाप्त कर देते हैं, यह ईश्वर को याद रखने वालों के लिए एक नसीहत है। (11:114) और संयम से काम लीजिए कि निश्चित रूप से ईश्वर भलाई करने वालों के पारितोषिक को व्यर्थ नहीं जाने देगा। (11:115)ईश्वरीय धर्म के विरोधियों से सांठगांठ न करने और प्रतिरोध करने का आदेश देने के पश्चात ये आयतें पैग़म्बर तथा उनके साथियों को नमाज़, उपासना और ईश्वर को याद रखने का निमंत्रण देती हैं क्योंकि ईश्वर से संपर्क आंतरिक शांति और बाहरी ख़तरों से संघर्ष करने की क्षमता प्राप्त करने का कारण है। इसके अतिरिक्त इससे मनुष्य के पापों को ईश्वर क्षमा करता है और उसके बुरे कर्मों के प्रभाव भी समाप्त हो जाते हैं, इसी कारण इन आयतों में नमाज़ का आदेश दिए जाने के बाद संयम और प्रतिरोध की सिफ़ारिश की गई है कि जो नमाज़ से प्राप्त होता है।इतिहास में वर्णित है कि एक बार हज़रत अली अलैहिस्सलाम कुछ लोगों के बीच थे। उन्होंने उन लोगों से पूछा कि तुम्हारी दृष्टि में क़ुरआने मजीद की सबसे आशाजनक आयत कौन सी है? उनमें से प्रत्येक ने उत्तर दिया और किसी न किसी आयत का उल्लेख किया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि मैंने पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम से सुना है कि क़ुरआने मजीद की सबसे आशाजनक आयत सूरए हूद की आयत संख्या 114 है। इसके पश्चात पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा कि हे अली! ईश्वर की सौगंध, जब मनुष्य नमाज़ के लिए वुज़ु करता है तो उसके पाप झड़ जाते हैं और जब वह क़िबले की ओर मुख करके खड़ा होता है जो पवित्र हो जाता है। हे अली! नमाज़ पढ़ने वाला उस व्यक्ति की भांति है जो दिन में पांच बार नहर में अपने आपको पवित्र करता है तो क्या इसके बाद भी उसके शरीर पर कोई गंदगी रह जाती है।इन आयतों से हमने सीखा कि नमाज़ एक सुव्यवस्थित और निर्धारित कार्यक्रम है और हर नमाज़ अपने विशेष स्थान पर पढ़ी जानी चाहिए।नमाज़, भले कर्म का सबसे स्पष्ट उदाहरण है जिसके प्रभाव बुरे कर्मों को मिटा देते हैं।