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    सूरए हूद, आयतें 116-118, (कार्यक्रम 372)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या एक सौ सोलह की तिलावत सुनते हैं।فَلَوْلَا كَانَ مِنَ الْقُرُونِ مِنْ قَبْلِكُمْ أُولُو بَقِيَّةٍ يَنْهَوْنَ عَنِ الْفَسَادِ فِي الْأَرْضِ إِلَّا قَلِيلًا مِمَّنْ أَنْجَيْنَا مِنْهُمْ وَاتَّبَعَ الَّذِينَ ظَلَمُوا مَا أُتْرِفُوا فِيهِ وَكَانُوا مُجْرِمِينَ (116)तो पिछली जातियों में ऐसे बुद्धिमान लोग क्यों न हुए जो लोगों को धरती में बिगाड़ फैलाने से रोकते, सिवाय उनमें से कुछ लोगों के जिन्हें हमने मुक्ति प्रदान कर दी और अत्याचारी तो केवल भौतिक आनंदों के पीछे ही लगे रहे और वे सब के सब अपराधी थे। (11:116)पिछली आयतों में ईश्वर ने पैग़म्बर और उनके अनुयायियों को अपने मार्ग पर डटे रहने तथा नमाज़ व उपासना का आदेश दिया था। यह आयत ज्ञान, बुद्धि, शक्ति और सूझबूझ रखने वालों से प्रश्न करती है कि वे धरती में बुराई और बिगाड़ को फैलाने से क्यों नहीं रोकते? क्यों वे समाज के लोगों को ज्ञान व ईमान की शक्ति से लैस नहीं करते कि इस प्रकार अत्याचारों को रोका जा सके? इसी प्रकार की एक अन्य आयत भी है जिसमें विद्वानों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि वे लोगों को पापों से क्यों नहीं रोकते?अलबत्ता क़ुरआने मजीद इस बात को सार्वजनिक रूप से नहीं कहता बल्कि आयत में आगे चलकर कहा गया है कि हर काल में कुछ ऐसे लोग अवश्य रहे हैं जिन्होंने अपने दायित्वों का पालन करते हुए दूसरों की मुक्ति के साधन उपलब्ध कराए हैं किन्तु जो लोग अपनी आंतरिक इच्छाओं के पालन और सांसारिक आनंदों के चक्कर में पड़े हुए हैं, उन्होंने अपराधियों और अत्याचारियों के अनुसरण को अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है।इस आयत से हमने सीखा कि ज्ञान व शक्ति रखने वालों पर समाज को बुराई और तबाई से बचाने का अधिक दायित्व है और उन्हें स्वयं बुराईयों के प्रसार का कारण नहीं बनना चाहिए।पिछली जातियों की तबाही और पतन का कारण, पापों और बुराइयों के संबंध में मौन धारण करना था।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या एक सौ सत्रह की तिलावत सुनते हैं।وَمَا كَانَ رَبُّكَ لِيُهْلِكَ الْقُرَى بِظُلْمٍ وَأَهْلُهَا مُصْلِحُونَ (117)(हे पैग़म्बर!) आपका पालनहार ऐसी बस्तियों को अत्याचार के साथ विनष्ट नहीं करना चाहता जिनमें रहने वाले सुधार के प्रयास में हों। (11:117)इससे पहले की आयतों में पिछली जातियों के विनाश की सूचना देने के बाद इस आयत में क़ुरआने मजीद कहता है कि यह मत सोचो कि ईश्वर ने उन्हें अकारण ही विनष्ट कर दिया क्योंकि ईश्वर की परंपरा यह है कि वह केवल अत्याचारियों को तबाह करता है और इस बात की कोई संभावना नहीं है कि वह ऐसे लोगों का विनाश करे जो भले कर्म करते हों या अपने सुधार के लिए प्रयासरत हों।इस्लामी शिक्षाओं में कहा गया है कि समाज में सुधार का अर्थ दूसरों के साथ अपने व्यवहार में न्याय से काम लेना, उनसे प्रेम करना और उनका हितैषी होना है कि यदि लोग एक दूसरे के साथ इस प्रकार का व्यवहार करें तो ईश्वर उन पर दया करता है चाहे उनके बीच कुछ बुरे लोग भी क्यों न हों।इस आयत से हमने सीखा कि केवल भला होना पर्याप्त नहीं है, लोगों की भलाई चाहना और सुधार करना भी आवश्यक है और लोग समाज के संबंध में उत्तरदायी हैं।ईश्वरीय दंड केवल प्रलय में ही नहीं मिलता बल्कि अत्याचारियों को इसी संसार में ईश्वरीय कोप का स्वाद चखना पड़ता है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 118 की तिलावत सुनते हैं।وَلَوْ شَاءَ رَبُّكَ لَجَعَلَ النَّاسَ أُمَّةً وَاحِدَةً وَلَا يَزَالُونَ مُخْتَلِفِينَ (118)यदि तुम्हारा पालनहार चाहता तो सभी लोगों को (बिना किसी मतभेद के) एक समुदाय बना देता जबकि उनमें सदैव अंतर रहेगा। (11:118)यह आयत ईश्वर की ओर से प्रदान की गई एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विशेषता अर्थात लोगों के शरीरों और आत्माओं में पाई जाने वाली विभिन्नता तथा उनके इरादे और अधिकार की ओर संकेत करती है और कहती है कि यद्यपि ईश्वर का इरादा हर बात में प्रभावी है और कोई भी उसके समक्ष खड़ा नहीं हो सकता किन्तु ईश्वर चाहता है कि सभी मनुष्य एक समान न हों और अपने अधिकार से अपने मार्ग का चयन करें। आस्था और विचारों की भिन्नता इसी अंतर और अधिकार का परिणाम है।यदि ईश्वर चाहता तो सभी लोगों की सृष्टि एक समान करता और उन्हें ईमान के साथ पैदा करता किन्तु न तो ऐसे ईमान का कोई लाभ होता और न ही ऐसी एकता और समन्वय का, और यह बात मनुष्य के लिए मूल्यवान नहीं होती। यदि मनुष्य विभिन्न विचारों के बावजूद अपने अधिकार से सही मार्ग का चयन करे तो यह बात मूल्यवान है क्योंकि वह ग़लत मार्ग का भी चयन कर सकता था।दूसरी ओर जब मनुष्य की स्वतंत्रता और अधिकार की बात की जाती है तो विचार और मत में मतभेद स्वाभाविक होता है। यह मतभेद इस बात का कारण बनता है कि कुछ लोग सही मार्ग का चयन करें और कुछ दूसरे ग़लत मार्ग पर चल पड़ें।अलबत्ता ईश्वर ने लोगों को बुद्धि प्रदान करके और पैग़म्बरों को भेजकर सभी के मार्गदर्शन की भूमि समतल कर दी है। इसी प्रकार उसने प्रलय में दिए जाने वाले दंड और पारितोषिक को निर्धारित करके मनुष्य को डराया भी है और प्रोत्साहित भी किया है किन्तु इनमें से कोई भी बात ईश्वरीय मार्ग को स्वीकार करने के लिए मनुष्य को बाध्य नहीं करती, अतः हम देखते हैं कि लोगों का एक बड़ा भाग ईश्वर के मार्ग की विपरीत दिशा में चलता है। प्रत्येक दशा में ईश्वर ने किसी को भी अपने धर्म को स्वीकार करने के लिए विवश नहीं किया है बल्कि उसने अपने पैग़म्बर से कहा है कि आप को केवल लोगों को उपदेश देने का अधिकार है आप उन्हें ईश्वरीय धर्म को स्वीकार करने पर विवश नहीं कर सकते।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्यों के बारे में ईश्वरीय परंपरा, उनके बीच अंतर रखने और विचार तथा आस्था के चयन में उन्हें स्वतंत्रता और अधिकार देने पर आधारित है।मानवीय विचारों और आस्थाओं में भिन्नता, मनुष्य के अधिकार का परिणाम है और किसी पर कोई आस्था थोपना, सराहनीय कार्य नहीं है।