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    सूरए हूद, आयतें 119-123, (कार्यक्रम 373)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या एक सौ उन्नीस की तिलावत सुनते हैं।إِلَّا مَنْ رَحِمَ رَبُّكَ وَلِذَلِكَ خَلَقَهُمْ وَتَمَّتْ كَلِمَةُ رَبِّكَ لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنَ الْجِنَّةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ (119)सिवाय उन लोगों के जिन पर तुम्हारे पालनहार ने दया की और (दया की) इसी स्वीकृति) के कारण ईश्वर ने उनकी रचना की और तुम्हारे पालनहार की यह बात निश्चित है कि मैं नरक को जिन्नों और मनुष्यों से भर दूंगा। (11:119)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वर ने लोगों को ईमान लाने के लिए विवश नहीं किया है बल्कि उसने एक ओर उन्हें सत्य और असत्य को समझने के लिए बुद्धि प्रदान की और दूसरी ओर उन्हें चयन का अधिकार दिया ताकि वे जिस मार्ग को चाहें चुन सकें किन्तु स्वाभाविक है कि हर चयन का एक परिणाम होता है और सभी मार्गों का गंतव्य एक समान नहीं होता।यह आयत कहती है कि मनुष्यों और जिन्नों में से जो कोई भी ईश्वर का इन्कार करेगा तो यद्यपि इस संसार में उसे भौतिक अनुकंपाओं से वंचित नहीं किया जाएगा किन्तु प्रलय में वह ईश्वरीय कोप और दंड का पात्र बनेगा और नरक में जाएगा। वहां केवल उन्हीं लोगों को मुक्ति प्राप्त होगी जो ईश्वरीय मार्गदर्शन को स्वीकार करके ईश्वर की विशेष दया का पात्र बनेंगे।इसके अतिरिक्त यह आयत एक अन्य महत्त्वपूर्ण बिन्दु की ओर संकेत करते हुए कहती है कि तुम्हारी रचना ईश्वरीय दया की एक निशानी है और ईश्वर ने कृपा करके तुम्हारी सृष्टि की है और यही कारण है कि उसने इस संसार में तुम्हारे मार्गदर्शन के साधन उपलब्ध कराए हैं अतः तुम्हें ऐसा काम करना चाहिए कि प्रलय में भी उसकी दया व कृपा के पात्र बन सको।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय कोप और उपकार, व्यर्थ की बात नहीं है बल्कि यह हमारे कर्मों और चयन के अनुरूप होता है। अच्छाई का बदला अच्छाई और बुराई का बदला बुराई है।ईश्वर ने मनुष्य के भीतर बुद्धि व प्रवृत्ति रखकर तथा पैग़म्बरों व आसमानी किताबों को भेजकर भीतर व बाहर से मनुष्य के मार्गदर्शन का दायित्व पूरा कर दिया है और उसकी ओर से इस दायित्व की पूर्ति के बाद ही लोगों को पुरस्कृत अथवा दंडित किया जाएगा।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 120 की तिलावत सुनते हैं।وَكُلًّا نَقُصُّ عَلَيْكَ مِنْ أَنْبَاءِ الرُّسُلِ مَا نُثَبِّتُ بِهِ فُؤَادَكَ وَجَاءَكَ فِي هَذِهِ الْحَقُّ وَمَوْعِظَةٌ وَذِكْرَى لِلْمُؤْمِنِينَ (120)(हे पैग़म्बर!) हमने आपको सभी पैग़म्बरों के वृत्तांत से अवगत कराया है ताकि इसके माध्यम से आपके हृदय को सुदृढ़ बना दें और इन (वृत्तांतों) में सत्य आपके लिए स्पष्ट हो गया और ये ईमान वालों के लिए उपदेश और नसीहत हैं। (11:120)इस सूरे में अनेक पैग़म्बरों के वृत्तांतों का वर्णन किया गया है। सूरे के अंत में ईश्वर कहता है। ऐसा इसलिए किया गया है कि पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम का हृदय, संतुष्ट और सुदृढ़ हो जाए और वे जान लें कि उनसे पहले वाले पैग़म्बरों को भी लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा था। उन्होंने संयम से काम लिया और अपने मार्ग के बारे में तनिक भी संदेह नहीं किया।इसके अतिरिक्त पूर्वजों की समस्याओं का वर्णन अग्रजों के लिए शिक्षा सामग्री है। यदि वे भी सत्य का मार्ग छोड़ देंगे तो उनका भी वही अंत होगा जो पिछली जातियों का हुआ था और वे ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होंगे।इस आयत से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद के वृत्तांत, काल्पनिक और समय बिताने के लिए कही जाने वाली कहानियां नहीं बल्कि वास्तविक और सार्थक घटनाएं हैं।इतिहास का अध्ययन, सत्य बातों को सही ढंग से समझने, हृदय की शांति और पाठ सीखने का साधन है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 121 और 122 की तिलावत सुनते हैं।وَقُلْ لِلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ اعْمَلُوا عَلَى مَكَانَتِكُمْ إِنَّا عَامِلُونَ (121) وَانْتَظِرُوا إِنَّا مُنْتَظِرُونَ (122)और जो लोग ईमान नहीं लाते उनसे कह दीजिए कि जो कुछ तुम कर सकते हो कर लो और निश्चित रूप से हम भी ऐसा ही करेंगे। (11:121) और तुम प्रतीक्षा करो, हम भी प्रतीक्षा करने वालों में हैं। (11:122)पिछली आयत में कहा गया था कि पिछली जातियों का इतिहास, ईमान वालों के लिए शिक्षा सामग्री है और केवल वही लोग इतिहास से पाठ सीखते हैं और अपने में सुधार करते हैं।यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहती है कि ईमान न लाने वालों से कह दीजिए कि वे जो चाहें करते रहें और अपने कर्मों के परिणामों की प्रतीक्षा करें, हम भी जैसा चाहेंगे कर्म करेंगे और अपने तथा तुम्हारे कर्मों की प्रतीक्षा करेंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि ईमान न लाने वाले लोगों को सचेत करते रहना आवश्यक है। संभव है कि उन पर इसका प्रभाव हो जाए अन्यथा कम से कम हम अपने दायित्व को पूरा कर देगें।धर्म के प्रचार में हर किसी के साथ उसकी बुद्धि और कर्म के अनुसार बात करनी चाहिए, उदाहरण स्वरूप हठधर्मी और उद्दंडी लोगों के साथ धमकी की भाषा में बात करनी चाहिए।आइये अब सूरए हूद की अंतिम आयत अर्थात आयत संख्या 123 की तिलावत सुनते हैं।وَلِلَّهِ غَيْبُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَإِلَيْهِ يُرْجَعُ الْأَمْرُ كُلُّهُ فَاعْبُدْهُ وَتَوَكَّلْ عَلَيْهِ وَمَا رَبُّكَ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ (123)

    और आकाशों तथा धरती के रहस्य ईश्वर के लिए ही हैं और सभी मामले उसी की ओर लौटने वाले हैं तो उसी की उपासना करो और उसी पर भरोसा करो और जो कुछ तुम करते हो तुम्हारा पालनहार उसकी ओर से निश्चेत नहीं है। (11:123)सूरए हूद की अंतिम आयत पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनके साथियों को संबोधित करते हुए कहती है कि यह याद रखो कि सभी मामले ईश्वर के हाथ में हैं और वह केवल तुम्हारे प्रत्यक्ष कर्मों को जानता है बल्कि तुम्हारे परोक्ष कर्मों एवं रहस्यों से भी अवगत है अतः केवल उसी के मार्ग पर चलो और उसी की उपासना करो तथा कठिनाइयों में केवल उसी पर भरोसा करो कि इसी स्थिति में तुम्हें मुक्ति प्राप्त हो सकती है।अलबत्ता स्पष्ट है कि ईश्वर की उपासना तथा उस पर भरोसा, मनुष्य की ओर से प्रयास व प्रयत्न किए जाने से विरोधाभास नहीं रखता बल्कि उसके लिए यह आवश्यक है। इस प्रकार से कि प्रयास करने के बाद ही सही अर्थों में ईश्वर पर भरोसा किया जा सकता है और जो प्रयास ही नहीं करता वह वस्तुतः ईश्वर पर भरोसा नहीं करता।इस आयत से हमने सीखा कि संसार का भौतिक चेहरे के अतिरिक्त एक आध्यात्मिक चेहरा भी है जिस पर ईमान वाले आस्था रखते हैं।ईश्वर के गुप्त ज्ञान पर ईमान, उसकी बंदगी और अन्य लोगों की दासता से स्वतंत्र होने का मार्ग प्रशस्त करता है।