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    सूरए हूद, आयतें 13-16, (कार्यक्रम 349)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 13 और 14 की तिलावत सुनते हैं।أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ قُلْ فَأْتُوا بِعَشْرِ سُوَرٍ مِثْلِهِ مُفْتَرَيَاتٍ وَادْعُوا مَنِ اسْتَطَعْتُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ إِنْ كُنْتُمْ صَادِقِينَ (13) فَإِنْ لَمْ يَسْتَجِيبُوا لَكُمْ فَاعْلَمُوا أَنَّمَا أُنْزِلَ بِعِلْمِ اللَّهِ وَأَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ فَهَلْ أَنْتُمْ مُسْلِمُونَ (14)क्या (काफ़िर) यह कहते हैं कि पैग़म्बर ने इस क़ुरआन को अपने पास से गढ़ लिया है? कह दीजिए कि यदि तुम सच कहते हो तो तुम भी इसी सूरे की भांति दस सूरे ले आओ और ईश्वर के अतिरिक्त जिसे चाहो (अपनी सहायता के लिए) बुला लो। (11:13) तो यदि वे आपकी बात को पूरा न कर सकें तो जान लो कि जो कुछ उतरा है वह ईश्वर के ज्ञान के साथ है और यह कि उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है, तो क्या अब तुम नतमस्तक होते हो। (11:14)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि पैग़म्बर के विरोधी और काफ़िर ऐसी बातें कहते थे जो पैग़म्बर के लिए अत्यंत कड़ी होती थीं। यह आयतें उनमें से एक की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि वे क़ुरआन को पैग़म्बर से संबंधित करते हैं और दावा करते हैं कि उन्होंने अपनी ओर से यह बातें गढ़ी हैं और इन्हें ईश्वर के नाम से प्रस्तुत कर रहे हैं।स्वाभाविक है कि इस प्रकार की बातों का तर्कसंगत उत्तर यह है कि यदि क़ुरआने मजीद किसी मनुष्य का कथन है तो तुम भी उस जैसा कथन ला सकते हो। इसके अतिरिक्त तुम में से एक व्यक्ति उत्तर न दे बल्कि चाहो तो अपने साहित्यकारों और अन्य लोगों को सहायता के लिए बुला सकते हो ताकि सब मिलकर क़ुरआन की भांति एक पुस्तक ले आओ।रोचक बात यह है कि ईश्वर ने इस आयत में छूट भी दी है और प्रोत्साहन भी किया है। छूट देते हुए उसने कहा है कि आवश्यक नहीं है कि तुम क़ुरआने मजीद के सभी एक सौ चौदह सूरों की भांति सूरे ले आओ बल्कि यदि तुम दस सूरे भी ले आओ तो पर्याप्त होगा। इसी प्रकार उसने प्रोत्साहित करते हुए कहा है कि इस काम को अकेले न करो बल्कि जिसे चाहो अपनी सहायता के लिए बुला लो।किंतु रोचक बात यह है कि पिछली चौदह शताब्दियों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी के विरोधी अपने हर संभव प्रयास के बावजूद एक सूरे तक का उत्तर नहीं ला सके हैं अतः उन्होंने सदैव अपमान, आरोप और तिरस्कार और कभी युद्ध और रक्तपात जैसे हथकंडों का प्रयोग किया है और यह स्वयं क़ुरआने मजीद की सत्यता का उत्तम प्रमाण है कि विरोधी तर्कसंगत बातें करने के स्थान पर धमकियों और षड्यंत्रों से काम लेते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद एक अमर चमत्कार है जो न केवल ईश्वर की ओर से उतरने के समय चमत्कार था बल्कि आज भी लोगों के बीच ईश्वरीय चमत्कार है।क़ुरआने मजीद मनुष्य के दार्शनिक या अनुभवी विचारों का परिणाम नहीं है बल्कि ईश्वर के अनंत ज्ञान के आधार पर भेजी गई किताब है अतः यह किसी भी समय, स्थान, जाति या वंश से विशेष नहीं है।शत्रुओं का संदेह और कुफ़्र, क़ुरआन और पैग़म्बर की सत्यता में संदेह का कारण नहीं बनना चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 15 और 16 की तिलावत सुनते हैं।مَنْ كَانَ يُرِيدُ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا وَزِينَتَهَا نُوَفِّ إِلَيْهِمْ أَعْمَالَهُمْ فِيهَا وَهُمْ فِيهَا لَا يُبْخَسُونَ (15) أُولَئِكَ الَّذِينَ لَيْسَ لَهُمْ فِي الْآَخِرَةِ إِلَّا النَّارُ وَحَبِطَ مَا صَنَعُوا فِيهَا وَبَاطِلٌ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ (16)जो लोग सांसारिक जीवन और उसकी शोभा के इच्छुक होते हैं, उनके कर्मों का फल हम उन्हें इसी संसार में दे देते हैं और इसमें उनके साथ कोई कमी नहीं की जाती (11:15) यही वे लोग हैं जिनके लिए प्रलय में नरक की आग के अतिरिक्त कुछ नहीं है और जो कुछ उन्होंने यहां बनाया है वह वहां अकारत हो जाएगा और जो कुछ वे करते हैं वह सब मिथ्या है। (11:16)ये आयतें ईश्वरीय पैग़म्बरों और आसमानी किताबों के विरोध के एक महत्त्वपूर्ण कारण की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि वे सांसारिक जीवन और उसका आनंद उठाना चाहते हैं। वे अपनी आंतरिक इच्छाओं की पूर्ति और सांसारिक आनंदों की प्राप्ति के मार्ग में ईश्वरीय क़ानूनों को बाधा समझते हैं।स्वाभाविक है कि इस प्रकार के लोग ईश्वरीय सीमाओं को तोड़ देते हैं और पापों तथा बुराइयों में ग्रस्त हो जाते हैं जिसका दंड उन्हें नरक में भोगना होगा। यदि उन्होंने संसार में कोई भला कर्म किया भी होगा तो चूंकि उन्होंने वह काम संसार के लिए और ईश्वर को दृष्टि में रखे बिना किया होगा अतः उन्हें इसी संसार में उसका फल मिल जाएगा और प्रलय में उनके पास कोई भला कर्म नहीं होगा कि जो उन्हें स्वर्ग तक ले जा सके।सैद्धांतिक रूप से जो लोग ईश्वर और प्रलय पर ईमान नहीं रखते उन्हें इसी संसार में उनके भले कर्मों, सेवाओं और खोजों और आविष्कारों का फल, नाम और धन के रूप में मिल जाता है और उन्हें प्रलय में ईश्वरीय पारितोषिक की आशा नहीं रखनी चाहिए क्योंकि प्रलय में पारितोषिक की आशा तो वही रख सकता है जो उस पर ईमान रखता हो अन्यथा प्रलय का इन्कार करने वाले को ईश्वर से क्या आशा? अलबत्ता ईश्वर की कृपा व्यापक है और हो सकता है कि वह प्रलय में इनमें से बहुत से लोगों को उनके भले कर्मों के कारण स्वर्ग में स्थान दे या उनके दंड में कमी कर दे।इसके अतिरिक्त जो कार्य संसार के लिए और ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के स्थान पर मानवीय भावनाओं के साथ किया जाए, वह इसी संसार तक और संसार में मनुष्य के जीवन तक सीमित रहता है और उसका प्रभाव प्रलय तक नहीं जाता है बल्कि प्रलय में वह कर्म मिट कर समाप्त हो जाता है।इन आयतों से हमने सीखा कि कर्म का मूल्य, उसकी भावना और उद्देश्य से होता है। बहुत से ऐसे भले कर्म होते हैं जो सांसारिक भावनाओं से किए जाते हैं और प्रलय में उनका कोई प्रभाव नहीं होता।ईश्वर सबसे अधिक न्याय करने वाला है और सांसारिक मायामोह रखने वालों के कर्मों पर भी पारितोषिक देता है किन्तु प्रलय में नहीं बल्कि इसी संसार में और बिना किसी कमी के।संसार का मायामोह रखने वाले प्रलय में ख़ाली हाथ पहुंचेंगे और उनका ठिकाना नरक होगा।