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    सूरए हूद, आयतें 17-19, (कार्यक्रम 350)

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    आइये पहले सूरए हूद की आयत संख्या 17 की तिलावत सुनते हैं।أَفَمَنْ كَانَ عَلَى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبِّهِ وَيَتْلُوهُ شَاهِدٌ مِنْهُ وَمِنْ قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَى إِمَامًا وَرَحْمَةً أُولَئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِ وَمَنْ يَكْفُرْ بِهِ مِنَ الْأَحْزَابِ فَالنَّارُ مَوْعِدُهُ فَلَا تَكُ فِي مِرْيَةٍ مِنْهُ إِنَّهُ الْحَقُّ مِنْ رَبِّكَ وَلَكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ (17)क्या (पैग़म्बरे इस्लाम की भांति) कोई व्यक्ति जिसके पास अपने पालनहार की ओर से स्पष्ट तर्क हो और उसके पश्चात उसकी ओर से एक गवाह भी हो और उससे पूर्व मूसा की किताब मार्गदर्शक और दया (के रूप में मौजूद) हो (जिसमें उसके आने की शुभसूचना दी गई हो उस व्यक्ति की भांति है जिसमें यह विशेषताएं न हों?) जो लोग सत्य की खोज में रहते हैं वे उन पर ईमान लाते हैं और जिस गुट और दल का जो भी व्यक्ति उनका इन्कार करेगा तो उसका ठिकाना नरक है। तो इस (क़ुरआन) की सत्यता में संदेह न करो कि यह तुम्हारे पालनहार की ओर से एक सत्य कथन है किन्तु अधिकांश लोग ईमान लाने वाले नहीं हैं। (11:17)पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान न लाने वालों में मदीना नगर के यहूदी भी थे जो विभिन्न बहानों से क़ुरआन की सत्यता और हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की पैग़म्बरी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते थे। ईश्वर इस आयत में उनको संबोधित करते हुए कहता है कि क्या तुम हज़रत मूसा की पैग़म्बरी और तौरैत की सत्यता पर ईमान नहीं रखते हो? यदि ऐसा है तो फिर तुम्हें इस बात पर क्यों आश्चर्य हो कि ईश्वर ने यह दायित्व किसी और को दे दिया है। क्या तुम्हें तौरैत की भविष्यवाणियों के आधार पर अगले पैग़म्बर के आने की प्रतीक्षा नहीं थी और क्या तुमने हज़रत मुहम्मद की निशानियां तौरैत में नहीं पढ़ी हैं? यदि तुम वास्तव में तौरैत पर ईमान रखते हो तो उन्हें हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनकी किताब पर ईमान लाना चाहिए अन्यथा दूसरे काफ़िरों और अनेकेश्वरवादियों की भांति तुम्हारा ठिकाना भी नरक है।अलबत्ता इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम सल्ल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम की सत्यता हेतु तौरैत की गवाही के अतिरिक्त उनके परिवार के एक व्यक्ति की ओर संकेत किया गया है जो उनकी सत्यता की गवाही देगा। इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार वह व्यक्ति हज़रत अली अलैहिस्सलाम हैं कि जिन्होंने अपने पूरे जीवन भर सच्चाई और निष्ठा से काम लिया तथा सबसे पहले हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम पर अपने ईमान की घोषणा की थी।अलबत्ता उनका ईमान और गवाही पैग़म्बर से उनके पारिवारिक संबंध के कारण नहीं थी क्योंकि अबू लहब भी पैग़म्बर का चाचा था किन्तु वह उन्हें झुठलाता था और उन्हें यातनाएं दिया करता था यहां तक कि क़ुरआने मजीद में ईश्वर की ओर से उसकी आलोचना में एक सूरा उतरा।आगे चलकर आयत इस महत्त्वपूर्ण बात पर बल देती है कि बहुसंख्या के इन्कार और कुफ़्र के कारण हमें अपने मार्ग और विचारधारा की सत्यता में संदेह नहीं करना चाहिए क्योंकि यह क़ुरआन ईश्वर का कथन है और इसमें कोई ग़लत बात मौजूद नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि सच्च और योग्य अनुयाइयों की उपस्थिति, आसमानी पैग़म्बरों की सत्यता का एक चिन्ह है।बहुसंख्या, किसी विचार और आस्था की सत्यता का मानदंड नहीं है। वह बात सत्य है जिसका स्रोत बुद्धि या ईश्वरीय संदेश हो, चाहे उसे अधिकांश लोग स्वीकार न करें और विभिन्न गुट तथा दल उसके मुक़ाबले में डट जाएं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 18 और 19 की तिलावत सुनते हैं।وَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَى عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أُولَئِكَ يُعْرَضُونَ عَلَى رَبِّهِمْ وَيَقُولُ الْأَشْهَادُ هَؤُلَاءِ الَّذِينَ كَذَبُوا عَلَى رَبِّهِمْ أَلَا لَعْنَةُ اللَّهِ عَلَى الظَّالِمِينَ (18) الَّذِينَ يَصُدُّونَ عَنْ سَبِيلِ اللَّهِ وَيَبْغُونَهَا عِوَجًا وَهُمْ بِالْآَخِرَةِ هُمْ كَافِرُونَ (19)और उससे अधिक अत्याचारी कौन होगा जो ईश्वर पर झूठा लांछन लगाए? इन्हें प्रलय में उनके पालनहार के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा और गवाह कहेंगे कि ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने पालनहार पर झूठा लांछन लगाया था। जान लो कि अत्याचारियों पर ईश्वर की धिक्कार है। (11:18) यह ऐसे लोग हैं जो लोगों को ईश्वर के मार्ग से रोकते हैं और उसे टेढ़ा दर्शाने का प्रयास करते हैं और यही लोग प्रलय का इन्कार करते हैं। (11:19)किसी भी ईश्वरीय पैग़म्बर की पैग़म्बरी का इन्कार वस्तुतः ईश्वर पर एक प्रकार का आरोप है कि मानो वह अब अन्य पैग़म्बरों को भेजने में सक्षम नहीं है और उसकी ओर से वहि का क्रम समाप्त हो चुका है कि जो उसका विशेष संदेश है। इसी प्रकार पैग़म्बरी का झूठा दावा भी ईश्वर पर आरोप है कि जो बात उसने नहीं की है उसे उससे संबंधित किया जाए।ये आयतें कहती हैं कि जो कोई जिस रूप में भी ईश्वर पर आरोप लगाए उसे प्रलय के न्यायालय के लिए तैयार रहना चाहिए। जहां उसे ईश्वर पर लगाए गए निराधार आरोप के संबंध में ईश्वर को उत्तर देना होगा। उस न्यायालय में इन्कार की कोई गुन्जाइश नहीं होगी क्योंकि वहां ईश्वर के अतिरिक्त कि जो लोगों के सभी कर्मों और विचारों से अवगत है, कुछ गवाह भी उपस्थित होंगे जो अपनी देखी और सुनी हुई बातों की गवाही देंगे।क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार, प्रलय के न्यायालय में हर समुदाय के पैग़म्बर और ईश्वर के प्रिय बंदे उस समुदाय के कर्मों पर गवाह होंगे। इसी प्रकार हर मनुष्य के साथ दो फ़रिश्ते, उसके पैरों के नीचे की धरती और उसके शरीर के अंग इस संसार में उसके द्वारा किए गए कर्मों की गवाही देंगे। स्वाभाविक है कि इतने गवाहों के होते हुए किसी बात का इन्कार संभव नहीं होगा। जैसा कि इस संसार में न्यायालयों में भी दो गवाहों और कुछ मामलों में अधिक गवाहों की उपस्थिति से कोई बात सिद्ध हो जाती है और उस संबंध में फ़ैसला सुना दिया जाता है।अलबत्ता प्रलय में मिलने वाले दंड के अतिरिक्त ऐसे लोगों को इस संसार में भी ईश्वरीय धिक्कार का सामना करना पड़ता है और वे ईश्वर की असीम दया से वंचित हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने एक बहुत बड़ा पाप अर्थात लोगों के विचारों और संस्कृति पर अत्याचार किया है और न केवल यह कि स्वयं ग़लत मार्ग पर चले हैं बल्कि दूसरों को भी पथभ्रष्ट किया है तथा ईश्वरीय मार्ग को टेढ़ा दर्शाने का प्रयास किया है।इन आयतों से हमने सीखा कि लेखकों और वक्ताओं को अपनी लेखी और बातों पर ध्यान रखना चाहिए क्योंकि उनकी छोटी सी ग़लत बात भी बहुत से लोगों की पथभ्रष्टता का कारण बन जाती है।ईश्वर का मार्ग स्पष्ट, सीधा व उज्जवल है। शत्रु, इस मार्ग से लोगों को दूर रखने के लिए अंधविश्वास की बातें फैलाकर, संदेह उत्पन्न करके या पथभ्रष्ट करने वाले प्रश्न करके इस मार्ग को टेढ़ा दर्शाने का प्रयास करते हैं।