islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए हूद, आयतें 20-24, (कार्यक्रम 351)

    सूरए हूद, आयतें 20-24, (कार्यक्रम 351)

    Rate this post

    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या बीस की तिलावत सुनते हैं।أُولَئِكَ لَمْ يَكُونُوا مُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ وَمَا كَانَ لَهُمْ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ أَوْلِيَاءَ يُضَاعَفُ لَهُمُ الْعَذَابُ مَا كَانُوا يَسْتَطِيعُونَ السَّمْعَ وَمَا كَانُوا يُبْصِرُونَ (20)वे लोग धरती में ईश्वर को कदापि असहाय नहीं बना सकते और ईश्वर के अतिरिक्त उनका कोई सहायक नहीं है। उनका दंड दोगुना कर दिया जाएगा। वे (सत्य को) सुनने की क्षमता नहीं रखते थे और उसे नहीं देख सकते थे। (11:20)पिछली आयतों में हमने पढ़ा कि जो कोई लोगों को ईश्वरीय मार्ग पर चलने से रोकेगा वह लोक परलोक में ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होगा। इस आयत में ईश्वर कहता है कि उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि वे ईश्वरीय कोप से बच जाएंगे या ईश्वरीय शक्ति पर उन्हें वर्चस्व प्राप्त हो जाएगा, चाहे वे अपने समस्त सहायकों को अपनी सहायता के लिए बुला लें।आगे चलकर आयत कहती है कि इस प्रकार के लोगों का दंड दोहरा होगा क्योंकि वे अपनी पथभ्रष्टता के साथ ही साथ दूसरों की पथभ्रष्टता का भी कारण बने हैं और उनके पाप का भार भी इनके कंधों पर है। इसी प्रकार इस्लामी शिक्षाओं में कहा गया है कि पथभ्रष्ट ज्ञानियों का दंड अज्ञानियों से कई गुना अधिक होगा।इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय में दंड की जो व्यवस्था होगी उससे अपराधी बच नहीं सकेंगे और न ही अत्याचारी शासकों का कोई सहायक होगा।हठधर्मी और सांप्रदायिकता इस प्रकार से काफ़िरों को अंधा और बहरा बना देती है कि वे सत्य को न तो देख सकते हैं और न ही सुन सकते हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 21 और 22 की तिलावत सुनते हैं।أُولَئِكَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنْفُسَهُمْ وَضَلَّ عَنْهُمْ مَا كَانُوا يَفْتَرُونَ (21) لَا جَرَمَ أَنَّهُمْ فِي الْآَخِرَةِ هُمُ الْأَخْسَرُونَ (22)यही वे लोग हैं जिन्होंने अपने आपको घाटे में डाला और वह सब कुछ उनसे जाता रहा जो वे गढ़ा करते थे। (11:21) निश्चय ही ये लोग प्रलय के दिन सबसे अधिक घाटा उठाने वाले होंगे। (11:22)पिछली आयतों में पथभ्रष्ट नेताओं के अंत के बारे में संकेत करने के पश्चात यह आयत कहती है कि उन लोगों ने अपने अस्तित्व की पूंजी खो दी है और अनंतकालीन घाटे में ग्रस्त हो गए हैं। इस्लामी संस्कृति में संसार एक ऐसा बाज़ार है जिसमें लोग अपनी आयु और कर्मों को बेचने के लिए रखते हैं। इस माल के अनेक ख़रीदार हैं, ईश्वर, शैतान, अन्य लोग और मनुष्य की आंतरिक इच्छाएं।इस बीच केवल ईश्वर है जो हमारे माल को सबसे ऊंचे मूल्य पर ख़रीदता है और उसकी ओर से मूल्य चुकाने का वचन अटल है। यदि ईश्वर के अतिरिक्त हम किसी अन्य को अपना माल बेचें तो हम घाटे में रहेंगे क्योंकि ऐसे में हमें जो कुछ मिलेगा वह इसी संसार में समाप्त हो जाएगा और प्रलय तक नहीं पहुंचेगा जहां हमें उसकी अधिक आवश्यकता होगी।इन आयतों से हमने सीखा कि माल तथा पद गंवाना घाटा है किन्तु बड़ा घाटा मानवता को गंवाना है।सांसारिक घाटे की क्षतिपूर्ति की जा सकती है किन्तु आयु वापस लौटने योग्य नहीं है जिसके घाटे की भरपाई की जा सके।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 23 की तिलावत सुनते हैं।إِنَّ الَّذِينَ آَمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَأَخْبَتُوا إِلَى رَبِّهِمْ أُولَئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ (23)निसंदेह जो लोग ईमान लाए और भले कर्म करते रहे तथा अपने पालनहार के समक्ष विनम्र रहे, ऐसे ही लोग स्वर्ग (में जाने) वाले हैं जहां वे सदैव रहेंगे। (11:23)लोक परलोक के घाटे में ग्रस्त होने वाले पथभ्रष्टों के मुक़ाबले में ऐसे सच्चे ईमान वाले हैं जो अपने ईश्वर के समक्ष विनम्र रहते हैं। ऐसे लोगों को अनंतकालीन लाभ प्राप्त होता है और वे ईश्वरीय दया के स्वर्ग में स्थान पाते हैं।इस आयत में ईश्वर के समक्ष विनम्रता और नतमस्तक रहने की भावना पर बल, ईमान वालों के सामने मौजूद एक ख़तरे का उल्लेख करता है और वह इस बात पर घमंड है कि हम धर्म का पालन करते हैं। इस प्रकार का घमंड भी ईश्वर के दास होने की भावना से मेल नहीं खाता। काफ़िरों के मुक़ाबले में कि जिन पर उद्दंडता की भावना का शासन होता है, ईमान वाले नतमस्तक रहने वाले तथा आज्ञापालक होते हैं किन्तु केवल ईश्वर के समक्ष।इस आयत से हमने सीखा कि केवल विदित कर्म ही पर्याप्त नहीं हैं बल्कि ईश्वरीय पारितोषिक में हार्दिक व अध्यात्मिक भावनाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।ईश्वरीय प्रशिक्षण में प्रोत्साहसन और डरावा दोनों एक साथ होते हैं, पथभ्रष्टों को डराया जाता है तथा भले लोगों का प्रोत्साहन किया जाता हैआइये अब सूरए हूद की आयत संख्या चौबीस की तिलावत सुनते हैं।مَثَلُ الْفَرِيقَيْنِ كَالْأَعْمَى وَالْأَصَمِّ وَالْبَصِيرِ وَالسَّمِيعِ هَلْ يَسْتَوِيَانِ مَثَلًا أَفَلَا تَذَكَّرُونَ (24)ईमान वालों और काफ़िरों के गुटों की उपमा अंधे व बहरे तथा देखने और सुनने वाले जैसी है। क्या ये दोनों गुट एक समान (हो सकते) हैं? तो तुम क्यों नहीं सीख प्राप्त करते? (11:24)इस आयत में क़ुरआने मजीद एक स्पष्ट उपमा द्वारा काफ़िरों और ईमान वालों की स्थिति को इस प्रकार रेखांकित करता है कि काफ़िर सत्य को नहीं देखते और नहीं सुनते तथा उसे स्वीकार करने के लिए तैयार भी नहीं होते, तो वस्तुतः वे अंधे और बहरे हैं जबकि ईमान वाले सूझ बूझ और ध्यान के साथ सत्य को सुनते तथा स्वीकार करते हैं अतः वही लोग वास्तव में देखने और सुनने वाले हैं, किन्तु खेद के साथ कहना पड़ता है कि बहुत कम ही लोग इस वास्तविकता पर ध्यान देते हैं और सीख प्राप्त नहीं करते।जी हां, जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में आंखें और कान होते हैं और वह भौतिक बातों को समझ सकता है, उसी प्रकार उसकी आत्मा की भी आंखें और कान होते हैं और वह आध्यात्मिक मामलों को समझ लेती है।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य भी पशुओं की भांति भौतिक वस्तुओं को देखता और सुनता है किन्तु जो बात उसे पशुओं से भिन्न बनाती है वह आध्यात्मिक वास्तविकताओं को देखना व सुनना है।भले व बुरे, सुंदर व कुरूप तथा सदाचारी और मिथ्याचारी की तुलना, समाज के लोगों के प्रशिक्षण हेतु क़ुरआने मजीद की प्रभावी शैलियों में से एक है।