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    सूरए हूद, आयतें 25-28, (कार्यक्रम 352)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 25 और 26 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَى قَوْمِهِ إِنِّي لَكُمْ نَذِيرٌ مُبِينٌ (25) أَنْ لَا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ أَلِيمٍ (26)निसंदेह हमने नूह को उनकी जाति की ओर भेजा (और उन्होंने उन लोगों से कहा कि) मैं तुम्हें स्पष्ट रूप से सचेत करने वाला हूं। (11:25) (अनन्य) ईश्वर के अतिरिक्त किसी की उपासना न करो कि मुझे तुम्हारे लिए एक पीड़ादायक दिन के दंड की ओर से भय है। (11:26)ये आयतें हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की पैग़म्बरी और उनके द्वारा लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिए जाने की ओर संकेत करती हैं। अनेकेश्वरवाद तथा मूर्तिपूजा के विरुद्ध संघर्ष करने वाले वे पहले बड़े पैग़म्बर हैं किन्तु उनके द्वारा वर्षों बल्कि शताब्दियों तक लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिए जाने के बावजूद बहुत कम संख्या में लोगों ने उनकी बात स्वीकार की। अंततः उनके श्राप के कारण धरती पर बड़ा भयंकर तूफ़ान आया और ईमान वालों को छोड़कर सभी लोग मारे गए।हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने आरंभ से ही लोगों को ईश्वर के आदेशों की उद्दंडता की ओर से डराया कि जो ईश्वरीय कोप और दंड का कारण बनती है किन्तु किसी ने भी उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया और उसे गंभीरता से नहीं लिया। जबकि ईश्वर के पैग़म्बरों की चेतावनी हंसी खेल नहीं बल्कि गंभीर और वास्तविक होती है। वे सदैव कर्मों के परिणामों की ओर से चेतावनी देते रहते हैं और लोगों को सचेत करने के अपने दायित्वों का भली भांति निर्वाह करते हैं।इन आयतों से हमने सीखा कि निश्चेत समाज को किसी भी बात से अधिक डरावे और चेतना की आवश्यकता होती है ताकि वह निश्चेतता की निंद्रा से जाग जाए।सभी पैग़म्बरों का निमंत्रण एकेश्वरवाद पर आधारित है ताकि लोगों को अंधविश्वास और अनेकेश्वरवाद से मुक्ति दिलाई जा सके।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 27 की तिलावत सुनते हैं।فَقَالَ الْمَلَأُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ قَوْمِهِ مَا نَرَاكَ إِلَّا بَشَرًا مِثْلَنَا وَمَا نَرَاكَ اتَّبَعَكَ إِلَّا الَّذِينَ هُمْ أَرَاذِلُنَا بَادِيَ الرَّأْيِ وَمَا نَرَى لَكُمْ عَلَيْنَا مِنْ فَضْلٍ بَلْ نَظُنُّكُمْ كَاذِبِينَ (27)तो उनकी जाति के सरदारों ने जो काफ़िर थे, कहा कि हमारी दृष्टि में तो तुम हम ही जैसे मनुष्य हो, हम देखते हैं कि हममें से कुछ भोले भाले और तुच्छ लोगों के अतिरिक्त किसी ने तुम्हारा अनुसरण नहीं किया है और हम तो अपनी तुलना में तुम से कोई बड़ाई नहीं देखते बल्कि हमारे विचार में तो तुम लोग झूठे हो। (11:27)पूरे मानव इतिहास में पैग़म्बरों के निमंत्रण के सबसे पहले विरोधी विभिन्न जातियों के प्रतिष्ठित लोग व सरदार रहे हैं जो पैग़म्बरों को अपने हितों के विरुद्ध समझते थे और सोचते थे कि यदि लोगों ने पैग़म्बरों का निमंत्रण स्वीकार कर लिया तो फिर कोई भी उनकी बात नहीं मानेगा और उनकी सत्ता तथा शक्ति समाप्त हो जाएगी।इस आयत में भी कहा गया है कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की चेतावनियों के मुक़ाबले में भी कुफ़्र के सरदार डट गए और उन्होंने प्रयास किया कि उन्हें और उनके अनुयाइयों को तुच्छ बताकर लोगों को उनसे दूर कर दें। वे कहते थे कि तुम भी हम ही जैसे मनुष्य हो और तुम को हम पर कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है कि हम तुम्हारे अनुयाई बनें। अलबत्ता पैग़म्बर भी सदैव कहते थे कि हम न तो फ़रिश्ते हैं और न ही ईश्वर के पुत्र बल्कि हम तुम्हारे समान ही मनुष्य हैं, अंतर केवल इतना है कि हमारे पास ईश्वर का विशेष संदेश वहि आया है और हमारा दायित्व है कि हम ईश्वरीय कथन को तुम तक पहुंचा दें और तुम्हें चेतावनी देते रहें।काफ़िर इसी प्रकार हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के साथियों का परिहास करते थे और कहते थे कि वे भोले भाले और तुच्छ लोग हैं जिनका समाज में कोई स्थान नहीं है। जबकि समाज के पिछड़े वर्ग के लोग यदि पैग़म्बर के कथनों को सुनकर उन्हें स्वीकार करते तो इसका कारण यह था कि पैग़म्बरों की शिक्षाएं उन्हें अत्याचारी शासकों और धनवानों के अत्याचारों से मुक्ति दिलाती थीं। इसी कारण यह वर्ग पैग़म्बरों की ओर अधिक आकृष्ट होता था। कभी कभी सत्य के विरोधी पैग़म्बरों के लाए हुए धर्म को झुठलाते थे और कहते थे कि तुम्हारी बातें झूठ, जादू, कहानी और आरोप हैं और उनका कोई लाभ नहीं है।इस आयत से हमने सीखा कि अपमान, अनादर और परिहास ऐसे लोगों की शैली है जो सत्य और वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते।जो लोग सांसारिक मायामोह में कम ग्रस्त होते हैं वे जल्दी ईमान ले आते हैं, जबकि साम्राज्यवादी और धनवान पैग़म्बरों से संघर्ष की अग्रणी पंक्ति में रहे हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 28 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِنْ كُنْتُ عَلَى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبِّي وَآَتَانِي رَحْمَةً مِنْ عِنْدِهِ فَعُمِّيَتْ عَلَيْكُمْ أَنُلْزِمُكُمُوهَا وَأَنْتُمْ لَهَا كَارِهُونَ (28)नूह ने अपनी जाति के लोगों से कहा कि यदि तुम यह देख लो कि मेरे पास अपने पालनहार की ओर से स्पष्ट तर्क है और उसने मुझे अपनी ओर से विशेष दया प्रदान की है कि जो तुम्हारी आंखों से ओझल रही है, तो क्या तुम फिर भी उद्दंडता करोगे? क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य करूं जबकि तुम्हें वह अप्रिय है? (11:28)हज़रत नूह अलैहिस्सलाम अप्रसन्नता और विनम्रता से अपने विरोधियों की अनुचित बातों की अनदेखी कर देते थे और कहते थे कि यद्यपि मैं तुम्हारे समान ही मनुष्य हूं कि मेरे पास अपने पालनहार की ओर से स्पष्ट तर्क है। मेरे पास चमत्कार भी है जो मेरी बातों की सच्चाई का प्रमाण है और इसी कारण मेरे पास तुम्हें एकेश्वरवाद की ओर बुलाने तथा अनेकेश्वरवाद से रोकने का स्पष्ट तर्क भी है जिसे हर बुद्धिमान व्यक्ति समझ सकता है और स्वीकार कर सकता है। जो कुछ मैं कहता हूं वह मेरी ओर से नहीं है और मैं तुम्हें अपनी ओर बुला भी नहीं रहा हूं बल्कि यह विशेष दया व कृपा है जो ईश्वर की ओर से मुझे प्रदान की गई है और उसने अपने धर्म की पैग़म्बरी के लिए मुझे चुना है।किन्तु यदि तुम्हें इस बात की आशा है कि मैं तुम्हें अपना निमंत्रण स्वीकार करने के लिए विवश करूंगा या ईश्वर तुम्हें मेरे आज्ञापालन करने के लिए बाध्य कर देगा तो यह तुम्हारी अनुचित अपेक्षा है जो ईश्वर की तत्वदर्शिता से मेल नहीं खाती।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का निमंत्रण, बुद्धि और तर्क से दूर निराधार दावा नहीं था बल्कि वह स्पष्ट तर्क और चमत्कार के साथ रहा है।मनुष्य, धर्म और मत के चयन में स्वतंत्र है और कोई भी उसे ईमान लाने पर विवश नहीं कर सकता।