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    सूरए हूद, आयतें 29-32, (कार्यक्रम 353)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 29 और 30 की तिलावत सुनते हैं।وَيَا قَوْمِ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مَالًا إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى اللَّهِ وَمَا أَنَا بِطَارِدِ الَّذِينَ آَمَنُوا إِنَّهُمْ مُلَاقُو رَبِّهِمْ وَلَكِنِّي أَرَاكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ (29) وَيَا قَوْمِ مَنْ يَنْصُرُنِي مِنَ اللَّهِ إِنْ طَرَدْتُهُمْ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ (30)(हज़रत नूह ने कहा) हे मेरी जाति वालो! अपने इस निमंत्रण के बदले मैं तुम से कोई माल नहीं चाहता बल्कि मेरा मेहनताना ईश्वर के ज़िम्मे है और मैं (तुम्हारे लिए) ईमान वालों से नाता तोड़ने वाला नहीं हूं (क्योंकि) वे अपने पालनहार से भेंट करने वाले हैं और मैं तुम्हें अज्ञानी जाति समझता हूं। (11:29) हे मेरी जाति वालो! यदि मैं उनसे नाता तोड़ लूं तो ईश्वर की ओर से कौन मेरी सहायता करेगा। तो क्या तुम सीख प्राप्त नहीं करोगे। (11:30)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति के लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिया किन्तु उनकी जाति के प्रतिष्ठित और धनवान लोगों ने उनका और उनके अनुयायियों का परिहास करते हुए उन्हें मूर्ख और तुच्छ बताया कि जिनका समाज में कोई स्थान नहीं होता। यह आयत उनके उत्तर में कहती है। प्रथम तो यह कि हज़रत नूह ने अपने निमंत्रण के बदले में तुमसे कोई धन या सांसारिक पद नहीं मांगा है जिसे देने में तुम्हें कोई समस्या हो और इस कारण तुम उनके निमंत्रण का सकारात्मक उत्तर न दो।दूसरे यह कि इस बात का कोई तर्क नहीं है कि वे तुम्हें अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए दरिद्रों को अपने से दूर कर दें और उनके साथ प्रेम का व्यहवार न करे क्योंकि ईश्वर की दृष्टि में तुम्हें उन पर कोई श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है और यदि वे प्रलय में ईश्वर से इस बात की शिकायत करें तो हज़रत नूह के पास अपने इस व्यवहार का कोई उत्तर नहीं होगा।अंत में आयत कहती है कि इस प्रकार की अनुचित मांगें, ईश्वरीय तथा आध्यात्मिक वास्तविकताओं से तुम लोगों के अज्ञान की सूचक हैं। इसी अज्ञान के चलते तुम सभी को सांसारिक मानदंडों और सांसारिक मान्यताओं की कसौटी पर परखते हो और सोचते हो कि तुम लोग ही ईश्वर की दृष्टि में सबसे प्रिय हो।इन आयतों से हमने सीखा कि लोगों से पैग़म्बरों का आवश्यकता मुक्त होना, उनकी सत्यता का एक प्रमाण है, इसी प्रकार उनकी सफलता का रहस्य भी सांसारिक धन और पद से उनका दूर रहना है।सत्य की सरकार को, धनवानों को आकृष्ट करने के लिए समाज के पिछड़े वर्ग को गंवाना नहीं चाहिए बल्कि अनुचित अपेक्षाओं और आशाओं की अनदेखी करनी चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 31 की तिलावत सुनते हैं।وَلَا أَقُولُ لَكُمْ عِنْدِي خَزَائِنُ اللَّهِ وَلَا أَعْلَمُ الْغَيْبَ وَلَا أَقُولُ إِنِّي مَلَكٌ وَلَا أَقُولُ لِلَّذِينَ تَزْدَرِي أَعْيُنُكُمْ لَنْ يُؤْتِيَهُمُ اللَّهُ خَيْرًا اللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا فِي أَنْفُسِهِمْ إِنِّي إِذًا لَمِنَ الظَّالِمِينَ (31)(हज़रत नूह ने कहा) मैं यह नहीं कहता कि मेरे पास ईश्वरीय ख़ज़ाने हैं, मैं यह भी नहीं कहता कि मैं ईश्वर के व्यापक और गुप्त ज्ञान से अवगत हूं, मैं यह भी नहीं कहता कि मैं फ़रिश्ता हूं और न ही मैं यह कहता हूं कि जो लोग तुम्हारी दृष्टि में तुच्छ हैं ईश्वर उन्हें कोई भलाई प्रदान नहीं करेगा। उनके हृदयों में जो कुछ है ईश्वर उससे सबसे अधिक अवगत है और यदि मैंने ऐसा कहा तो मैं अत्याचारियों में हो जाऊंगा। (11:31)हज़रत नूह अलैहिस्सलाम अपनी जाति से बात जारी रखते हुए कुछ लोगों की अनुचित आशाओं और अपेक्षाओं का उत्तर देते हैं। उन्हें आशा थी कि हज़रत नूह के पास सोने का एक ख़ज़ाना होगा जिसे वे लोगों में बांटेंगे, या उन्हें इस प्रकार का गुप्त ज्ञान आता होगा कि वे उनके भविष्य के बारे में उन्हें बताएंगे और उनके द्वारा वे उनकी समस्याएं दूर कर देंगे। इन सबसे बढ़कर काफ़िरों को अपेक्षा थी कि ईश्वर का पैग़म्बर फ़रिश्तों की भांति जीवन बिताए और उसे खाने, पीने, दांपत्य जीवन और अन्य भौतिक बातों की आवश्यकता न हो तथा वह उनसे श्रेष्ठ जीव हो।हज़रत नूह अलैहिस्सलाम उनकी इस प्रकार की अनुचित अपेक्षाओं के उत्तर में कहते हैं कि मैं एक साधारण से जीवन वाला साधारण सा मनुष्य हूं। मेरे और तुम्हारे बीच एकमात्र अंतर यह है कि ईश्वर अपने विशेष संदेश द्वारा मुझे कुछ बातें बताता है जिसे तुम तक पहुंचाना और उसे क्रियान्वित करना मेरा दायित्व है, अतः मेरे पास न तो धन और ख़ज़ाना है और न ही मुझे कोई गुप्त ज्ञान आता है बल्कि जो कुछ ईश्वर उचित समझता है मुझे बता देता है। प्रत्येक दशा में मैं कोई फ़रिश्ता नहीं बल्कि एक साधारण सा मनुष्य हूं।इसी प्रकार हज़रत नूह अलैहिस्सलाम कहते हैं कि मेरे अनुयायियों के बारे में भी तुम्हारी अपेक्षाएं अनुचित हैं। तुम्हारी इस अपेक्षा पर मैं ध्यान नहीं दे सकता कि ईमान वालों को उच्च वर्ग से संबंधित और धनवान होना चाहिए और इसी कारण तुम मेरे साथियों को तुच्छ समझते हो, क्योंकि लोगों के हृदयों की बात तो ईश्वर ही जानता है और संभव है कि ईश्वर ने उन्हें ऐसे गुट और ऐसी भलाई प्रदान की हो जो तुम्हें नहीं दी है। अतः उन्हें अपने से दूर करना, उन पर अत्याचार होगा और मैं कदापि ऐसा काम नहीं कर सकता।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों के बारे में अतिश्योक्ति से काम नहीं लेना चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 32 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا نُوحُ قَدْ جَادَلْتَنَا فَأَكْثَرْتَ جِدَالَنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِنْ كُنْتَ مِنَ الصَّادِقِينَ (32)उन्होंने कहाः हे नूह! तुमने हमसे वाद विवाद किया और बहुत वाद विवाद किया तो अब जिस बात का वादा कर रहे थे उसे ले आओ यदि तुम सच्चों में से हो। (11:32)तर्क और बुद्धि से दूर रहने वाले जब किसी बात का उत्तर देने में असमर्थ रहते हैं तो सत्य को लड़ाई झगड़े और वाद विवाद का नाम देते हैं और सत्य को स्वीकार करने के स्थान पर अनुचित मांगें करने लगते हैं। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के विरोधियों ने उनकी स्पष्ट और तर्कसंगत बातों पर ध्यान देने के बजाए उनसे कहा कि इस प्रकार की बातें अब बहुत हो चुकीं। यदि तुम अपने दावे में सच्चे हो तो हमें दंडित करो।उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं था कि दंड, पैग़म्बरों के हाथ में नहीं होता बल्कि जब कभी ईश्वर उचित समझता है लोगों को दंडित करता है, क्योंकि कर्मों पर दंड या पारितोषिक मूल रूप से प्रलय में मिलेगा और यह काम इस संसार में केवल ईश्वर की ही इच्छा से होता है।इस आयत से हमने सीखा कि हमें ईश्वर की ओर से दिए जा रहे समय को अपने मार्ग के सत्य होने का प्रमाण नहीं बल्कि अपने पिछले पापों की भरपाई और प्रायश्चित के लिए अवसर समझना चाहिए और यह नहीं सोचना चाहिए कि चूंकि दंड नहीं आ रहा है अतः जो कुछ हम कर रहे हैं वह सही है।हज़रत नूह द्वारा अपनी जाति के लोगों को दिया गया श्राप, उन्हीं की ओर से मांग करने और चुनौती दिए जाने के कारण था।