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    सूरए हूद, आयतें 33-37, (कार्यक्रम 354)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 33 और 34 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ إِنَّمَا يَأْتِيكُمْ بِهِ اللَّهُ إِنْ شَاءَ وَمَا أَنْتُمْ بِمُعْجِزِينَ (33) وَلَا يَنْفَعُكُمْ نُصْحِي إِنْ أَرَدْتُ أَنْ أَنْصَحَ لَكُمْ إِنْ كَانَ اللَّهُ يُرِيدُ أَنْ يُغْوِيَكُمْ هُوَ رَبُّكُمْ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ (34)(और हज़रत नूह ने काफ़िरों से) कहा। निसंदेह यदि ईश्वर चाहे तो वह तुम्हें दंडित कर सकता है और तुम उसे रोकने में असमर्थ हो। (11:33) जैसा कि यदि ईश्वर चाहे कि तुम पथभ्रष्टता में रहो तो मेरी नसीहत और उपदेश का तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा चाहे मैं तुम्हारा कितना ही भला क्यों न चाहूं। वही तुम्हारा पालनहार है और उसी की ओर तुम्हें लौटाया जाएगा। (11:34)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के विरोधियों ने उनकी तर्कसंगत बातों का उत्तर देने के स्थान पर हठधर्मी से काम लिया और उनसे यह तक मांग कर डाली कि यदि वे सच कह रहे हैं तो ईश्वर उन्हें इसी संसार में दंडित करे। हज़रत नूह उनके उत्तर में कहते हैं कि दंडित करना मेरे हाथ में नहीं है किन्तु इतना जान लो कि यदि ईश्वर चाहे और दंड भेज दे तो तुम उसे रोक नहीं पाओगे और उसके सामने प्रतिरोध की शक्ति तुम में नहीं होगी और तुम मारे जाओगे।हज़रत नूह अलैहिस्सलाम उनसे कहते हैं कि मैं तो केवल ईश्वर के संदेश को पहुंचाने वाला हूं और तुम्हारे मार्गदर्शन के अतिरिक्त मेरा और कोई काम नहीं है। जैसा कि इस निमंत्रण और मार्गदर्शन से भी मेरा भाग केवल तुम्हें उपदेश देना और सत्य का मार्ग दिखाना है और यदि तुम हठधर्मी और द्वेष से काम लेकर सही मार्ग को न पहचान सको तो मेरा मार्गदर्शन भी तुम्हारा भला नहीं कर सकता।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बर लोगों के हितैषी थे और उनके निमंत्रण की शैली नसीहत और उपदेश पर आधारित थी।काफ़िरों और विरोधियों को यह नहीं सोचना चाहिए कि यदि उन्हें संसार में दंडित नहीं किया गया तो वे बच गए क्योंकि प्रलय सामने है और सभी को ईश्वर की ओर लौट कर जाना है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 35 की तिलावत सुनते हैं।أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَاهُ قُلْ إِنِ افْتَرَيْتُهُ فَعَلَيَّ إِجْرَامِي وَأَنَا بَرِيءٌ مِمَّا تُجْرِمُونَ (35)क्या अनेकेश्वरवादी यह कहते हैं कि इन्होंने ईश्वर पर आरोप लगाया है? कह दीजिए कि यदि मैंने ईश्वर पर आरोप लगाया है तो इसका दंड मेरे ही लिए होगा किन्तु यह जान लो कि जो लांछन तुम मुझ पर लगा रहे हो मैं उससे विरक्त हूं। (11:35)पैग़म्बरों के निमंत्रण के मुक़ाबले में विरोधियों की एक शैली उन पर झूठ बोलने का आरोप लगाना और वे कहते हैं कि तुमने अपनी ओर से इन बातों को गढ़ लिया है और फिर कहते हो कि ये ईश्वर की बातें हैं। जबकि उनके पास अपने इस आरोप का कोई प्रमाण नहीं है और वे इसे सिद्ध नहीं कर सकते बल्कि इसके विपरीत पैग़म्बर चमत्कार दिखाकर अपने दावे को सिद्ध करते हैं।विरोधियों के निराधार आरोपों का जो उत्तर यह आयत देती है वह यह है कि ईश्वर के पैग़म्बरों पर इस प्रकार का निराधार आरोप उनके कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद का औचित्य नहीं हो सकता। यदि यह मान भी लिया जाए कि पैग़म्बर ने कोई अपराध किया है तो यह उन्हीं से संबंधित है और उसका दंड उन्हीं को मिलेगा, जैसाकि विरोधियों का पाप भी उन्हीं की गर्दन पर है।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों से वार्ता में हमें बुरी और अशिष्ट बातों से बचना चाहिए। क़ुरआने मजीद इस आयत में ईमान वालों को विरोधियों से व्यवहार की शैली सिखाता है।हर कोई अपने कर्मों का उत्तरदायी है और अन्य लोगों की ग़लत बातें हमारे ग़लत व्यवहार का औचित्य नहीं बन सकतीं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 36 और 37 की तिलावत सुनते हैं।وَأُوحِيَ إِلَى نُوحٍ أَنَّهُ لَنْ يُؤْمِنَ مِنْ قَوْمِكَ إِلَّا مَنْ قَدْ آَمَنَ فَلَا تَبْتَئِسْ بِمَا كَانُوا يَفْعَلُونَ (36) وَاصْنَعِ الْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا وَلَا تُخَاطِبْنِي فِي الَّذِينَ ظَلَمُوا إِنَّهُمْ مُغْرَقُونَ (37)और नूह की ओर वहि की गई कि उन लोगों के अतिरिक्त जो अब तक तुम पर ईमान ला चुके हैं, तुम्हारी जाति से कोई और ईमान लाने वाला नहीं है तो जो कुछ वे करते हैं उस पर दुखी मत हो। (11:36) और अब हमारी निगरानी में और हमारी वहि के अनुसार एक जहाज़ बनाओ और अत्याचारियों के बारे में मुझे संबोधित करो कि निश्चित रूप से वे डूबने वाले हैं। (11:37)क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों के अनुसार, हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने लगभग हज़ार वर्षों तक अपनी जाति वालों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिया किन्तु केवल कुछ ही लोग ईमान लाए, यहां तक कि उनके पास ईश्वर की ओर से संदेश आया कि अब कोई और ईमान लाने वाला नहीं है और काफ़िरों पर ईश्वरीय दंड आने वाला है। यह दंड एक भयंकर समुद्री तूफ़ान होगा कि जो पूरी धरती पर छा जाएगा और उससे बचने का एकमात्र मार्ग हज़रत नूह द्वारा बनाए गए जहाज़ पर सवार होना है।अतः इस आयत के अनुसार हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को दायित्व सौंपा गया कि वे ईश्वर के आदेश और उसके द्वारा दी गई शिक्षा के अनुसार एक बड़ी नौका तैयार करें ताकि जब ईश्वरीय दंड आए तो ईमान वाले उसमें सवार होकर अपने आप को सुरक्षित रख सकें। अलबत्ता चूंकि ईश्वर का दंड निश्चित था अतः हज़रत नूह की प्रार्थना का भी कोई लाभ नहीं था और जिन लोगों ने सत्य के इन्कार और विरोध द्वारा स्वयं पर भी और ईश्वरीय पैग़म्बर पर भी अत्याचार किया था उनके पास मुक्ति का कोई मार्ग नहीं था।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य कभी इतना भी गिर जाता है कि उसकी मुक्ति की कोई संभावना नहीं रहती और सत्य की कोई भी बात उसे प्रभावित नहीं करती।पैग़म्बर न केवल वार्ता और प्रचार द्वारा बल्कि कभी कभी जहाज़ जैसे साधन बनाकर लोगों की मुक्ति का अवसर उपलब्ध कराते थे और काम करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करते थे।ईश्वरीय दंड पापियों और अपराधियों के लिए है और दंड के समय ईश्वर निर्दोष को बचा लेता है।