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    सूरए हूद, आयतें 38-41, (कार्यक्रम 355)

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    आइये पहले सूरए हूद की आयत संख्या 38 और 39 की तिलावत सुनते हैं।وَيَصْنَعُ الْفُلْكَ وَكُلَّمَا مَرَّ عَلَيْهِ مَلَأٌ مِنْ قَوْمِهِ سَخِرُوا مِنْهُ قَالَ إِنْ تَسْخَرُوا مِنَّا فَإِنَّا نَسْخَرُ مِنْكُمْ كَمَا تَسْخَرُونَ (38) فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ مَنْ يَأْتِيهِ عَذَابٌ يُخْزِيهِ وَيَحِلُّ عَلَيْهِ عَذَابٌ مُقِيمٌ (39)हज़रत नूह (ईश्वर के आदेश से) जहाज़ बनाने में व्यस्त हो गए किन्तु जब भी उनकी जाति के सरदार उनके पास से गुज़रते तो उनका परिहास करते। वे उत्तर में कहते थे कि यदि आज तुम हमारा परिहास कर रहे हो तो निश्चित रूप से हम भी इसी प्रकार तुम्हारा परिहास करेंगे। (11:38) तो कुछ दिनों में तुम्हें पता चल जाएगा कि जिसके पास दंड आता है उसे अपमानित कर दिया जाता है और वह सदा रहने वाले दंड में ग्रस्त हो जाता है। (11:39)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि जब हज़रत नूह अलैहिस्सलाम अपनी जाति के मार्गदर्शन की ओर से निराश हो गए तो ईश्वर की ओर से उन्हें दायित्व सौंपा गया कि वे ईमान वालों और अन्य जीवों की मुक्ति के लिए एक बड़ी नौका बनाएं ताकि जब ईश्वरीय दंड के रूप में भयंकर समुद्री तूफ़ान आए तो वे सुरक्षित रहें।यह आयत कहती है कि जब हज़रत नूह जहाज़ बनाने लगे तो विरोधियों और काफ़िरों ने उनका बहुत उपहास किया और कहा कि एक समय तक पैग़म्बरी के पश्चात जब कोई इनके धर्म में शामिल नहीं हुआ तो इन्होंने बढ़ई का काम आरंभ कर दिया और समुद्र से बहुत दूर स्थित क्षेत्र में पानी का जहाज़ बना रहे हैं जबकि नौका तो समुद्र के निकट बनानी चाहिए ताकि उसे समुद्र में डाला जा सके और उस पर सवार हुआ जा सके।इस प्रकार के कटाक्ष हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को यातना पहुंचाते थे, इसी कारण वे कहते थे कि शीघ्र ही एक दिन आएगा जब हम लोग इस जहाज़ में बैठेंगे और फिर तुम्हारा परिहास करेंगे कि किस प्रकार ईश्वर की स्पष्ट आयतों के इन्कार के कारण तुम लोग समुद्री तूफ़ान में फंस कर डूब रहे हो। यह तो तुम्हारा सांसारिक दंड है और प्रलय का अनंत दंड तो अभी बाक़ी है।इन आयतों से हमने सीखा कि यदि हमें धार्मिक नेताओं और वैज्ञानिकों के कामों के कारण का ज्ञान न हो तो उनका परिहास नहीं करना चाहिए। उपहास और परिहास तर्कहीन लोगों का काम है।शत्रु के परिहास के सामने हिम्मत नहीं हारनी चाहिए बल्कि दृढ़तापूर्व अपना काम करते रहना चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 40 की तिलावत सुनते हैं।حَتَّى إِذَا جَاءَ أَمْرُنَا وَفَارَ التَّنُّورُ قُلْنَا احْمِلْ فِيهَا مِنْ كُلٍّ زَوْجَيْنِ اثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَنْ سَبَقَ عَلَيْهِ الْقَوْلُ وَمَنْ آَمَنَ وَمَا آَمَنَ مَعَهُ إِلَّا قَلِيلٌ (40)(काफ़िरों का परिहास जारी रहा) यहां तक कि जब (दंड का) हमारा आदेश आ गया और तंदूर से पानी उबलने लगा तो हमने नूह से कहा कि जीवों के हर जोड़े में से दो को सवार कर लो और अपने परिवार को भी सवार कर लो सिवाए उनके जिनके तबाह होने का निर्णय पहले ही हो चुका है, इसी कारण उन लोगों को भी सवार कर लो जो ईमान ला चुके हैं और उन पर ईमान लाने वाले बहुत ही कम थे। (11:40)जब जहाज़ बनाने का काम पूरा हो गया तो ईश्वर के आदेश से धरती से पानी उबलने लगा और आकाश से भी मूसलाधार वर्षा होने लगी, इस प्रकार से कि चारों ओर पानी ही पानी हो गया और वह जहाज़ पानी पर तैरने लगा। जीवों की प्रजातियों की रक्षा के लिए ईश्वर ने अपने पैग़म्बर को आदेश दिया कि वे सभी जीवों के एक एक जोड़े को जहाज़ में सवार करें।इसी प्रकार अपनी जाति के ईमान लाने वाले लोगों को भी जहाज़ पर ले आएं किन्तु उनके परिवार में से केवल वही लोग जहाज़ में सवार हुए जो ईमान वाले थे और हज़रत नूह की पत्नी और उनके पुत्र ने उनके साथ आने से इन्कार कर दिया। यद्यपि तंदूर में आग जलती है किन्तु उसी तंदूर से पानी उबलने लगा और पानी का उबलना ईश्वरीय दंड के आरंभ होने का चिन्ह था।इस आयत से हमने सीखा कि धार्मिक संबंध, पारिवारिक संबंध पर प्राथमिकता रखते हैं। अपने कुफ़्र के कारण हज़रत नूह की पत्नी और पुत्र को जहाज़ में सवार होने का अधिकार नहीं था।पानी कि जो जीवन का कारण है, कभी कभी एक पीढ़ी की तबाही का कारण बन सकता है अलबत्ता ईश्वर के आदेश पर।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 41 की तिलावत सुनते हैं।وَقَالَ ارْكَبُوا فِيهَا بِسْمِ اللَّهِ مَجْرَاهَا وَمُرْسَاهَا إِنَّ رَبِّي لَغَفُورٌ رَحِيمٌ (41)और हज़रत नूह ने जहाज़ के यात्रियों से कहा कि इस पर सवार हो जाओ कि इसका चलना और रूकना ईश्वर के नाम से है। निसंदेह मेरा पालनहार अत्यधिक क्षमाशील और दयावान है। (11:41)दंड की निशानियों के सामने आने के पश्चात हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने ईमान वालों को जहाज़ में बिठाया और ईश्वर की दया और कृपा का उल्लेख करते हुए कि जिसके कारण उन लोगों को मुक्ति प्राप्त हुई थी, कहा कि यह जहाज़ ईश्वर के नाम से चला और उसी के आदेश पर रूकेगा और इसका नियंत्रण मेरे हाथ में नहीं है।पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के एक कथन में उनके परिजनों की संज्ञा हज़रत नूह की नौका से दी गई है। पैग़म्बरे इस्लाम के एक वरिष्ठ सहाबी हज़रत अबूज़र कहते हैं कि उन्होंने फ़रमाया “मेरे परिजन नूह की नौका की भांति हैं जो कोई उस पर सवार हुआ उसे मुक्ति मिल गई और जो कोई उससे दूर हुआ वह तबाह हो गया”। पैग़म्बरे इस्लाम के इस कथन को इब्ने अब्बास, अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर, अनस इब्ने मालिक और अबू सईद ख़दरी जैसी उस काल की अन्य गणमान्य हस्तियों ने भी लिखा है जिसका वर्णन क़ुरआन की व्याख्या की पुस्तकों में हुआ है।इस आयत से हमने सीखा कि किसी भी कार्य में मनुष्य का आरंभ और विराम ईश्वर के नाम से और उसकी प्रसन्नता को दृष्टिगत रखकर किया जाना चाहिए।हर कार्य से पहले बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम बोलना पैग़म्बरों की परंपरा है और उन्होंने अपने अनुयायियों से भी इसकी सिफ़ारिश की है।नौका या जहाज़ एक साधन के अतिरिक्त कुछ नहीं है। जो बात महत्त्वपूर्ण है वह ईश्वर का इरादा है। मनुष्य को साधनों पर ध्यान देने के स्थान पर ईश्वर की याद में रहना चाहिए जिसके हाथ में हर चीज़ है।