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    सूरए हूद, आयतें 42-44, (कार्यक्रम 356)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 42 की तिलावत सुनते हैं।وَهِيَ تَجْرِي بِهِمْ فِي مَوْجٍ كَالْجِبَالِ وَنَادَى نُوحٌ ابْنَهُ وَكَانَ فِي مَعْزِلٍ يَا بُنَيَّ ارْكَبْ مَعَنَا وَلَا تَكُنْ مَعَ الْكَافِرِينَ (42)और वह जहाज़ उन्हें पर्वत जैसी लहरों के बीच लिए चला जा रहा था कि नूह ने अपने पुत्र को पुकारा कि जो एक कोने में शरण लिए हुए था कि हे वत्स हमारे साथ सवार हो जाओ और काफ़िरों के साथ न रहो। (11:42)पिछले कार्यक्रमों में हमने कहा था कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम की जाति की हठधर्मी, द्वेष और कुफ़्र पर उनके आग्रह के पश्चात ईश्वर ने उनको सूचित किया कि शीघ्र ही उनकी जाति के लोग दंड में ग्रस्त होने वाले हैं अतः एक बड़ी नौका तैयार करो ताकि वह दंड के दिन ईमान वालों की मुक्ति का साधन बने।धरती से पानी उबलने और आकाश से मूसलाधार वर्षा के साथ ही हर स्थान पर भयानक बाढ़ आ गई और क़ुरआने मजीद के शब्दों में पहाड़ जैसी लहरें हर व्यक्ति और हर वस्तु को अपने साथ बहा कर ले जा रही थीं। इस बीच हज़रत नूह का पुत्र काफ़िरों के साथ मिल गया और उसने अपने पिता का मार्ग छोड़ दिया। इसी कारण वह जहाज़ पर सवार नहीं हुआ और उसने एक कोने में शरण ली किन्तु पितृ प्रेम ने अंतिम क्षणों में हज़रत नूह को विवश किया कि वे उसे नसीहत करें कि वे कुफ़्र पर आग्रह न करे ताकि शायद वह ईश्वरीय दंड के चिन्ह देखकर कुफ़्र छोड़ दे और ईमान वालों के साथ हो जाए।इस आयत से हमने सीखा कि माता पिता अपने बच्चों के भविष्य के प्रति उत्तरदायी हैं और भारी सामाजिक दायित्वों से भी यह कर्तव्य समाप्त नहीं होता।काफ़िरों के साथ रहने से पैग़म्बर तक की संतान सत्य के मार्ग से हट जाती है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 43 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ سَآَوِي إِلَى جَبَلٍ يَعْصِمُنِي مِنَ الْمَاءِ قَالَ لَا عَاصِمَ الْيَوْمَ مِنْ أَمْرِ اللَّهِ إِلَّا مَنْ رَحِمَ وَحَالَ بَيْنَهُمَا الْمَوْجُ فَكَانَ مِنَ الْمُغْرَقِينَ (43)नूह के पुत्र ने कहा, मैं शीघ्र ही पहाड़ में शरण ले लूंगा कि जो मुझे पानी (में डूबने) से बचा लेगा। नूह ने कहा, आज के दिन ईश्वर के दंड से (किसी को) कोई बचाने वाला नहीं है, सिवाय उसके कि जिस पर स्वयं ईश्वर दया करे, इसी बीच उनके बीच एक लहर आड़े आ गई तो वह डूबने वालों में से हो गया। (11:43)कुफ़्र त्यागकर जहाज़ में सवार होने के पिता के निमंत्रण की अनदेखी करते हुए हज़रत नूह के पुत्र ने अपने ग़लत मार्ग पर आग्रह किया और सोचा कि पहाड़ पर चढ़कर वह ईश्वर के दंड से बच जाएगा, उसे इस बात का ज्ञान नहीं था कि पर्वत भी ईश्वर के आदेश के समक्ष नतमस्तक है और यदि ईश्वर चाहे तो वह ऊंचाई ही उसके लिए मृत्यु का स्थान बन सकती है।प्रत्येक दशा में पिता और पुत्र की इस वार्ता का कोई परिणाम नहीं निकला और अभी वार्ता समाप्त भी नहीं हुई थी कि एक बड़ी लहर आई और उसने हज़रत नूह के बेटे कनआन को काल के गाल में पहुंचा दिया।इस आयत से हमने सीखा कि ख़तरों के समय एकेश्वरवादी ईश्वर की शरण में जाते हैं जबकि अनेकेश्वरवादी संसार की भौतिक व खोखली शक्तियों की छाया में जाते हैं।ईश्वर द्वारा दंड अथवा पारितोषिक देने की व्यवस्था में नातेदारी और पारिवारिक संबंधों का कोई प्रभाव नहीं होता, यदि किसी पैग़म्बर का पुत्र भी काफ़िर हो तो वह डूब जाता है और पिता अपने पुत्र के लिए कुछ नहीं कर सकता।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 44 की तिलावत सुनते हैं।وَقِيلَ يَا أَرْضُ ابْلَعِي مَاءَكِ وَيَا سَمَاءُ أَقْلِعِي وَغِيضَ الْمَاءُ وَقُضِيَ الْأَمْرُ وَاسْتَوَتْ عَلَى الْجُودِيِّ وَقِيلَ بُعْدًا لِلْقَوْمِ الظَّالِمِينَ (44)और (दंड समाप्त होने और काफ़िरों के मारे जाने के पश्चात) कहा गया, हे धरती! अपने पानी को निगल ले और हे आकाश अपने पानी को उखाड़ ले। पानी घट गया, ईश्वर का आदेश पूरा हो गया और वह (नौका) जूदी नामक पर्वत पर जा कर ठहर गई और कहा कि (ईश्वर की दया अत्याचारी जाति से) दूर रहे। (11:44)ये आयतें हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के काल की ऐतिहासिक वास्तविकता का वर्णन करती हैं कि जब एक भयंकर बाढ़ और समुद्री तूफ़ान ने पूरी धरती को अपनी चपेट में ले लिया था और इस ईश्वरीय दंड के पश्चात पुनः धरती पर शांति स्थापित हुई और मानव जाति ईमान वालों के माध्यम से आगे बढ़ी।क़ुरआने मजीद के व्याख्याकारों और इतिहासकारों के बीच इस बात पर मतभेद है कि जूदी पर्वत कहां है, जहां हज़रत नूह का जहाज़ जाकर रुका था। कुछ ने कहा कि यह पर्वत तुर्की में था, कुछ का कहना है कि यह पर्वत इराक़ के मूसिल क्षेत्र के पास स्थित था जबकि कुछ ने दूसरे स्थानों का नाम लिया है।किन्तु निश्चित रूप से यह घटना घटी है और क़ुरआने मजीद ने इसे ईश्वरीय कोप का नाम दिया है अतः हमें सचेत रहना चाहिए कि बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं इस संसार में ईश्वरीय कोप के चिन्ह हैं। साहित्यिक दृष्टि से अरबी भाषा के भाषाविदों और साहित्यकारों का मानना है कि यह आयत भाषा अलंकार की दृष्टि से क़ुरआने मजीद की सबसे उत्कृष्ट आयतों में से एक है कि जिसमें अत्यंत कम शब्दों में इतनी महान घटना का वर्णन किया गया है।इस आयत से हमने सीखा कि धरती और आकाश, ईश्वरीय आदेशों के समक्ष नतमस्तक हैं। ईश्वर, प्राकृतिक क़ानूनों के अधीन नहीं है बल्कि उनसे परे है।अत्याचारियों के समाप्त होने से अत्याचार समाप्त नहीं होता। अत्याचारियों से विरक्त होने की घोषणा सदैव जारी रहनी चाहिए।