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    सूरए हूद, आयतें 45-49, (कार्यक्रम 357)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 45 और 46 की तिलावत सुनते हैं।وَنَادَى نُوحٌ رَبَّهُ فَقَالَ رَبِّ إِنَّ ابْنِي مِنْ أَهْلِي وَإِنَّ وَعْدَكَ الْحَقُّ وَأَنْتَ أَحْكَمُ الْحَاكِمِينَ (45) قَالَ يَا نُوحُ إِنَّهُ لَيْسَ مِنْ أَهْلِكَ إِنَّهُ عَمَلٌ غَيْرُ صَالِحٍ فَلَا تَسْأَلْنِ مَا لَيْسَ لَكَ بِهِ عِلْمٌ إِنِّي أَعِظُكَ أَنْ تَكُونَ مِنَ الْجَاهِلِينَ (46)और नूह ने अपने पालनहार को पुकारा और कहा कि हे मेरे पालनहार! निसंदेह मेरा पुत्र मेरे परिजनों में से है और (मेरे परिजनों को मुक्ति देने संबंधी) तेरा वचन सच्चा है और तू सबसे अच्छा फ़ैसला करने वाला है। (11:45) (इसके उत्तर में ईश्वर ने) कहा। हे नूह! निश्चित रूप से वह तुम्हारे परिजनों में से नहीं है बल्कि वह तो एक अशिष्ट कर्म है, तो तुम मुझसे ऐसी बात का प्रश्न मत करो जिसका तुम्हें ज्ञान न हो। मैं तुम्हें उपदेश देता हूं कि कहीं अज्ञानियों में से न हो जाओ। (11:46)पिछले कार्यक्रम में हमने बताया कि ईश्वरीय दंड के समय हज़रत नूह अलैहिस्सलाम का पुत्र उनके द्वारा बनाई गई बड़ी नौका में सवार होने के लिए तैयार नहीं हुआ और अन्य काफ़िरों की भांति पानी में डूब गया। इन आयतों में हज़रत नूह ईश्वर को संबोधित करते हुए कहते हैं कि प्रभुवर तूने वचन दिया था कि मेरे परिजनों को दंड से मुक्ति प्राप्त होगी और मैं जानता हूं कि तेरा वचन सच्चा है तो मेरा पुत्र क्यों डूब रहा है जबकि वह मेरे परिजनों में से है।इसके उत्तर में ईश्वर कहता है कि निसंदेह मेरा वचन सच्चा है किन्तु तुम्हारा यह पुत्र तुम्हारे परिजनों में से नहीं है क्योंकि वह ईमान स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुआ और अशिष्ट लोगों के साथ मिलकर उन्हीं जैसा हो गया। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के व्यवहार से ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें स्पष्ट रूप से इस बात का ज्ञान नहीं था कि उनका पुत्र काफ़िर हो चुका है और उसका डूबना भी निश्चित है। यही कारण है कि यद्यपि उनका दायित्व था कि केवल ईमान वालों को ही जहाज़ में सवार करें किन्तु उन्होंने उसे सवार होने का निमंत्रण दिया।और जब उनके पुत्र ने उनके निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया तब भी उन्होंने यह नहीं कहा कि काफ़िरों में से मत हो जाओ बल्कि उन्होंने कहा कि काफ़िरों के साथ न रहो। इस आधार पर ईश्वर हज़रत नूह अलैहिस्सलाम से कहता है कि जिस बात के बारे में तुम्हें ज्ञान नहीं है उसके बारे में कुछ मत कहो क्योंकि यह अज्ञानियों की शैली है।इन आयतों से हमने सीखा कि धार्मिक संबंध, पारिवारिक रिश्तों पर प्राथमिकता रखता है। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के अनुयायी उनके परिजनों की पंक्ति में आकर मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं किन्तु उनका पुत्र, जो काफ़िर हो गया था, उनके परिजनों में से नहीं है और उसे मुक्ति प्राप्त नहीं होती।ईश्वरीय संस्कृति में नियम, संबंधों के ऊपर होते हैं और पैग़म्बर का पुत्र होना कोई विशिष्टता और श्रेष्ठता नहीं है।जब हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं और उससे कोई वस्तु मांगते हैं तो यदि हमारी प्रार्थना स्वीकार न हो तो हमें अप्रसन्न नहीं होना चाहिए क्योंकि ईश्वर ऐसी बातों से अवगत है जिनका हमें ज्ञान नहीं है।मनुष्यों को चयन का अधिकार प्राप्त है, यहां तक कि पैग़म्बर की पत्नी और पुत्र भी ईमान लाने पर विवश नहीं हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 47 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ رَبِّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ أَنْ أَسْأَلَكَ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ وَإِلَّا تَغْفِرْ لِي وَتَرْحَمْنِي أَكُنْ مِنَ الْخَاسِرِينَ (47)नूह ने कहा। प्रभुवर! मैं इस बात से तेरी शरण चाहता हूं कि तुम से ऐसी बात का प्रश्न करूं जिसका मुझे ज्ञान न हो और यदि तूने मुझे क्षमा न किया और मुझ पर दया न की तो मैं घाटा उठाने वालों में से हो जाऊंगा। (11:47)ईश्वर की ओर से हज़रत नूह को उपदेश दिए जाने के पश्चात उन्होंने अनुचित आग्रह के लिए ईश्वर से क्षमा व दया की प्रार्थना की क्योंकि पैग़म्बर जानते हैं कि उन्हें ईश्वरीय उपदेशों और आदेशों के समक्ष विनम्र रहना चाहिए और तत्काल नतमस्तक हो जाना चाहिए। कारण यह है कि ईश्वर हर बात से अवगत है और सभी की भलाई चाहता है और उसका हर काम तत्वदर्शिता पर आधारित होता है।इस आयत से हमने सीखा कि तौबा व प्रायश्चित, संकट तथा अनुचित कर्मों व बातों से मनुष्य को सुरक्षित रखने का मार्ग है।पैग़म्बर तक ईश्वर की दया व कृपा के बिना अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकते और वे जानते हैं कि जो कोई इससे वंचित हुआ वह वास्तविक घाटा उठाने वालों में से होता है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 48 की तिलावत सुनते हैं।قِيلَ يَا نُوحُ اهْبِطْ بِسَلَامٍ مِنَّا وَبَرَكَاتٍ عَلَيْكَ وَعَلَى أُمَمٍ مِمَّنْ مَعَكَ وَأُمَمٌ سَنُمَتِّعُهُمْ ثُمَّ يَمَسُّهُمْ مِنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌ (48)नूह से कहा गया। हे नूह! हमारी ओर से शांति व सुरक्षा और विभूति के साथ (जहाज़ से) उतरो कि जो तुम्हारे और तुम्हारे साथ वाली जातियों के लिए है। कुछ अन्य जातियां भी हैं जिन्हें हम शीघ्र ही अपनी नेमतों से संपन्न करेंगे और फिर हमारी ओर से पीड़ादायक दंड उन्हें आ लेगा। (11:48)पानी के धरती के भीतर चले जाने और जहाज़ के रुकने के पश्चात हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और उनके साथ जाने वाले लोग जहाज़ से उतर आए और ईश्वर ने उनमें से प्रत्येक को अपनी अनुकंपाओं और विभूतियों से संपन्न किया। उनमें से प्रत्येक अपने बाद आने वाली जाति के लिए स्रोत बना।रोचक बात यह है कि हूबूत अर्थात उतरने का आदेश, ईश्वर की ओर से हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के पश्चात हज़रत नूह के लिए आया है, मानो वे मानव जाति के दूसरे पिता हैं और उनके बाद भी मानव जाति, ईमान वालों और काफ़िरों जैसे दो गुटों में विभाजित हो गई और यह प्रक्रिया यथावत जारी है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की ओर से ईमान वालों को जो अनुकंपाएं मिलती हैं वे उसके लिए लोक परलोक में कल्याण का कारण हैं जबकि काफ़िरों के लिए केवल इसी संसार में सफलता का कारण हैं।ईश्वर, सांसारिक अनुकंपाओं से काफ़िरों को वंचित नहीं रखता किन्तु उसकी परंपरा है कि वह अनुकंपा के पश्चात समय देता है ताकि हर कोई अपने पारितोषिक अथवा दंड का मार्ग प्रशस्त कर ले।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 49 की तिलावत सुनते हैं।تِلْكَ مِنْ أَنْبَاءِ الْغَيْبِ نُوحِيهَا إِلَيْكَ مَا كُنْتَ تَعْلَمُهَا أَنْتَ وَلَا قَوْمُكَ مِنْ قَبْلِ هَذَا فَاصْبِرْ إِنَّ الْعَاقِبَةَ لِلْمُتَّقِينَ (49)(हे पैग़म्बर!) ये हमारे गुप्त ज्ञान के समाचार हैं जिन्हें हम अपने विशेष संदेश वहि द्वारा आपके पास भेजते हैं, इससे पूर्व इन बातों से न तो आप ही अवगत थे और नही आपकी जाति वाले, तो संयम से काम लो कि परलोक का भला अंत ईश्वर से डरने वालों के लिए ही है। (11:49)यह आयत हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और उनकी जाति की कथा का अंतिम भाग है जिसका वर्णन पिछली पचीस आयतों में किया गया। इसके अंत में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम को संबोधित करते हुए कहा गया है कि आप और आपकी जाति के लिए इस कथा में जो पाठ है वह यह है कि भला अंत, ईश्वर से डरने वालों और भले कर्म करने वालों का होता है और यह सफलता, धैर्य व संयम से प्राप्त होती है, जैसा कि हज़रत नूह ने शताब्दियों तक धैर्य से काम लिया और अंततः सफल हुए।