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    सूरए हूद, आयतें 50-56, (कार्यक्रम 358)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या पचास की तिलावत सुनते हैं।وَإِلَى عَادٍ أَخَاهُمْ هُودًا قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُمْ مِنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ إِنْ أَنْتُمْ إِلَّا مُفْتَرُونَ (50)और हमने आद जाति की ओर उनके भाई हूद को भेजा, उन्होंने लोगों से कहा। हे मेरी जाति वालो! ईश्वर की उपासना करो कि उसके अतिरिक्त तुम्हारे लिए कोई पूज्य नहीं है। (दूसरों की उपासना करके) तुम ईश्वर पर आरोप लगाने वालों के अतिरिक्त कुछ नहीं हो। (11:50)पिछली आयतों में हज़रत नूह की कथा समाप्त होने के पश्चात, इन आयतों में हज़रत हूद अलैहिस्सलाम और उनकी जाति की कथा का वर्णन किया गया है, इसी कारण इस सूरे का नाम हूद रखा गया है।इतिहास में वर्णित है कि जब हज़रत नूह के निधन का समय निकट आया तो उन्होंने अपने निकटवर्ती लोगों से कहा कि मेरे पश्चात कुछ समय तक कोई पैग़म्बर प्रकट नहीं होगा, उस काल में अनेक अत्याचारी शासक सामने आएंगे, फिर ईश्वर मेरे ही वंश का हूद नामक एक पैग़म्बर उनके विरुद्ध खड़ा करेगा और उसी के माध्यम से ईश्वर तुम्हें मुक्ति प्रदान करेगा।इस आयत से हमने सीखा कि एकेश्वरवाद का निमंत्रण, सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों के निमंत्रण में सर्वोपरि है। वे लोगों को अपनी ओर नहीं बल्कि ईश्वर की ओर बुलाते थे।किसी को ईश्वर का समकक्ष ठहराना, एक प्रकार से ईश्वर पर आरोप लगाना है क्योंकि इससे पता चलता है कि ईश्वर, संसार के संचालन में अक्षम है और उसे किसी समकक्ष की सहायता की आवश्यकता है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 51 और 52 की तिलावत सुनते हैं।يَا قَوْمِ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى الَّذِي فَطَرَنِي أَفَلَا تَعْقِلُونَ (51) وَيَا قَوْمِ اسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ يُرْسِلِ السَّمَاءَ عَلَيْكُمْ مِدْرَارًا وَيَزِدْكُمْ قُوَّةً إِلَى قُوَّتِكُمْ وَلَا تَتَوَلَّوْا مُجْرِمِينَ (52)हे मेरी जाति वालो! मैं अपनी पैग़म्बरी के बदले में तुमसे कोई पारिश्रमिक नहीं चाहता, निसंदेह मेरा पारिश्रमिक तो उसके ज़िम्मे है जिसने मेरी सृष्टि की है। क्या तुम चिंतन नहीं करते? (11:51) और हे मेरी जाति वालो! अपने पालनहार से क्षमा याचना करो और उसकी ओर लौट कर आओ ताकि वह आकाश से मूसलाधार वर्षा बरसाए और तुम्हारी शक्ति में अधिक शक्ति की वृद्धि करे और (देखो) अपराधी बनकर (सत्य की ओर से) मुंह न मोड़ लेना। (11:52)एकेश्वरवाद का निमंत्रण देने और अनेकेश्वरवाद से रोकने के पश्चात हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने लोगों से कहा कि वे ईश्वर से क्षमा याचना तथा तौबा व प्रायश्चित करें ताकि पापों और बुराइयों से उनके पवित्र होने और ईश्वर की दया का द्वार खुलने का मार्ग प्रशस्त हो जाए। इन आयतों के अनुसार पापों से तौबा, सूखे की समाप्ति और वर्षा आने का एक कारक है और मनुष्य की शक्ति में वृद्धि करती है।तौबा से समाज की आर्थिक स्थिति में प्रगति होती है और विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। दूसरे शब्दों में पापों से तौबा व प्रायश्चित, परलोक में मनुष्य के जीवन के लिए अत्यधिक लाभदायक तो है ही, इस भौतिक व सांसारिक जीवन में भी प्रभावी है।इन आयतों से हमने सीखा कि तौबा और ईश्वर की ओर वापसी का सांसारिक पारितोषिक, समाज की शक्ति और संपत्ति में वृद्धि होना है।एक स्वस्थ, सशक्त और अनुकंपाओं से संपन्न समाज को अस्तित्व में लाना, ईश्वरीय पैग़म्बरों और आसमानी धर्मों के लक्ष्यों में से एक है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 53,54 और 55 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا هُودُ مَا جِئْتَنَا بِبَيِّنَةٍ وَمَا نَحْنُ بِتَارِكِي آَلِهَتِنَا عَنْ قَوْلِكَ وَمَا نَحْنُ لَكَ بِمُؤْمِنِينَ (53) إِنْ نَقُولُ إِلَّا اعْتَرَاكَ بَعْضُ آَلِهَتِنَا بِسُوءٍ قَالَ إِنِّي أُشْهِدُ اللَّهَ وَاشْهَدُوا أَنِّي بَرِيءٌ مِمَّا تُشْرِكُونَ (54) مِنْ دُونِهِ فَكِيدُونِي جَمِيعًا ثُمَّ لَا تُنْظِرُونِ (55)अनेकेश्वरवादियों ने कहा। हे हूद! तुम हमारे लिए कोई स्पष्ट तर्क लेकर नहीं आए हो और हम (केवल) तुम्हारी बातों के कारण अपने देवताओं को छोड़ने वाले और तुम पर ईमान लाने वाले नहीं हैं। (11:53) हम कहते हैं कि हमारे किसी देवता ने तुम्हें क्षति पहुंचाई है। हूद ने कहा। मैं ईश्वर को गवाह बनाता हूं और तुम लोग भी गवाह रहना कि मैं तुम्हारे ईश्वर के अतिरिक्त किसी को भी उसका समकक्ष बनाए जाने से विरक्त हूं, (11:54) तो तुम सब मिलकर मेरे विरुद्ध षड्यंत्र करो और मुझे तनिक भी समय न दो। (11:55)यद्यपि हज़रत हूद अलैहिस्सलाम लोगों को अनेकेश्वरवाद से दूर रहने, एकेश्वरवाद की ओर उन्मुख होने और पिछले पापों से तौबा व प्रायश्चित करने का निमंत्रण देते थे किन्तु वे अपनी ग़लत आस्थाओं पर ही आग्रह करते हुए कहते थे। हम केवल तुम्हारी बातें मानकर अपने देवताओं को नहीं छोड़ सकते बल्कि हमारा तो मानना है कि उनका अनादर करने के कारण तुम उनके कोप के पात्र बने हो और तुम्हारी बुद्धि प्रभावित हुई है अन्यथा तुम इस प्रकार की बातें न करते।रोचक बात यह है कि वे लोग मिट्टी, पत्थर और लकड़ी के बने देवताओं की उपासना करते हैं और उनके पास अपने इस कार्य का कोई तर्क नहीं है किन्तु वे ऐसे व्यक्ति से, जिसकी बातें स्पष्ट और तर्कसंगत हैं, तर्क मांगते हैं तथा उसकी बातों को स्वीकार नहीं करते।इन आयतों से हमने सीखा कि पैग़म्बरों को सदैव अनेकेश्ववादियों की हठधर्मी का सामना रहा है किन्तु उन्होंने कभी भी अपने प्रचार और निमंत्रण को नहीं छोड़ा।अंधविश्वास के विरुद्ध खड़े होने वाले महान सुधारकों और समाज की परंपराओं को तोड़ने वालों के विरुद्ध पागलपन का आरोप लगाया जाना, कोई नई बात नहीं है।पैग़म्बर कभी भी किसी शक्ति से नहीं डरते थे और सदैव अपने विरोधियों को चुनौती देते थे क्योंकि उन्हें अपने मार्ग की सत्यता का पूरा विश्वास था।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 56 की तिलावत सुनते हैं।إِنِّي تَوَكَّلْتُ عَلَى اللَّهِ رَبِّي وَرَبِّكُمْ مَا مِنْ دَابَّةٍ إِلَّا هُوَ آَخِذٌ بِنَاصِيَتِهَا إِنَّ رَبِّي عَلَى صِرَاطٍ مُسْتَقِيمٍ (56)हूद ने कहा। निसंदेह मैंने उस ईश्वर पर भरोसा किया है जो मेरा और तुम्हारा पालनहार है। धरती पर चलने फिरने वाले हर प्राणी का नियंत्रण उसी के हाथ में है और निसंदेह मेरा पालनहार सीधे मार्ग पर है। (11:56)अनेकेश्वरवादियों की धमकियों और आरोपों के विपरीत हज़रत हूद अलैहिस्सलाम कहते हैं कि अपनी समस्त शक्ति और क्षमता को एकत्रित कर लो और मेरे विरुद्ध षड्यंत्र करो किन्तु जान लो कि मैंने अपने ईश्वर पर भरोसा किया है। यह मत सोचो कि वह केवल मेरा पालनहार है और तुम उसके नियंत्रण से बाहर हो, ऐसा नहीं है और न केवल मैं और तुम बल्कि संसार की हर वस्तु उसके नियंत्रण में है। अलबत्ता ईश्वर सीधे मार्ग पर है और किसी पर अत्याचार नहीं करता।इस आयत से हमने सीखा कि विरोधियों पर ईमान वालों की विशिष्टता यह है कि उनका ईश्वर ऐसा है जिसके नियंत्रण में पूरा ब्रहमांड है जबकि अनेकेश्वरवादियों के पास ऐसी शक्ति नहीं है।हमें ऐसे पर भरोसा करना चाहिए जिसके पास शक्ति के साथ ही न्याय भी हो और जो सीधे मार्ग से विचलित न होता हो।