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    सूरए हूद, आयतें 57-60, (कार्यक्रम 359)

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    आइये पहले सूरए हूद की आयत संख्या 57 की तिलावत सुनते हैं।فَإِنْ تَوَلَّوْا فَقَدْ أَبْلَغْتُكُمْ مَا أُرْسِلْتُ بِهِ إِلَيْكُمْ وَيَسْتَخْلِفُ رَبِّي قَوْمًا غَيْرَكُمْ وَلَا تَضُرُّونَهُ شَيْئًا إِنَّ رَبِّي عَلَى كُلِّ شَيْءٍ حَفِيظٌ (57)(हूद ने कहा) यदि तुम मुंह मोड़ लो तो जान लो कि मुझे जिस बात के लिए भेजा गया था वह मैंने तुम तक पहुंचा दी है और मेरा पालनहार एक दूसरी जाति को तुम्हारे स्थान पर ले आएगा और तुम ईश्वर को कोई क्षति नहीं पहुंचा सकते निसंदेह मेरा पालनहार हर वस्तु का रक्षक है। (11:57)पिछले कार्यक्रम में हमने बताया कि हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने अपनी जाति के लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिया किन्तु उन्होंने स्वीकार नहीं किया और हठधर्मी से काम लेते रहे। इस आयत में हज़रत हूद कहते हैं कि मुझे ईश्वर की ओर से तुम्हें एकेश्वरवाद का निमंत्रण देने के लिए भेजा गया था और मैं बिना किसी कमी के अपना दायित्व पूरा कर चुका हूं अब यदि तुमने मेरी बात स्वीकार नहीं की और मुंह मोड़ लिया तो जान लो कि इसी संसार में तुम ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होगे और यदि तुम लोग समाप्त हो गए तो कोई दूसरी जाति तुम्हारे स्थान पर आ जाएगी। यह मत सोचो कि तुम्हारे कुफ़्र और हठधर्मी के कारण ईश्वर को कोई क्षति पहुंचेगी बल्कि वह तो हर व्यक्ति और हर वस्तु पर नियंत्रण रखता है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का दायित्व लोगों को एकेश्वरवाद की ओर बुलाना और उनका मार्गदर्शन करना है, न कि ईमान लाने पर उन्हें विवश करना।ईश्वरीय नेताओं से लोगों की दूरी और उद्दंडता, अपने दायित्व के पालन में पैग़म्बरों की कमज़ोरी और आलस्य का चिन्ह नहीं है बल्कि यह चयन के अधिकार का प्रमाण है कि मनुष्य चाहे तो भलाई का चयन करे या फिर बुराई को चुन ले।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 58 की तिलावत सुनते हैं।وَلَمَّا جَاءَ أَمْرُنَا نَجَّيْنَا هُودًا وَالَّذِينَ آَمَنُوا مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِنَّا وَنَجَّيْنَاهُمْ مِنْ عَذَابٍ غَلِيظٍ (58)और जब हमारा आदेश आ गया तो हमने हूद और उनके साथ ईमान लाने वालों को अपनी दया से मुक्ति प्रदान कर दी और हमने उन्हें एक कड़े दंड से बचा लिया। (11:58)हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की स्पष्ट शिक्षाओं एवं तर्क संगत बातों के मुक़ाबले में हठधर्मी और उद्दंडता तथा उनका अपमान उन लगाए गए आरोप और उनके विरुद्ध रचे गए षड्यंत्र इस बात का कारण बने कि ईश्वर हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की जाति पर एक कड़ा दंड भेजे। क़ुरआने मजीद के सूरए फ़ुस्सेलत की पंद्रहवीं आयत में कहा गया है कि ईश्वर ने एक तेज़ व जड़ से उखाड़ फेंकने वाली हवा और आंधी उनके पास भेजी।किन्तु यहां पर महत्त्वपूर्ण बात ईश्वरीय न्याय है कि जो दोषी और निर्दोष को एक साथ दंडित नहीं करता बल्कि वह हर किसी को उसके कर्मों के अनुसार फल देता है। यद्यपि हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की जाति पर दंड आया किन्तु ईश्वर ने उनकी व ईमान वालों की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर दिया और उन्हें दंड में ग्रस्त नहीं किया।इस आयत से हमने सीखा कि वास्तविक ईमान वाले पैग़म्बरों की भांति ईश्वरीय कोप और दंड से सुरक्षित रहते हैं।जिस समय ईश्वर अत्याचारियों को दंडित कर रहा होता है ठीक उसी समय ईमान वाले और धर्म के सहायक उसकी दया के पात्र बनते हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 59 और 60 की तिलावत सुनते हैं।وَتِلْكَ عَادٌ جَحَدُوا بِآَيَاتِ رَبِّهِمْ وَعَصَوْا رُسُلَهُ وَاتَّبَعُوا أَمْرَ كُلِّ جَبَّارٍ عَنِيدٍ (59) وَأُتْبِعُوا فِي هَذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ أَلَا إِنَّ عَادًا كَفَرُوا رَبَّهُمْ أَلَا بُعْدًا لِعَادٍ قَوْمِ هُودٍ (60)और आद, उस (जाति के लोगों) ने अपने पालनहार की निशानियों का इन्कार किया और उसके पैग़म्बरों के आदेशों को नहीं माना और हर अत्याचारी व हठधर्मी के आदेश का पालन किया (11:59) और इस संसार में उनके पीछे धिक्कार लगा दी गई है और प्रलय में भी (वे धिक्कार के पात्र बनेंगे) जान लो कि आद जाति ने अपने पालनहार का इन्कार किया तो हूद की जाति आद ईश्वर की दया से दूर रहे। (11:60)आद जाति से संबंधित इन दस आयतों के अंत में ईश्वर कहता है कि इस जाति की उद्दंडता व कुफ़्र, इस बात का कारण बना कि उन्होंने ईश्वर की ओर से भेजे गए शांति व न्याय के पैग़म्बरों के आज्ञापालन के स्थान पर अत्याचारी व सत्य के विरोधी शासकों के आदेशों का अनुसरण किया। इसी कारण इस संसार में वे ईश्वर के कोप व क्रोध का पात्र बने और प्रलय में भी वे नरक में जाएंगे तथा ईश्वर की व्यापक दया से वंचित रहेंगे।शायद आद जाति को इसी संसार में दंडित करने पर बल का कारण यह है कि यह जाति अरब मूल की थी और अरब क्षेत्रों में रहती थी। यह जाति हज़रत ईसा मसीह से सात सौ वर्ष पूर्व अहक़ाफ़ नामक एक क्षेत्र में जीवन व्यतीत करती थी। इस जाति के लोग हट्टे-कट्टे और लंबे-तड़ंगे थे। आद जाति के लोगों के रहने का स्थान आबाद और विकसित था।क़ुरआने मजीद के सूरए फ़ज्र की आरंभिक आयतों में कहा गया है। क्या तुमने नहीं देखा कि तुम्हारे पालनहार ने आद जाति और इरम नगर के साथ क्या किया कि जिसके समान किसी नगर की रचना नहीं की गई है? ईश्वर आद जाति का उल्लेख करके पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के काल के अरबों को चेतावनी देता है कि यदि तुमने भी ऐसा किया तो तुम्हारा अंत भी ऐसा ही होगा।इन आयतों से हमने सीखा कि पूर्वजों का अंत अग्रजों के लिए शिक्षा सामग्री है।अत्याचारियों पर धिक्कार जो आज कल अत्याचारी मुर्दाबाद के रूप में प्रचलित है, एक क़ुरआनी नारा है।