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    सूरए हूद, आयतें 6-8, (कार्यक्रम 347)

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    आइये सूरए हूद की आयत संख्या छह की तिलावत सुनते हैं।وَمَا مِنْ دَابَّةٍ فِي الْأَرْضِ إِلَّا عَلَى اللَّهِ رِزْقُهَا وَيَعْلَمُ مُسْتَقَرَّهَا وَمُسْتَوْدَعَهَا كُلٌّ فِي كِتَابٍ مُبِينٍ (6)और धरती में चलने फिरने वाला ऐसा कोई (प्राणी) नहीं है जिसकी आजीविका का दायित्व ईश्वर पर न हो और वह उसके अस्थाई और स्थाई ठिकाने से अवगत न हो। यह सब एक स्पष्ट किताब में (लिखा हुआ मौजूद) है। (11:6)यह आयत दो विषयों की ओर संकेत करती है, एक ईश्वर की ओर से सभी को आजीविका प्रदान किया जाना और दूसरे उसका व्यापक ज्ञान। इस आयत और क़ुरआने मजीद की इस जैसी अन्य आयतों के अनुसार, ईश्वर केवल सृष्टिकर्ता नहीं है बल्कि वह सभी जीवों को आजीविका प्रदान करने वाला भी है अर्थात उसने जीवन के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध कराए हैं और यह बात केवल मनुष्यों से विशेष नहीं है बल्कि इस ईश्वरीय क़ानून में सभी जीव सम्मलित हैं चाहे वो छोटे हों या बड़े।ईश्वर ने एक ओर पानी, आहार, आक्सीजन, प्रकाश और ऊष्मा जैसी वस्तुओं की रचना की है जो जीवों के लिए आवश्यक हैं और दूसरी ओर उसने इनसे लाभान्वित होने की पद्धति भी उन्हें सिखाई है। संसार में आने वाले शिशु के लिए ईश्वर ने उसकी माता के सीने में दूध पैदा किया है और उसे दूध पीने की शैली सिखाई है ताकि वह सरलता से अपना आहार प्राप्त कर सके, इस प्रकार उसने शिशु के आहार की व्यवस्था की है।इस प्रकार से व्यापक रूप से आजीविका पहुंचाने के लिए सभी जीवों और उनकी आवश्यकताओं के बारे में व्यापक ज्ञान की आवश्यकता है। सभी जीवों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाना उनकी प्रवृत्ति का भाग होता है और यह बातें ईश्वर की ओर से आजीविका की व्यवस्था में देखी जा सकती है क्योंकि यह सब बातें ईश्वर के ज्ञान में हैं और स्पष्ट रूप से लिखी हुई हैं।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर ने सभी जीवों की आजीविका उपलब्ध करा दी है और उसने इसे रचयिता पर रचनाओं का अधिकार बताया है।ईश्वर की ओर से आजीविका प्रदान करने और हमारे प्रयास करने में कोई विरोधाभास नहीं है बल्कि सैद्धांतिक रूप से बिना प्रयास के आजीविका प्राप्त करना संभव नहीं है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या सात की तिलावत सुनते हैं।وَهُوَ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ وَكَانَ عَرْشُهُ عَلَى الْمَاءِ لِيَبْلُوَكُمْ أَيُّكُمْ أَحْسَنُ عَمَلًا وَلَئِنْ قُلْتَ إِنَّكُمْ مَبْعُوثُونَ مِنْ بَعْدِ الْمَوْتِ لَيَقُولَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ هَذَا إِلَّا سِحْرٌ مُبِينٌ (7)वही है जिसने छह दिनों में आकाशों और धरती की रचना की, और उसका सिंहासन पानी पर था, ताकि तुम्हारी परीक्षा ले कि तुममे से कौन अधिक भले कर्म करने वाला है। (हे पैग़म्बर!) यदि आप यह कहें कि तुम लोग मृत्यु के पश्चात उठाए जाओगे तो वे कहेंगे कि यह स्पष्ट जादू के अतिरिक्त कुछ नहीं है। (11:7)इस आयत और क़ुरआने मजीद की अन्य आयतों से प्रतीत होता है कि इस संसार का मूल तत्व पानी या पानी जैसा ही कोई तत्व था और ईश्वर ने उसी के आधार पर सृष्टि की रचना की है और वह भी एक क्षण में नहीं बल्कि छह लंबे दिनों में।संसार या कम से कम मनुष्य की सृष्टि का उद्देश्य, उसकी प्रगति और परिपूर्णता था और यह बात परीक्षा की छाया में ही व्यवहारिक हो सकती है, जैसा कि आज की शैक्षिक व्यवस्था में निरंतर साप्ताहिक, मासिक, अर्धवार्षिक और वार्षिक परीक्षाओं द्वारा छात्रों की शैक्षिक योग्यता में वृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया जाता है।ईश्वरीय व्यवस्था में भी, जो कोई उत्तम और अधिक भला कर्म करे, उसे उच्च स्थान प्राप्त होता है। ईश्वरीय परीक्षा में उत्तीर्ण होने का मानदंड ज्ञान और विश्वास के साथ किया गया कर्म है। स्वाभाविक है कि हर परीक्षा में कुछ लोग उत्तीर्ण होते हैं और कुछ लोगों के हाथ निराशा लगती है।जीवन की परीक्षा के परिणाम की घोषणा एक दूसरे संसार में की जाएगी और उसी के अनुसार हर किसी को अपने सुकर्मों पर पारितोषिक प्राप्त होगा या फिर अपने कुकर्मों पर उसे दंडित किया जाएगा।इस आयत से हमने सीखा कि यद्यपि ईश्वर की शक्ति सभी वस्तुओं की एक क्षण में सृष्टि कर सकती है किन्तु उसकी तत्वदर्शिता कहती है कि सभी वस्तओं की सृष्टि क्रमानुसार की जाए।कर्म की गुणवत्ता महत्त्वपूर्ण है, उत्तम एवं अधिक भला कर्म ईश्वर की दृष्टि में स्वीकार्य है न कि अधिक कर्म।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या आठ की तिलावत सुनते हैं।وَلَئِنْ أَخَّرْنَا عَنْهُمُ الْعَذَابَ إِلَى أُمَّةٍ مَعْدُودَةٍ لَيَقُولُنَّ مَا يَحْبِسُهُ أَلَا يَوْمَ يَأْتِيهِمْ لَيْسَ مَصْرُوفًا عَنْهُمْ وَحَاقَ بِهِمْ مَا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ (8)और यदि हम एक निर्धारित समय तक के लिए उनके दंड को विलंबित कर देते हैं तो वे कहते हैं कि किस बात ने हमारे दंड को रोक लिया। जान लो कि जिस दिन उनका दंड आ जाएगा तो वापस होने वाला नहीं होगा और जिस (दंड) का वे परिहास कर रहे हैं वह उन्हें अपनी चपेट में ले लेगा। (11:8)ईश्वर के पैग़म्बर सदैव लोगों को चेतावनी देते रहते थे कि ईश्वर के प्रति उद्दंडता और बुरे कर्मों एवं पापों का परिणाम इसी संसार में दंड के रूप में सामने आएगा किन्तु पापी लोग जो अज्ञानता और घमंड में ग्रस्त रहते हैं, इन चेतनावनियों पर ध्यान देने के स्थान पर उनकी बातों का परिहास करते थे।ईश्वर इस आयत में कहता है कि यदि हम अपनी दया व कृपा के कारण दंड को विलंबित कर देते हैं तो यह उसे समाप्त करने के अर्थ में नहीं है बल्कि पापी समाज इसी संसार में निश्चित रूप से दंड में ग्रस्त होगा और जिस बात का वह परिहास करते थे वह उन्हें अपनी चपेट में ले लेगी।स्वाभाविक है कि दंड में विलंब, तौबा व प्रायश्चित का अवसर देता है और कुछ लोग इस माध्यम से ईश्वर पर दया के पात्र बन जाते हैं किन्तु यह समय सीमा अंततः समाप्त होने वाली है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की ओर से दी जाने वाली मोहलत, पापों की क्षतिपूर्ति के लिए अच्छा अवसर है।अपमान, परिहास और उपहास धार्मिक आस्थाओं के संबंध में काफ़िरों की शैली है क्योंकि उनके पास ईमान वालों के तर्क के मुक़ाबले में कोई ठोस तर्क नहीं होता।