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    सूरए हूद, आयतें 61-63, (कार्यक्रम 360)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 61 की तिलावत सुनते हैं।وَإِلَى ثَمُودَ أَخَاهُمْ صَالِحًا قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُمْ مِنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ هُوَ أَنْشَأَكُمْ مِنَ الْأَرْضِ وَاسْتَعْمَرَكُمْ فِيهَا فَاسْتَغْفِرُوهُ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ إِنَّ رَبِّي قَرِيبٌ مُجِيبٌ (61)और हमने समूद जाति (के लोगों) की ओर उनके भाई सालेह को भेजा और उन्होंने कहा कि हे मेरी जाति वालो! ईश्वर की उपासना करो कि उसके अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं है। उसी ने धरती से तुम्हारी रचना की और उसमें तुम्हें बसाया है। तो उससे क्षमा चाहो और उसकी ओर लौट आओ कि निसंदेह मेरा पालनहार अत्यधिक निकट और प्रार्थनाओं को स्वीकार करने वाला है। (11:61)आद जाति की कथा की समाप्ति के पश्चात हम इस कार्यक्रम में समूद जाति और उसके पैग़म्बर हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के बारे में बात करेंगे। वे हज़रत नूह और हज़रत हूद के पश्चात पैग़म्बर बने। अपने से पहले वाले पैग़म्बरों की भांति हज़रत सालेह ने भी लोगों को सबसे पहले एकेश्वरवाद की ओर आने और मूर्तिपूजा त्यागने का निमंत्रण दिया किन्तु पैग़म्बरों के मत में प्रलय का मामला संसार से अलग नहीं है और ईमान वाले व्यक्ति को चाहिए कि वह प्रलय में स्वर्ग प्राप्त करने के लिए जितने प्रयास करता है उतने ही प्रयास धरती को आबाद करने और उसे जीवन बिताने के लिए एक शांत व सुरक्षित स्थान में परिवर्तित करने के लिए करे।यही कारण है कि हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम अपनी जाति के लोगों को संबोधित करते हुए इस बात की ओर संकेत करते हैं कि ईश्वर ने धरती को तुम्हारे अधिकार में दिया है अतः इसे बसाने और आबाद करने का प्रयास करना चाहिए। इसके पश्चात वे कहते हैं। तुम धरती में मेहनत करने और खेती तथा पशुपालन के स्थान पर अवैध मार्ग से धन प्राप्त करने का प्रयास करते हो। अपने इस प्रकार के कार्यों से तौबा करो कि ईश्वर तौबा स्वीकार करने वाला है।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के साथ पैग़म्बरों का संबंध, पिता की भांति आदेशात्मक संबंध नहीं था बल्कि भाइयों का संबंध था कि जो उन्हें उपदेश देता है।ईश्वर चाहता है कि मनुष्य धरती को बसाए और आबाद करे।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 62 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا صَالِحُ قَدْ كُنْتَ فِينَا مَرْجُوًّا قَبْلَ هَذَا أَتَنْهَانَا أَنْ نَعْبُدَ مَا يَعْبُدُ آَبَاؤُنَا وَإِنَّنَا لَفِي شَكٍّ مِمَّا تَدْعُونَا إِلَيْهِ مُرِيبٍ (62)लोगों ने कहा। हे सालेह! तुम इससे पूर्व हमारे बीच आशा के पात्र थे। क्या तुम हमें उस वस्तु की उपासना से रोक रहे हो जिसकी उपासना हमारे पूर्वज किया करते थे? और निश्चित रूप से जिस बात की ओर तुम हमें बुला रहे हो उसके बारे में हम गहरी शंका में हैं। (11:62)हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के निमंत्रण के उत्तर में आम लोगों ने, जो अपने पिताओं और पूर्वजों के विचारों का अनुसरण करते हैं, उनकी तर्कसंगत बातों पर सोच विचार के स्थान पर उन पर अपने पूर्वजों की परंपराओं के विरोध का आरोप लगाया और कहा कि इससे पूर्व हमारे बीच तुम्हारी स्थिति बहुत अच्छी थी और तुम एक विश्वस्त व लोकप्रिय व्यक्ति समझे जाते थे किन्तु तुम्हारी इन बातों से हमें तुम्हारे बारे में गहरा संदेह होने लगा है।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म के प्रचारक को यह बात समझ लेनी चाहिए कि साधारण लोग सरलता से अपनी आस्थाओं को छोड़ने वाले नहीं हैं और उनके तत्काल सुधर जाने की आशा नहीं रखनी चाहिए।यदि संदेह, सत्य के बारे में अध्ययन और वास्तविकता तक पहुंचने की भूमिका न हो तो मनुष्य के पतन का कारण बनेगा।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 63 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِنْ كُنْتُ عَلَى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبِّي وَآَتَانِي مِنْهُ رَحْمَةً فَمَنْ يَنْصُرُنِي مِنَ اللَّهِ إِنْ عَصَيْتُهُ فَمَا تَزِيدُونَنِي غَيْرَ تَخْسِيرٍ (63)हज़रत सालेह ने कहा! हे मेरी जाति वालो! क्या तुमने यह सोचा है कि यदि मेरे पास अपने पालनहार की ओर से स्पष्ट प्रमाण हो और मैं उसकी दया का पात्र हूं तो यदि मैं ईश्वर के आदेश की अवहेलना करूं तो कौन उसके मुक़ाबले में मेरी सहायता करेगा? अतः तुम मेरे लिए घाटे के अतिरिक्त किसी वस्तु की वृद्धि नहीं कर सकते। (11:63)समूद जाति की तर्कहीन बातों के उत्तर में हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम कहते हैं कि मुझे ईश्वरीय दया प्राप्त हुई है और पैग़म्बर बनाया गया है तथा तुम्हारे बीच ईश्वरीय धर्म के प्रचार का दायित्व मुझे सौंपा गया है तो यदि मैंने अपने इस अभियान को भलिभांति पूरा न किया तो तुम भी मेरी सहायता नहीं कर सकते। अतः इस बात का कोई कारण नहीं है कि मैं अपना दायित्व छोड़ दूं और केवल तुम्हें प्रसन्न करने के लिए मौन धारण कर लूं।वस्तुतः लोग चाहते थे कि हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की प्रशंसा और सराहना करके उन्हें अपना मार्ग त्यागने पर विवश करें ताकि वे अतीत की ओर लौट जाएं और अपनी नई बातों को छोड़ दें किन्तु हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम का उत्तर यह था कि यह मेरा व्यक्तिगत मामला नहीं है बल्कि एक ईश्वरीय दायित्व है अतः मैं इसे छोड़ नहीं सकता और यदि तुम्हारे पास भी मेरी भांति स्पष्ट तर्क होता तो तुम भी यही काम करते और कदापि इसे नहीं छोड़ते। इस आयत से हमने सीखा कि आसमानी धर्म, स्पष्ट और दृढ़ तर्क पर आधारित होता है और वह लोगों को धमकी या लोभ के आधार पर नहीं बल्कि इसी सुदृढ़ तर्क के आधार पर निमंत्रण देता है।ईश्वरीय क़ानून की दृष्टि में सभी लोग एकसमान हैं और यदि पैग़म्बर भी अपने दायित्व निर्वाह में ढिलाई करें तो उन्हें ईश्वरीय दंड भोगना पड़ता है।लोगों को प्रसन्न करने के लिए, ईश्वर का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि ईश्वर के समक्ष लोगों की कोई शक्ति नहीं है।