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    सूरए हूद, आयतें 64-68, (कार्यक्रम 361)

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    आइये पहले सूरए हूद की आयत संख्या 64 की तिलावत सुनते हैं।وَيَا قَوْمِ هَذِهِ نَاقَةُ اللَّهِ لَكُمْ آَيَةً فَذَرُوهَا تَأْكُلْ فِي أَرْضِ اللَّهِ وَلَا تَمَسُّوهَا بِسُوءٍ فَيَأْخُذَكُمْ عَذَابٌ قَرِيبٌ (64)(हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने कहा) हे मेरी जाति वालो! ईश्वर की (इच्छा से अस्तित्व में आने वाली) यह ऊंटनी तुम्हारे लिए चमत्कार है, तो इसे स्वतंत्र छोड़ दो कि ईश्वर की धरती पर चरती रहे और इसे यातना न देना कि शीघ्र ही ईश्वरीय दंड तुम्हें आ लेगा। (11:64)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के तर्कसंगत निमंत्रण के बावजूद उनकी जाति के लोगों ने उन पर निराधार आरोप लगाए और उन्हें अपने पूर्वजों के संस्कारों और परंपराओं का विरोध करने से रोका। पैग़म्बरों की शैली यह थी कि वे तर्कसंगत बातों के साथ ही ईश्वरीय चमत्कार भी प्रस्तुत करते थे ताकि किसी भी प्रकार का संदेह न रहे।ईश्वर के आदेश पर पर्वत के बीच से एक ऊंटनी पैदा हुई जो गाभिन थी। वह लोगों को दूध दिया करती थी इसी कारण हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने लोगों से कहा कि उसे यातनाएं न दें और उसे आवश्यकता के अनुसार बस्ती से पानी पीने और चरने की अनुमति दें अन्यथा उन्हें ईश्वरीय दंड का सामना करना पड़ेगा।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वर की शक्ति भौतिक कारणों से इतर होती है, पर्वत से ऊंटनी को पैदा करना इसका एक उदाहरण है।धार्मिक मान्यताओं और विशेषकर ईश्वरीय आयाम रखने वाली मान्यताओं के आनादर का परिणाम, तत्काल दंड के रूप में सामने आता है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 65 की तिलावत सुनते हैं।فَعَقَرُوهَا فَقَالَ تَمَتَّعُوا فِي دَارِكُمْ ثَلَاثَةَ أَيَّامٍ ذَلِكَ وَعْدٌ غَيْرُ مَكْذُوبٍ (65)किन्तु उन्होंने (ऊंटनी के हाथ पांव काटकर) उसकी हत्या कर दी तो हज़रत सालेह ने कहा, बस तीन दिन और आनंद ले लो (जिसके बाद दंड आएगा) यह ऐसा अटल वचन है जिसमें कुछ भी झूठ नहीं है। (11:65)समूद जाति के लोगों ने न तो हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम का निमंत्रण स्वीकार किया और न ही उनके चमत्कार के समक्ष नतमस्तक हुए, इसी कारण उनमें से एक ने उस ऊंटनी की हत्या करने का निर्णय किया और फिर अपने इस निर्णय को व्यवहारिक बना दिया। अन्य लोगों ने भी न केवल यह कि उसे इस कार्य से नहीं रोका बल्कि मन में उसके कार्य से प्रसन्न हुए और शायद कई लोगों ने उसकी सहायता भी की होगी।यही कारण था कि पूरी समूद जाति के लोगों को ईश्वर की ओर से चेतावनी मिली और ईश्वर ने उन्हें दंडित करने का वचन दिया। ईश्वर की ओर से उन्हें तौबा व प्रायश्चित के लिए तीन दिन का समय दिया गया। यह समय सीमा भी उनके लिए एक दंड स्वरूप थी जिसमें वे तीन दिनों तक ग्रस्त रहे।इस आयत से हमने सीखा कि दूसरों के पापों से सहमत रहना भी उनके पापों में भाग लेने के सामान है और पापियों के समर्थक, उनके पापों में सहभागी हैं।ईश्वरीय चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए कि धार्मिक मान्यताओं के अनादर के परिणाम स्वरूप निश्चित रूप से ईश्वरीय दंड आता है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 66 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا جَاءَ أَمْرُنَا نَجَّيْنَا صَالِحًا وَالَّذِينَ آَمَنُوا مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِنَّا وَمِنْ خِزْيِ يَوْمِئِذٍ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ الْقَوِيُّ الْعَزِيزُ (66)तो जब हमारे आदेश का समय आ गया तो हमने अपनी कृपा से सालेह और उनके साथ ईमान लाने वालों को बचा लिया और उस दिन के अपमान से उन्हें मुक्ति दिला दी। निसंदेह तुम्हारा पालनहार अत्यधिक शक्तिशाली और अजेय है। (11:66)बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं में काफ़िर और ईमान वाले दोनों ही ग्रस्त होते हैं और इसमें दोनों के बीच कोई अंतर नहीं होता किन्तु जहां ईश्वरीय कोप आता है वहां ईमान वाले सुरक्षित रहते हैं और केवल ऐसे काफ़िर ही दंड में ग्रस्त होते हैं जो दंड के योग्य हों।यही कारण है कि जब समूद जाति पर ईश्वरीय दंड आया तो ईश्वर ने अपने पैग़म्बर और उन पर ईमान लाने वालों तथा उनके साथियों को बचा लिया और केवल अपराधी दंडित हुए। यह विषय ईश्वर के ज्ञान, उसकी शक्ति और उसके अजेय होने का प्रमाण है।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बरों का अनुसरण, मनुष्य को अपमान से दूर करके सम्मान और गौरव तक पहुंचाता है।असंख्य काफ़िरों के बीच से कुछ ईमान वालों को बचा लेना, सर्व समक्ष ईश्वर के लिए अत्यंत सरल है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 67 और 68 की तिलावत सुनते हैं।وَأَخَذَ الَّذِينَ ظَلَمُوا الصَّيْحَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دِيَارِهِمْ جَاثِمِينَ (67) كَأَنْ لَمْ يَغْنَوْا فِيهَا أَلَا إِنَّ ثَمُودَ كَفَرُوا رَبَّهُمْ أَلَا بُعْدًا لِثَمُودَ (68)और अत्याचारियों को एक (भयंकर आसमानी) चिंघाड़ ने आ लिया तो वे अपने घरों में औंधे मुंह पड़े रह गए। (11:67) मानो वे कभी वहां रहे ही न हों। जान लो कि समूद जाति ने अपने पालनहार का इन्कार किया तो समूद जाति अपने पालनहार की दया से दूर हो जाए। (11:68)हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने अपनी अत्याचारी जाति के लोगों को ईश्वर की ओर से जो वचन दिया था वह व्यवहारिक हुआ और आकाश से आने वाली एक भायवह आवाज़ और धरती पर आने वाले एक भयंकर भूकंप ने उस उद्दंडी जाति को तबाह कर दिया।भयानक बिजली, उसकी चमक और कड़क के कारण लोग औंधे मुंह धरती पर गिर पड़े और उसी स्थिति में उनके प्राण पखेरू उड़ गए। यह वैसी ही दशा थी जब मनुष्य को बिजली का झटका लगता है तो वह अपने स्थान से हिल भी नहीं पाता और वहीं पड़ा रहता है।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर की ओर से दंड का आना, स्वयं लोगों के अत्याचारों का परिणाम है और ईश्वर किसी को अकारण दंडित नहीं करता।ईश्वरीय दंड प्रलय से विशेष नहीं है, अत्याचारियों को इसी संसार में भी दंडित किया जाता है।