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    सूरए हूद, आयतें 69-73, (कार्यक्रम 362)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 69 और 70 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ جَاءَتْ رُسُلُنَا إِبْرَاهِيمَ بِالْبُشْرَى قَالُوا سَلَامًا قَالَ سَلَامٌ فَمَا لَبِثَ أَنْ جَاءَ بِعِجْلٍ حَنِيذٍ (69) فَلَمَّا رَأَى أَيْدِيَهُمْ لَا تَصِلُ إِلَيْهِ نَكِرَهُمْ وَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةً قَالُوا لَا تَخَفْ إِنَّا أُرْسِلْنَا إِلَى قَوْمِ لُوطٍ (70)और निसंदेह हमारे फ़रिश्ते शुभ सूचना लेकर इब्राहीम के पास आए और उन्होंने कहा कि तुम पर सलाम हो, इब्राहीम ने भी कहा कि तुम पर भी सलाम हो तो थोड़ा सा समय भी न बीता था कि वे (अतिथियों के लिए) एक भुना हुआ बछड़ा ले आए। (11:69) फिर जब उन्होंने देखा कि उनके हाथ उस (खाने) की ओर नहीं बढ़ते तो उन्हें चिंता हुई और उन्होंने उनके एक प्रकार के भय का आभास किया। उन लोगों ने कहा, डरो मत हम लूत की जाति के विनाश के लिए भेजे गए हैं। (11:70)पिछले कार्यक्रमों में हज़रत हूद और सालेह अलैहिस्सलाम की घटनाओं के वर्णन की समाप्ति के पश्चात इन आयतों में हज़रत इब्राहीम और लूत की जाति के विनाश के लिए ईश्वर की ओर से आने वाले फ़रिश्तों की घटना का उल्लेख किया गया है।चूंकि फ़रिश्ते मनुष्य के रूप में आए थे, अतः हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने उनके लिए भोजन तैयार किया किन्तु चूंकि वे वस्तुतः फ़रिश्ते थे अतः उन्होंने खाने को छुआ भी नहीं। यह बात हज़रत इब्राहीम के लिए चिंता का विषय बन गई। उन्होंने सोचा कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये किसी बुरे इरादे से आए हैं और इस लिए खाना नहीं खा रहे हैं कि ऋणी न हो जाएं।किन्तु उन लोगों ने अपना परिचय कराते हुए कहा कि हम शुभ सूचना भी लाए हैं और दंड का समाचार भी। तुम्हारे लिए यह शुभ सूचना है कि ईश्वर तुम्हें बुढ़ापे में एक पुत्र प्रदान करेगा और बुरा समाचार यह है कि ईश्वर ने लूत की जाति को दंडित करने के अपने वचन को निश्चित बना दिया है।चूंकि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम, हज़रत इब्राहीम के ही धर्म का प्रचार करने वाले एक पैग़म्बर थे अतः लूत जाति को दंडित करने का ईश्वरीय आदेश पहले हज़रत इब्राहीम के पास आया और फिर हज़रत लूत को इसकी सूचना दी गई।इन आयतों से हमने सीखा कि आकाश के फ़रिश्ते भी अपनी बात सलाम से आरंभ करते हैं और यह सभी पवित्र लोगों के चरित्र का भाग है।आतिथ्य प्रेम, सभी ईश्वरीय पैग़म्बरों की परंपरा है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 71 और 72 की तिलावत सुनते हैं।وَامْرَأَتُهُ قَائِمَةٌ فَضَحِكَتْ فَبَشَّرْنَاهَا بِإِسْحَاقَ وَمِنْ وَرَاءِ إِسْحَاقَ يَعْقُوبَ (71) قَالَتْ يَا وَيْلَتَى أَأَلِدُ وَأَنَا عَجُوزٌ وَهَذَا بَعْلِي شَيْخًا إِنَّ هَذَا لَشَيْءٌ عَجِيبٌ (72)और इब्राहीम की पत्नी भी (वहीं) खड़ी हुई थीं, (यह सुना) तो वह हंसने लगीं, फिर हमने इब्राहीम को इस्हाक़ और उसके बाद याक़ूब की शुभ सूचना दी। (11:71) (इब्राहीम की पत्नी ने) कहा, हाय मेरा अभाग्य! क्या (अब) मेरे संतान होगी जब मैं बूढ़ी हो चुकी हूं और ये मेरे पति भी बूढ़े हैं। यह तो बहुत ही विचित्र बात है। (11:72)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और फ़रिश्तों की बातचीत उनकी पत्नी सारा ने भी सुनी और यह जान कर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि बुढ़ापे में उनके यहां संतान होने वाली है क्योंकि वे युवाकाल से ही बांझ थीं और उनके यहां कोई संतान नहीं हुई थी।इसके अतिरिक्त हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम भी वृद्धावस्था में थे और प्राकृतिक रूप से ऐसे दंपति के यहां संतान का होना असंभव होता है किन्तु ईश्वर की असीम शक्ति के समक्ष इस प्रकार की बाधाओं का कोई अर्थ नहीं होता और उसकी इच्छा हर बात के ऊपर है।इन आयतों से हमने सीखा कि अच्छी संतान, ऐसी अनुकंपा है जिसे ईश्वर ने आसमानी शुभ सूचना बताया है।हमें ईश्वर की शक्ति को अपनी सीमित व भौतिक संभावनाओं से नहीं आंकना चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 73 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا أَتَعْجَبِينَ مِنْ أَمْرِ اللَّهِ رَحْمَةُ اللَّهِ وَبَرَكَاتُهُ عَلَيْكُمْ أَهْلَ الْبَيْتِ إِنَّهُ حَمِيدٌ مَجِيدٌ (73)(फ़रिश्तों ने इब्राहीम की पत्नी से) कहा, क्या तुम्हें ईश्वर के काम पर आश्चर्य हो रहा है? ईश्वर की दया और विभूति हो तुम पैग़म्बर के परिजनों पर। निसंदेह ईश्वर प्रशंसनीय और वैभवशाली है। (11:73)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की पत्नी का आश्चर्य स्वाभाविक था और विशेषकर एक वृद्ध महिला के लिए इस बात पर विश्वास करना बहुत कठिन था कि मां बनने जा रही है, इसीलिए फ़रिश्तों ने उनसे कहा कि यह ईश्वर की इच्छा है और इसमें अचरज की कोई बात नहीं है। विशेषकर इसलिए कि तुम पैग़म्बर के घर में जीवन बिता रही हो और ईश्वर ने इस घर और इसमें रहने वालों के लिए अपनी दया व कृपा विशेष की है।हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कथन है कि जब कोई तुम्हें सलाम करे तो जो कुछ फ़रिश्तों ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम से कहा था कि उसे तुम भी अपने उत्तर में बढ़ा दो और कहो कि व अलैकुमुस्सलाम व रहमतुल्लाहे व बरकातोह।इस आयत से हमने सीखा कि संतान, ईश्वर की दया का चिन्ह और परिवार के लिए विभूति का कारण है।ईश्वरीय सहायता की ओर से कदापि निराश नहीं होना चाहिए। जिस ईश्वर ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिए आग को ठंडा बना दिया था वह वृद्ध पति-पत्नी को संतान भी प्रदान कर सकता है।