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    सूरए हूद, आयतें 74-78, (कार्यक्रम 363)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 74 और 75 की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا ذَهَبَ عَنْ إِبْرَاهِيمَ الرَّوْعُ وَجَاءَتْهُ الْبُشْرَى يُجَادِلُنَا فِي قَوْمِ لُوطٍ (74) إِنَّ إِبْرَاهِيمَ لَحَلِيمٌ أَوَّاهٌ مُنِيبٌ (75)तो जब इब्राहीम की घबराहट दूर हो गई और उनके पास (पुत्र की) शुभसूचना भी आ गई तो उन्होंने लूत जाति के बारे में हमसे तर्क-वितर्क करना आरंभ किया, (11:74) निसंदेह इब्राहीम अत्यंत सहनशील, कोमल हृदय वाले और तौबा व प्रायश्चित करने वाले थे। (11:75)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वरीय फ़रिश्ते मनुष्यों के रूप में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के पास पहुंचे और उन्होंने फ़रिश्तों के स्वागत सत्कार स्वरूप खाने पीने के लिए जो कुछ रखा उसे उन्होंने हाथ नहीं लगाया तो वे चिंतित हो गए किन्तु जब उन्हें पुत्र की शुभ सूचना दी गई तो उनकी चिंता दूर हो गई और उस संबंध में बात करने का मार्ग प्रशस्त हो गया जिसके लिए फ़रिश्ते भेजे गए थे।हमने कहा था कि चूंकि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम और उनकी जाति के लोग हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के अधीन थे, अतः उस पापी जाति को दंडित करने की सूचना पहले उन्हें दी गई। यह आयत कहती है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने लूत जाति को दंडित करने के संबंध में तर्क-वितर्क किया, जैसा कि सूरए अनकबूत की आयत नंबर बत्तीस में कहा गया है कि इब्राहीम ने उनसे कहा कि तुम किस प्रकार उन लोगों को दंडित करोगे जबकि उनके बीच ईश्वर के पैग़म्बर लूत मौजूद हैं, फ़रिश्तों ने उत्तर में कहा कि हम उनकी स्थिति से अवगत हैं और लूत तथा उनके साथियों को बचा लेंगे।इन आयतों से हमने सीखा कि अनुकंपाओं की प्राप्ति हमें दूसरों के अंत की ओर से निश्चेत न कर दे। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को यद्यपि पुत्र प्राप्ति की शुभ सूचना मिली किन्तु वे लूत जाति की ओर से निश्चेत नहीं हुए।ऐसे अवसरों पर जहां ईश्वर अपना नियम निश्चित नहीं करता, दुआ, प्रार्थना, और ईश्वर के प्रिय बंदों से सिफ़ारिश प्रभावी होती है, यही कारण था कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने लूत जाति को क्षमा किए जाने के बारे में तर्क-वितर्क किया।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या छिहत्तर की तिलावत सुनते हैं।يَا إِبْرَاهِيمُ أَعْرِضْ عَنْ هَذَا إِنَّهُ قَدْ جَاءَ أَمْرُ رَبِّكَ وَإِنَّهُمْ آَتِيهِمْ عَذَابٌ غَيْرُ مَرْدُودٍ (76)(फ़रिश्तों ने कहा,) हे इब्राहीम! इस आग्रह को छोड़ दो कि निसंदेह तुम्हारे पालनहार का आदेश आ चुका है और एक अटल दंड उन्हें आ लेगा। (11:76)हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की ओर लूत जाति के लिए आने वाले दंड को समाप्त करने या विलंबित करने का आग्रह, ईश्वरीय आदेश के इन्कार या किसी अन्य बात के कारण नहीं बल्कि अपनी जाति के लिए उनकी सहानुभूति के आधार पर था किन्तु चूंकि ईश्वरीय दंड निश्चित हो चुका था, उनकी सिफ़ारिश का भी कोई लाभ नहीं हुआ और उनसे कहा गया कि वे अपने इस आग्रह को छोड़ दें।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर समाज के करुणामयी नेता होते हैं और लोगों की ओर से उद्दंडता और यातनाएं दिए जाने के बावजूद वे उनके कल्याण व मोक्ष के लिए प्रयास करते रहते हैं।कुछ दंड निश्चित होते हैं और पैग़म्बरों तक की सिफ़ारिश भी उन्हें नहीं रोक सकती।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या सतहत्तर की तिलावत सुनते हैं।وَلَمَّا جَاءَتْ رُسُلُنَا لُوطًا سِيءَ بِهِمْ وَضَاقَ بِهِمْ ذَرْعًا وَقَالَ هَذَا يَوْمٌ عَصِيبٌ (77)और जब हमारे दूत लूत के पास आए तो उनके आने से अप्रसन्न और उनके विचार से दुखी हो गए और अपने आप से कहने लगे कि यह बहुत कड़ा दिन है। (11:77)

    लूत जाति को दंडित करने वाले फ़रिश्ते जब सुंदर मनुष्यों के रूप में हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के पास आए और उनके अतिथि बने तो वे चिंतित हो गए क्योंकि यदि उनकी जाति के पापी लोग उन युवाओं को देख लेते तो उनके कहते कि वे अपने उन अतिथियों के उनके हवाले कर दें। हज़रत लूत अपनी जाति के लोगों की प्रवृत्ति से अवगत थे, इसी कारण वे दुखी व अप्रसन्न थे और उन्होंने अपने को घर में बंद कर लिया था।इस आयत से हमने सीखा कि बुराई से संघर्ष का पहला चरण, उसे हृदय से बुरा समझना है कि मनुष्य दूसरों की ओर पाप करने के निर्णय पर भी दुखी हो जाए।अतिथि की सुरक्षा का दायित्व, मेज़बान पर है और उसे इस बात का भरपूर प्रयास करना चाहिए कि उसके अतिथि को कोई क्षति न पहुंचे।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 78 की तिलावत सुनते हैं।وَجَاءَهُ قَوْمُهُ يُهْرَعُونَ إِلَيْهِ وَمِنْ قَبْلُ كَانُوا يَعْمَلُونَ السَّيِّئَاتِ قَالَ يَا قَوْمِ هَؤُلَاءِ بَنَاتِي هُنَّ أَطْهَرُ لَكُمْ فَاتَّقُوا اللَّهَ وَلَا تُخْزُونِ فِي ضَيْفِي أَلَيْسَ مِنْكُمْ رَجُلٌ رَشِيدٌ (78)और लूत की जाति वाले उनके पास दौड़ते हुए आए कि जो पहले से ही दुष्कर्म करते रहे थे। लूत ने कहा, हे मेरी जाति वालो! ये मेरी बेटियां हैं (तुम इनके साथ विवाह कर सकते हो) ये तुम्हारे लिए पवित्र हैं। ईश्वर से डरो और पाप मत करो और मुझे मेरे अतिथियों के समक्ष अपमानित न करो। क्या तुम्हारे भीतर कोई भला पुरुष नहीं है? (11:78)पिछली आयत में हमने कहा था कि हज़रत लूत अलैहिस्सलाम अपनी जाति के लोगों के बुरे इरादों से अवगत हो गए थे और जब उन्होंने देखा कि वे लोग उनके घर तक पहुंच गए हैं तो उन्हेंने कहा कि यदि तुम अपनी शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति करना चाहते हो तो इसके लिए अपनी जाति की लड़कियां उपयुक्त हैं। यदि तुम उनसे विवाह करके अपनी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति करो तो यह शरीर व आत्मा की पवित्रता से अधिक निकट है।उन्होंने कहा कि तुम क्यों पाप करना चाहते हो? स्पष्ट है कि तुममें तनिक भी भलाई और शौर्य नहीं है कि तुम मेरे अतिथियों पर भी दया नहीं कर रहे हो।इस आयत से हमने सीखा कि कभी कभी समाज का इतना पतन हो जाता है कि लोग पाप करने से एक दूसरे से होड़ लगाने लगते हैं और बड़ी तीव्रता से नैतिक पतन व पथभ्रष्टता की ओर बढ़ते हैं।बुराइयों को रोकने के लिए सबसे पहले समाज में अच्छाइयों को प्रचलित व विस्तृत करना चाहिए।