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    सूरए हूद, आयतें 79-83, (कार्यक्रम 364)

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    आइये पहले सूरए हूद की आयत संख्या उनासी और अस्सी की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا لَقَدْ عَلِمْتَ مَا لَنَا فِي بَنَاتِكَ مِنْ حَقٍّ وَإِنَّكَ لَتَعْلَمُ مَا نُرِيدُ (79) قَالَ لَوْ أَنَّ لِي بِكُمْ قُوَّةً أَوْ آَوِي إِلَى رُكْنٍ شَدِيدٍ (80)(लूत की जाति वालों ने) कहा, तुम स्वयं जानते हो कि तुम्हारी बेटियों के संबंध में हमारा कोई अधिकार नहीं है और तुम भलिभांति यह भी जानते हो कि हम क्या चाहते हैं। (11:79) (लूत ने) कहा, काश मेरे पास तुम से निपटने की शक्ति होती और मैं किसी दृढ़ सहारे का आश्रय ले सकता। (11:80)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि जब फ़रिश्ते सुंदर युवाओं के रूप में हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के पास आए तो उनकी भ्रष्ट एवं व्यभिचारी जाति के लोगों ने उनके समक्ष अपनी अनुचित और अवैध मांग रखी और जब हज़रत लूत ने कहा कि इन युवाओं के स्थान पर मैं अपनी बेटियों का विवाह तुम से करने के लिए तैयार हूं तो उन्होंने कहा कि हमें आपकी बेटियों से कोई रुचि नहीं है और हम केवल इन युवाओं को चाहते हैं अतः आप इन्हें हमारे हवाले कर दीजिए।हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने, जिन्हें कोई विकल्प नहीं दिखाई दे रहा था, कहा कि काश मेरे कुछ ऐसे ईमानदार साथी होते जिनके सहारे मैं तुम जैसे तुच्छ लोगों के समक्ष डट सकता और अपने अतिथियों की रक्षा कर सकता या उन्हें किसी सुरक्षित स्थान तक पहुंचा सकता।यद्यपि क़ुरआने मजीद इन आयतों में लूत जाति के बारे में बात कर रहा है जो कई हज़ार वर्ष पूर्व थी किन्तु उस जाति की अनैतिक व अवैध मांगें आज के विकसित और तथाकथित सभ्य संसार के कई देशों में क़ानूनी रूप से स्वीकार कर ली गई हैं। दूसरे शब्दों में समलैंगिकता न केवल अप्रिय नहीं समझी जाति बल्कि कुछ यूरोपीय देशों ने समलैंगिक विवाह को क़ानूनी मान्यता भी प्रदान कर दी है।क़ुरआने मजीद अनेक आयतों में इस निंदनीय कार्य की भर्त्सना करता है और उसने इसके लिए अनेक कड़े शब्द प्रयोग किए हैं, जैसे अज्ञानता, अत्याचार, अपराध, बुराई, अपव्यय, व्यभिचार और अनैतिकता।इन आयतों से हमने सीखा कि पाप पर आग्रह और उसे जारी रखना, इस बात का कारण बनता है कि मनुष्य का स्वरूप बदल जाए और वह बुरी बातों को भली और भली बातों को बुरी समझने लगे।यदि संभव हो तो हमें बुराई से रोकना चाहिए अन्यथा बुरे वातावरण से सुरक्षित वातावरण की ओर चले जाना चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या इकासी की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا لُوطُ إِنَّا رُسُلُ رَبِّكَ لَنْ يَصِلُوا إِلَيْكَ فَأَسْرِ بِأَهْلِكَ بِقِطْعٍ مِنَ اللَّيْلِ وَلَا يَلْتَفِتْ مِنْكُمْ أَحَدٌ إِلَّا امْرَأَتَكَ إِنَّهُ مُصِيبُهَا مَا أَصَابَهُمْ إِنَّ مَوْعِدَهُمُ الصُّبْحُ أَلَيْسَ الصُّبْحُ بِقَرِيبٍ (81)फ़रिश्तों ने कहा, हे लूत हम तुम्हारे पालनहार के दूत हैं, (अतः हमारी चिंता न करो) वे कदापि तुम तक नहीं पहुंच सकेंगे, तो रात्रि के किसी भाग में अपनी पत्नी को छोड़कर अपने परिजनों को लेकर बाहर निकल जाओ और तुम में से कोई पीछे पलट कर न देखे। अलबत्ता जो कुछ इन पर बीतने वाला है और तुम्हारी पत्नी पर भी बीतेगा। इन (के दंड) का निर्धारित समय भोर है तो क्या भोर निकट नहीं है? (11:81)हज़रत लूत अलैहिस्सलाम को अपनी जाति के व्यभिचारी लोगों की अनैतिक मांगों के समक्ष कोई मार्ग दिखाई नहीं पड़ रहा था। फ़रिश्तों ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि वे लोग आपको या हमें क्षति पहुंचाने की क्षमता नहीं रखते और हम तो मूलरूप से उन्हें दंडित करने के लिए आए हैं अतः आज ही रात आप नगर से बाहर निकल जाइये और पटल कर भी न देखिए यहां तक कि भोर समय ईश्वरीय दंड आ जाए। अलबत्ता आपकी पत्नी भी उनके दंड में सहभागी होगी क्योंकि उसने आपका साथ देने के स्थान पर व्यभिचारियों का साथ दिया है।यह आयत भलिभांति ईमान वालों और उनके परिजनों का मामला अलग रखने पर बल देती है और कहती है कि पैग़म्बर का परिजन होना भी मुक्ति का कारण नहीं बन सकता और हर किसी के मामले को उसके कर्मों और व्यवहार के अनुसार देखा जाएगा।विचार और आस्था के चयन में महिला स्वतंत्र है। पैग़म्बर की पत्नी भी उनके घर में रह कर विरोधियों का मार्ग अपना सकती है।इस आयत से हमने सीखा कि ईश्वरीय व्यवस्था में मान्यताएं, संबंधों के आधार पर नहीं बल्कि सिद्धांतों के आधार पर होती हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या बयासी और तिरासी की तिलावत सुनते हैं।فَلَمَّا جَاءَ أَمْرُنَا جَعَلْنَا عَالِيَهَا سَافِلَهَا وَأَمْطَرْنَا عَلَيْهَا حِجَارَةً مِنْ سِجِّيلٍ مَنْضُودٍ (82) مُسَوَّمَةً عِنْدَ رَبِّكَ وَمَا هِيَ مِنَ الظَّالِمِينَ بِبَعِيدٍ (83)फिर जब कोप का हमारा आदेश आ गया तो हमने उस बस्ती को उलट पलट कर रख दिया और उन पर पक्की मिट्टी के पत्थरों की वर्षा कर दी (11:82) जिन पर तुम्हारे पालनहार की ओर से निशान लगे हुए थे और यह दंड अत्याचारियों से दूर नहीं है। (11:83)ये आयतें लूत जाति के कड़े अंत का वर्णन करती हैं। आकाश से पत्थरों की वर्षा और ऐसा भयंकर भूकंप जिसने उनके घरों को उलट पलट कर रख दिया, इस व्यभिचारी जाति के लिए सांसारिक दंड था। क़ुरआने मजीद इस वास्तविक घटना का वर्णन करता है ताकि दूसरे इससे पाठ सीखें और लोग यह जान लें कि यह दंड केवल लूत जाति के लिए नहीं था बल्कि हर वह जाति और समाज जो पथभ्रष्टता की ओर बढ़ा और उसमें इस प्रकार के अनैतिक एवं घृणित संबंध प्रचलित हुए वह दंड में ग्रस्त होगा।इन आयतों से हमने सीखा कि प्रकृति की परंपराओं की अनदेखी, मनुष्य की पवित्र प्रवृत्ति को बदल देती है। ऐ लोगों को कड़े दंड की प्रतीक्षा में रहना चाहिए।ईश्वर की शक्ति को सीमित नहीं समझना चाहिए। वह जो अपने बंदों पर अपनी दया की वर्षा करता है, चेतावनी के रूप में किसी क्षेत्र के लोगों को दंडित भी कर सकता है।