islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सूरए हूद, आयतें 84-86, (कार्यक्रम 365)

    सूरए हूद, आयतें 84-86, (कार्यक्रम 365)

    Rate this post

    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या चौरासी की तिलावत सुनते हैं।وَإِلَى مَدْيَنَ أَخَاهُمْ شُعَيْبًا قَالَ يَا قَوْمِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُمْ مِنْ إِلَهٍ غَيْرُهُ وَلَا تَنْقُصُوا الْمِكْيَالَ وَالْمِيزَانَ إِنِّي أَرَاكُمْ بِخَيْرٍ وَإِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ مُحِيطٍ (84)और हमने मदयन (के लोगों) की ओर उनके भाई शुऐब को भेजा। उन्होंने कहा कि हे मेरी जाति वालो! ईश्वर की उपासना करो कि उसके अतिरिक्त तुम्हारा कोई ईश्वर नहीं है और (क्रय-विक्रय के समय) नाप और तुला में कमी न करो, निसंदेह मैं तुम्हारा हितैषी हूं और मुझे तुम्हारे बारे में प्रलय के दिन के व्यापक दंड का भय है। (11:84)हज़रत नूह और हूद की जातियों के संक्षिप्त इतिहास के वर्णन के बाद क़ुरआने मजीद शुऐब के इतिहास की ओर संकेत करता है कि जो अक़बा की खाड़ी के पूर्व में स्थित मदयन क्षेत्र की ओर भेजे गए थे। उन्होंने वहां के लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण दिया और लेन-देन में कमी या डंडी मारने से रोका।मूल रूप से सभी पैग़म्बरों के निमंत्रण का आधार, एकेश्वरवाद है जिसे स्वीकार करने के पश्चात मनुष्य आंतरिक और बाहरी इच्छाओं के पालन से मुक्त हो जाता है तथा ब्रहमांड के पालनहार के आदेशों का पालन करने लगता है। स्वाभाविक रूप से ऐसा मनुष्य अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं करता और अन्य लोगों के अधिकारों का सम्मान करता है।अलबत्ता ईश्वर की उपासना का अर्थ केवल प्रार्थना और उपासना नहीं है बल्कि व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में आर्थिक मामलों सहित जीवन के सभी आयामों में ईश्वरीय क़ानूनों का पालन, ईश्वर पर ईमान का अटूट भाग है अतः हज़रत शुऐब लोगों को एकेश्वरवाद का निमंत्रण देने के साथ ही क्रय-विक्रय में कमी से रोकते हैं और कहते हैं कि इसके परिणाम स्वरूप ईश्वरीय दंड में ग्रस्त होना पड़ेगा।स्पष्ट है कि हर समय और हर स्थान पर लोगों के बीच किसी न किसी प्रकार की बुराई अधिक प्रचलित होती है। इसी बात के दृष्टिगत पैग़म्बर उस बुराई से संघर्ष को अपने कार्यक्रमों में प्राथमिकता देते थे। उदाहरण स्वरूप हज़रत लूत की जाति के लोगों के बीच समलैंगिकता और हज़रत शुऐब की जाति के बीच आर्थिक भ्रष्टाचार अधिक प्रचलित था।इस आयत से हमने सीखा कि पैग़म्बर केवल आस्था संबंधी मामलों और नैतिक सिफ़ारिशों तक ही सीमित नहीं रहते थे बल्कि आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर भी पूर्ण रूप से ध्यान देते थे।प्रलय पर ध्यान देने से मनुष्य, बुराइयों से दूर रहता है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 85 की तिलावत सुनते हैं।وَيَا قَوْمِ أَوْفُوا الْمِكْيَالَ وَالْمِيزَانَ بِالْقِسْطِ وَلَا تَبْخَسُوا النَّاسَ أَشْيَاءَهُمْ وَلَا تَعْثَوْا فِي الْأَرْضِ مُفْسِدِينَ (85)हे मेरी जाति वालो! नाप और तुला को न्याय के साथ भरो और लोगों की वस्तुओं में से कुछ कम न करो और अपनी बुराई द्वारा धरती में बिगाड़ न फैलाओ। (11:85)हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम लोगों को क्रय-विक्रय में डंडी मारने से रोकते थे और लेन देन में न्याय से काम लेने पर भी बल देते थे। वे कहते थे, डंडी मारना एक प्रकार से धरती में बुराई फैलाना है और डंडी मारने वाला वस्तुतः भ्रष्ट व्यक्ति होता है क्योंकि उसके कार्य के परिणाम, धरती में फैलते चले जाते हैं।मनुष्य द्वारा किए जाने वाले पाप मूल रूप से दो प्रकार के होते हैं। प्रथम ऐसे पाप जिनकी क्षति केवल पापी को होती है और अन्य लोगों पर उनका प्रभाव कम पड़ता है। दूसरे ऐसे पाप जो अन्य लोगों पर अत्याचार और उनके अधिकारों के हनन का कारण बनते हैं। इस प्रकार के पाप ईश्वर की दृष्टि में बहुत बड़े हैं। ईश्वर ने कहा है कि पहले प्रकार के पापों को मैं क्षमा कर सकता हूं किन्तु दूसरे प्रकार के पापों को उस समय तक क्षमा नहीं करूंगा जब तक प्रभावित व्यक्ति पापी को क्षमा करने पर तैयार नहीं होगा।इस आयत से हमने सीखा कि समाज की अर्थ व्यवस्था न्याय के आधार पर स्थापित होनी चाहिए और समाज के सभी सदस्यों के अधिकारों की पूर्ण रूप से रक्षा होनी चाहिए।भ्रष्ट अर्थ व्यवस्था, समाज को भ्रष्टता और पतन की ओर ले जाती है अतः समाज के नेता इस संबंध में उत्तरदायी हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 86 की तिलावत सुनते हैं।بَقِيَّةُ اللَّهِ خَيْرٌ لَكُمْ إِنْ كُنْتُمْ مُؤْمِنِينَ وَمَا أَنَا عَلَيْكُمْ بِحَفِيظٍ (86)यदि तुम ईमान वाले हो तो तुम्हारे लिए वही उत्तम है जो ईश्वर ने तुम्हारे लिए बचत की है। और मैं तुम्हारा रखवाला नहीं हूं। (11:86)हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम अपनी जाति के लोगों को डंडी मारने से रोकने और लेन देन में न्याय से काम लेने की सिफ़ारिश करते हुए कहते हैं कि लो लाभ वैध मार्ग से प्राप्त होता है वह ऐसी बचत है जो ईश्वर ने तुम्हारे लिए बचा कर रखी है और यदि तुम्हें उस पर ईमान हो तो तुम उसी को पर्याप्त समझोगे और अवैध आय का प्रयास नहीं करोगे। वे कहते हैं, मेरा दायित्व इस ईश्वरीय आदेश को तुम तक पहुंचाना है और मैं तुम्हारा रखवाला नहीं हूं कि यह देखूं कि तुम किस प्रकार काम करते हो और यदि हराम का माल खाने से तुम्हारा जीवन तबाह होता है तो मैं इसका उत्तरदायी नहीं हूं।यद्यपि आयत में बक़ीयतुल्लाह का शब्द, आर्थिक मामले से प्राप्त होने वाले वैध लाभ के लिए प्रयोग हुआ है किन्तु पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनानुसार हर उस शुभ अस्तित्व को बक़ीयतुल्लाह कहा जाता है जो ईश्वर के इरादे से मानवता के लिए बाक़ी हो। जिस प्रकार से कि संसार के अंतिम काल में प्रकट होने वाले और अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध आंदोलन चलाने वाले हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम को भी बक़ीयतुल्लाह कहा गया है क्योंकि ईश्वर ने उन्हें न्याय की स्थापना के लिए बचा कर रखा है।इस आयत से हमने सीखा कि कम किन्तु वैध व पवित्र आय अधिक किन्तु अवैध आय से उत्तम है।संसार शीघ्र ही समाप्त होने वाला तथा नश्वर है अतः हमें ऐसी वस्तु के विचार में रहना चाहिए जो ईश्वर के निकट बाक़ी रहे और प्रलय में हमारे काम आए।ऐसा व्यक्ति जो ईमान का दावा करता है किन्तु लेन देन में डंडी मारता है उसे अपने ईमान पर संदेह करना चाहिए।