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    सूरए हूद, आयतें 87-89, (कार्यक्रम 366)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या सत्तासी की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا شُعَيْبُ أَصَلَاتُكَ تَأْمُرُكَ أَنْ نَتْرُكَ مَا يَعْبُدُ آَبَاؤُنَا أَوْ أَنْ نَفْعَلَ فِي أَمْوَالِنَا مَا نَشَاءُ إِنَّكَ لَأَنْتَ الْحَلِيمُ الرَّشِيدُ (87)(मदयन के लोगों ने हज़रत शुऐब के उत्तर में) कहा। क्या तुम्हारी नमाज़ तुम्हें इस बात का आदेश देती है कि हम उनको छोड़ दें जिन्हें हमारे पूर्वज पूजा करते थे? या यह कि हम अपनी संपत्ति के साथ जो चाहें वह न कर सकें? तुम तो अत्यंत सहनशील और भले पुरुष हो। (तो हमसे इस प्रकार की अपेक्षा क्यों रखते हो?) (11:87)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम लोगों को आर्थिक मामलों में हलाल अर्थात वैध और हराम अर्थात अवैध बातों पर ध्यान देने और डंडी मारने का निमंत्रण देते और कहते थे कि ईश्वर ने लेन देन में तुम्हारे लिए जो वैध लाभ निर्धारित किया है वह उस धन से उत्तम है जो डंडी मारने से तुम्हें प्राप्त होता है।किन्तु मदयन के लोग न केवल यह कि अपने पैग़म्बर की बात सुनने के लिए तैयार नहीं होते बल्कि कहते थे कि हम तो आपको समझदार और भला आदमी समझते थे और हमें आपसे ऐसी विचित्र बातों की आशा नहीं थी। क्या आप हमें हमारी धन संपत्ति को ख़र्च करने से रोकना चाहते हैं या फिर यह चाहते हैं कि हम अपने पूर्वजों के रीति रिवाज छोड़ दें?रोचक बात यह है कि वे अपनी इन सब मांगों को हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की नमाज़ से संबंधित कर रहे थे और कहते थे कि क्या आपकी नमाज़ आपको ऐसा आदेश देती है? स्पष्ट है कि यदि नमाज़ वास्तविक हो तो मनुष्य को अनेकेश्वरवाद से भी रोकती है और उसके प्रतिदिन के जीवन में अवैध क्रय-विक्रय और हराम आय के मार्ग में भी बाधा बनती है।इस आयत से हमने सीखा कि नमाज़ और उपासना सभी ईश्वरीय धर्मों का भाग रही है और सभी ईश्वरीय धर्मों के अनुयाई नमाज़ के माध्यम से ईश्वर से संपर्क साधते थे।पूर्वजों के विचारों और आस्थाओं का अनुसरण, पैग़म्बरों के स्पष्ट तर्कों के विरुद्ध ठोस आधार नहीं बन सकता।स्वामित्व, संपत्ति में हर प्रकार के प्रयोग का तर्क नही है बल्कि अपनी संपत्ति का प्रयोग भी ईश्वरीय क़ानूनों के परिप्रेक्ष्य में होना चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 88 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ يَا قَوْمِ أَرَأَيْتُمْ إِنْ كُنْتُ عَلَى بَيِّنَةٍ مِنْ رَبِّي وَرَزَقَنِي مِنْهُ رِزْقًا حَسَنًا وَمَا أُرِيدُ أَنْ أُخَالِفَكُمْ إِلَى مَا أَنْهَاكُمْ عَنْهُ إِنْ أُرِيدُ إِلَّا الْإِصْلَاحَ مَا اسْتَطَعْتُ وَمَا تَوْفِيقِي إِلَّا بِاللَّهِ عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ (88)(हज़रत शुऐब ने) कहा। हे मेरी जाति वालो! यदि मेरे पास अपने पालनहार की ओर से स्पष्ट तर्क हो और उसने मुझे अच्छी रोज़ी प्रदान की हो (तो मैं किस प्रकार तुम्हारी इच्छाओं का पालन कर सकता हूं) और मैं नहीं चाहता कि जिस बात से तुम्हें रोकता हूं स्वयं ही उसे करने लगूं। मैं तो बस अपनी क्षमता भर (तुम्हारा) सुधार चाहता हूं और ईश्वर की कृपा के अतिरिक्त मेरी कोई क्षमता नहीं है, मैं उसी पर भरोसा किए हुए हूं और उसी की ओर मुझे पलटना है। (11:88)हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम इस आयत में अपनी जाति के लोगों की अनुचित बातों का उत्तर देते हुए कहते हैं कि यदि मैं तुम्हें, तुम्हारी संपत्ति को मनमाने ढंग से प्रयोग करने की अनुमति नहीं देता तो यह ईर्ष्या या मेरी संकीर्ण दृष्टि के कारण नहीं बल्कि स्वयं तुम्हारे जीवन और समाज के सुधार के लिए है।ईश्वर ने मुझे भेजा है ताकि मैं स्पष्ट तर्कों के माध्यम से तुम्हें उसके आदेशों के विरोध से रोकूं। मैंने अपने दायित्व के पालन और ईश्वर के संदेश को तुम तक पहुंचाने में उसी पर भरोसा किया है तथा उसी के मार्ग पर चल रहा हूं। चाहे तुम स्वीकार करो या इन्कार कर दो मैं कभी भी उस बात का समर्थन नहीं करूंगा जिससे ईश्वर ने रोका है।इस आयत से हमने सीखा कि सौभाग्यपूर्ण जीवन, हराम और वर्जित मार्ग से आने वाले धन से प्राप्त नहीं होता। हमें पवित्र रोज़ी के प्रयास में रहना चाहिए जिसे ईश्वर ने अपने बंदों के लिए निर्धारित किया है।पैग़म्बरों का लक्ष्य, मनुष्यों और मानव समाज का सुधार है और इस मार्ग में उन्होंने ईश्वर पर भरोसा करते हुए अपने समस्त प्रयास किए हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या नवासी की तिलावत सुनते हैं।وَيَا قَوْمِ لَا يَجْرِمَنَّكُمْ شِقَاقِي أَنْ يُصِيبَكُمْ مِثْلُ مَا أَصَابَ قَوْمَ نُوحٍ أَوْ قَوْمَ هُودٍ أَوْ قَوْمَ صَالِحٍ وَمَا قَوْمُ لُوطٍ مِنْكُمْ بِبَعِيدٍ (89)और (शुऐब ने कहा) हे मेरी जाति वालो! मुझ से शत्रुता तुम्हें ऐसी बात पर न उकसाए कि जिसके कारण नूह की जाति या हूद की जाति या सालेह की जाति का दंड का चुका है और लूत की जाति (का इतिहास) तो तुम से दूर भी नहीं है। (11:89)हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम अपनी जाति के लोगों को ईश्वरीय धर्म को स्वीकार करने हेतु अपने तर्कों को जारी रखते हुए उन्हें ईश्वरीय दंड से डराते हैं और कहते हैं कि तुम्हारा काल लूत की जाति के काल से अधिक दूर नहीं है। कम से कम इस जाति और इससे पहले वाली जातियों के इतिहास पर एक दृष्टि डालो और देखो कि अपने पैग़म्बरों के विरोध के कारण उनका क्या परिणाम हुआ।तुम लोग अतीत से क्यों नहीं सीखते और ऐसा काम क्यों करते हो जिससे तुम्हें इसी संसार में ईश्वर के दंड का सामना करना पड़े। यह मत सोचो कि मेरा विरोध तुम्हारे हित में है बल्कि मुझ से शत्रुता, ईश्वर से शत्रुता के समान है और स्वाभाविक है कि इसका अत्यंत कड़ा दंड होगा।इस आयत से हमने सीखा कि मानव समाज का इतिहास एक दूसरे से जुड़ा हुआ है और आपस में समानता रखता है अतः अतीत की जातियों के इतिहास का वर्णन, आगामी पीढ़ियों के लिए शिक्षा सामग्री सिद्ध हो सकता है।ईश्वर जब और जैसे चाहे किसी भी जाति को दंडित कर सकता है। उसने नूह की जाति को समुद्र में डुबाकर, हूद की जाति को समुद्री तूफ़ान में ग्रस्त करके, सालेह की जाति को आसमानी चिंघाड़ द्वारा और लूत की जाति को धरती में दबा कर दंडित किया है।