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    सूरए हूद, आयतें 9-12, (कार्यक्रम 348)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 9 और 10 की तिलावत सुनते हैं।وَلَئِنْ أَذَقْنَا الْإِنْسَانَ مِنَّا رَحْمَةً ثُمَّ نَزَعْنَاهَا مِنْهُ إِنَّهُ لَيَئُوسٌ كَفُورٌ (9) وَلَئِنْ أَذَقْنَاهُ نَعْمَاءَ بَعْدَ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ ذَهَبَ السَّيِّئَاتُ عَنِّي إِنَّهُ لَفَرِحٌ فَخُورٌ (10)और यदि हम मनुष्य को अपनी ओर से दया का स्वाद चखाते हैं और फिर उसे उससे छीन लेते हैं तो वह निराश और अकृतज्ञ हो जाता है। (11:9) और यदि हम इसके पश्चात कि उसे पीड़ा पहुँची हो, उसे अनुकंपा का स्वाद चखाते हैं तो वह कहने लगता है, मेरे तो सारे दुख दूर हो गए। निश्चित रूप से वह प्रसन्न होकर अकड़ने लगता है। (11:10) ये आयतें मनुष्य की एक आत्मिक व मानसिक विशेषता की ओर संकेत करती हैं कि अनुकंपा हाथ से चले जाने पर वह निराश हो जाता है और अनुकंपा मिलने पर अहंकार व घमंड में ग्रस्त हो जाता है, जबकि न तो हर अनुकंपा ईश्वर के प्रेम का चिन्ह है और न ही हर समस्या ईश्वर के कोप की निशानी है। संभव है कि यह दोनों ईश्वरीय परीक्षा का साधन हों ताकि मनुष्य को विभिन्न परिस्थितियों में परखा जा सके।इसके अतिरिक्त ये आयतें संसार की इस विशेषता का उल्लेख करती हैं कि वह सदा से एक समान नहीं था और न ही भविष्य में ऐसा होगा। न तो सांसारिक अनुकंपाएं अनंतकालीन हैं और न ही सांसारिक कठिनाइयां स्थिर और अमर होती हैं बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम तथा उनके परिजनों के कथनों में आया है कि संसार के दो रूप हैं, कभी वह तुम्हारे हित में होता है और कभी तुम्हारे विरुद्ध, तो जब वह तुम्हारे हित में हो तो घमंड न करो और जब वह तुम्हारे विरुद्ध हो तो धैर्य व संयम से काम लो कि दोनों परिस्थितियों में तुम्हारी परीक्षा होती है।इन आयतों से हमने सीखा कि मनुष्य की क्षमता बहुत ही कम होती है, एक अनुकंपा छिन जाने से वह ईश्वर की असीम दया की ओर से निराश हो जाता है।ईश्वरीय अनुकंपाएं हमारा अधिकार नहीं बल्कि उसकी दया व कृपा है अतः हर स्थिति में हमें उसके प्रति कृतज्ञ रहना चाहिए।आनंद और कठिनाइयां अस्थिर हैं, हमें अमर व स्थिर संसार के विचार में रहना चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 11 की तिलावत सुनते हैं।إِلَّا الَّذِينَ صَبَرُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ أُولَئِكَ لَهُمْ مَغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ كَبِيرٌ (11)सिवाय उन लोगों के जिन्होंने संयम से काम लिया और भले कर्म करते रहे, ऐसे ही लोगों के लिए (ईश्वर के निकट) क्षमा और बड़ा बदला है। (11:11)निराशा और घमंड की भावना के मुक़ाबले में केवल संयम से काम लेने वालों को ही वास्तविक कल्याण प्राप्त होता है। अलबत्ता ऐसा संयम जो ईश्वर पर ईमान के साथ हो अन्यथा ये संयम, पीड़ा और कठिनाई के अतिरिक्त कुछ नहीं है।क़ुरआने मजीद की उन सभी आयतों में जहां भले कर्म का उल्लेख हुआ है वहां ईमान का भी उल्लेख हुआ है और “आमनू व अमेलुस्सालेहाते” का वाक्य दोहराया गया है किन्तु केवल इस आयत में संयम और भले कर्म को एक साथ रखा गया है कि जो संयम तक पहुंचने में ईमान की भूमिका को स्पष्ट करता है।अलबत्ता ईमान से प्रवाहित होने वाला संयम केवल कठिनाइयों और पीड़ाओं पर नहीं होता बल्कि प्रसन्नता और आनंद के समय भी संयम से काम लेना चाहिए अन्यथा इसका परिणाम उद्दंडता के रूप में निकलता है।इस आयत से हमने सीखा कि ईमान वाला व्यक्ति प्रत्येक दशा में भले कर्म करता है। चाहे व कड़ाई और कठिनाई में रहे या संपन्नता और ऐश्वर्य में।वह संयम जो ईमान के आधार पर हो मीठा व मधुर होता है क्योंकि उसके परिणाम स्वरूप महान ईश्वरीय पारितोषिक प्राप्त होता है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या बारह की तिलावत सुनते हैं।فَلَعَلَّكَ تَارِكٌ بَعْضَ مَا يُوحَى إِلَيْكَ وَضَائِقٌ بِهِ صَدْرُكَ أَنْ يَقُولُوا لَوْلَا أُنْزِلَ عَلَيْهِ كَنْزٌ أَوْ جَاءَ مَعَهُ مَلَكٌ إِنَّمَا أَنْتَ نَذِيرٌ وَاللَّهُ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ وَكِيلٌ (12)(हे पैग़म्बर!) शायद ( लोगों के स्वीकार न करने के कारण) जो कुछ हमने आपके पास अपने विशेष संदेश वहि द्वारा भेजा है उसके कुछ भागों को आप छोड़ने वाले हों और शायद उनके कहने पर कि क्यों इन पर कोई ख़ज़ाना नहीं उतरा या इनके साथ कोई फ़रिश्ता क्यों नहीं आया? आपका हृदय दुखी हो जाए ( किन्तु ऐसा न हो क्योंकि) आप तो केवल सचेत करने वाले हैं। (11:12)पिछली आयतों में मनुष्य की कम क्षमता के उल्लेख के पश्चात यह आयत कहती है कि यदि पैग़म्बर पर भी ईश्वर की विशेष कृपा न होती और ईश्वर ने उन्हें अत्यधिक संयम न दिया होता तो वे भी इतने अधिक अपमान और आरोपों को सहन नहीं कर सकते थे और यह सोच कर कि ये ईश्वरीय वास्तविकताओं और शिक्षाओं की प्राप्ति के योग्य नहीं है अतः अभी इन तक वहि या ईश्वरीय संदेश का यह भाग न पहुंचाया जाए, शायद उन लोगों तक ईश्वरीय संदेश न पहुंचाते।ईश्वर कहता है कि प्रथम तो यह कि इस प्रकार की बातों से अपना हृदय छोटा न करें क्योंकि ईश्वर देखने वाला है और वह उचित उत्तर देता है और दूसरे यह कि आपका दायित्व केवल संदेश पहुंचाना और ईश्वरीय कोप से डराना है और उनके स्वीकार करने या न करने का दायित्व आप पर नहीं है। आप ईश्वर का संदेश उन तक पहुंचा दें अब वे चाहें तो स्वीकार करें और चाहें तो न करें।वस्तुतः यह आयत पैग़म्बर को संबोधित करते हुए कहती है कि ईश्वरीय संदेश को तुरंत लोगों तक पहुंचाना चाहिए और किसी भी कारणवश इस कार्य में विलंब नहीं किया जा सकता। हठधर्मी लोगों के स्वीकार न करने या विरोधियों की निराधार बातों के कारण ईश्वरीय संदेश को विलंबित नहीं करना चाहिए।इस आयत से हमने सीखा कि धर्म के प्रचारक को ईश्वरीय संदेश पहुंचाने के संबंध में दृढ़ संकल्पित होना चाहिए तथा उसे लोगों की बातों और आलोचनाओं पर ध्यान नहीं देना चाहिए।हम में से प्रत्येक अपने कर्तव्यों के पालन का उत्तरदायी है न कि उनके परिणामों का। हमें अपने दायित्वों का निर्वाह करना चाहिए और अन्य मामलों को ईश्वर के हवाले कर देना चाहिए।पैग़म्बरों का दायित्व लोगों को ईश्वरीय कोप से डराना और उन तक ईश्वरीय संदेश पहुंचाना था न कि उन्हें ईमान लाने और अपनी बात स्वीकार करने पर विवश करना।