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    सूरए हूद, आयतें 90-95, (कार्यक्रम 367)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या नब्बे की तिलावत सुनते हैं।وَاسْتَغْفِرُوا رَبَّكُمْ ثُمَّ تُوبُوا إِلَيْهِ إِنَّ رَبِّي رَحِيمٌ وَدُودٌ (90)और (हज़रत शुऐब ने अपनी जाति के लोगों से) कहा। अपने पालनहार से क्षमा चाहो और उसकी ओर लौट आओ कि निसंदेह मेरा पालनहार अत्यंत दयावान और (तौबा करने वालों से) प्रेम करने वाला है। (11:90)पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि मदयन नगर के लोगों ने हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम के निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया और उनसे शत्रुता पर उतर आए किन्तु हज़रत शुऐब ने उनके प्रति, करुणा व शुभ चिंतन का प्रदर्शन करते हुए उन्हें नसीहत की कि यदि तुम सचेत न रहो तो ईश्वरीय दंड में ग्रस्त हो जाओगे।यह आयत हज़रत शुऐब की बातों को आगे बढ़ाते हुए उनकी जाति के लोगों को तौबा व प्रायश्चित का निमंत्रण देती है और ईश्वर को दयावान तथा तौबा स्वीकार करने वाला बताते हुए कहती है कि तौबा एक ऐसा मार्ग है जिसे ईश्वर ने अपने बंदों की वापसी के लिए खुला छोड़ा है और यह उसकी असीम दया का चिन्ह है।इस आयत से हमने सीखा कि पापियों को चेतावनी देने के साथ ही उनके सुधार और वापसी का मार्ग भी उन्हें दिखाना चाहिए।ईश्वर न केवल यह कि तौबा स्वीकार करता है बल्कि तौबा स्वीकार करने वालों से प्रेम भी करता है।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 91 की तिलावत सुनते हैं।قَالُوا يَا شُعَيْبُ مَا نَفْقَهُ كَثِيرًا مِمَّا تَقُولُ وَإِنَّا لَنَرَاكَ فِينَا ضَعِيفًا وَلَوْلَا رَهْطُكَ لَرَجَمْنَاكَ وَمَا أَنْتَ عَلَيْنَا بِعَزِيزٍ (91)काफ़िरों ने कहा! हे शुऐब! जो कुछ तुम कह रहे हो उसमें से अधिकांश को हम नहीं समझते और हम तुम्हें अपने बीच एक कमज़ोर व्यक्ति समझते हैं। और यदि तुम्हारे परिजन न होते तो हम तुम्हें पत्थर मार मार कर हताहत कर देते और तुम्हें हम पर कोई श्रेष्ठता और प्रभुत्व प्राप्त नहीं है। (11:91)हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की ओर से अपनी जाति के लोगों के प्रति इतना अधिक प्रेम और शुभ चिंतन दर्शाए जाने के बावजूद, हठधर्मी करने वाले काफ़िरों की उद्दंडता में वृद्धि ही होती गई और उन लोगों ने हज़रत शुऐब को मौत की धमकी देना आरंभ कर दिया।इसके अतिरिक्त उन्होंने हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम पर आरोप लगाया कि उनकी बातें समझने योग्य नहीं हैं जबकि ईश्वरीय पैग़म्बरों की एक विशेषता यह है कि वे बड़े स्पष्ट शब्दों में बातें करते हैं और अपने निमंत्रण के लिए स्पष्ट तर्क और चमत्कार प्रस्तुत करते हैं। काफ़िरों ने हज़रत शुऐब का अपमान किया और उन्हें अक्षम दर्शाने का प्रयास किया यहां तक कि उनके परिवार के लोगों को भी कोई महत्त्व नहीं दिया।इस आयत से हमने सीखा कि लोगों के मार्गदर्शन की राह में पैग़म्बरों को अत्यधिक अपमान और कटाक्ष सहन करने पड़े हैं।पैग़म्बरों के विरोधियों के पास तर्क नहीं होता बल्कि उनका तर्क अपमान, यातना और जनसंहार पर आधारित होता है।आइये अब सूरए हूद की आयत नंबर 92 और 93 की तिलावत सुनते हैं।قَالَ يَا قَوْمِ أَرَهْطِي أَعَزُّ عَلَيْكُمْ مِنَ اللَّهِ وَاتَّخَذْتُمُوهُ وَرَاءَكُمْ ظِهْرِيًّا إِنَّ رَبِّي بِمَا تَعْمَلُونَ مُحِيطٌ (92) وَيَا قَوْمِ اعْمَلُوا عَلَى مَكَانَتِكُمْ إِنِّي عَامِلٌ سَوْفَ تَعْلَمُونَ مَنْ يَأْتِيهِ عَذَابٌ يُخْزِيهِ وَمَنْ هُوَ كَاذِبٌ وَارْتَقِبُوا إِنِّي مَعَكُمْ رَقِيبٌ (93)हज़रत शुऐब ने कहा। हे मेरी जाति वालो! क्या मेरा क़बीला तुम्हारी दृष्टि में ईश्वर से भी अधिक प्रिय है कि तुमने उसके आदेश की अवहेलना की है? निसंदेह जो कुछ तुम करते हो और उससे मेरा पालनहार अवगत है। (11:92) हे मेरी जाति वालो! जो कुछ तुम कर सकते हो करो और मैं भी अपना काम करता रहूंगा। शीघ्र ही तुम्हें पता चल जाएगा कि अपमानित करने वाला दंड किसके लिए आता है और कौन झूठा है। और तुम प्रतीक्षा करो मैं भी तुम्हारे साथ प्रतीक्षा करने वाला हूं। (11:93)जब काफ़िरों और विरोधियों ने अपनी अंतिम बात कह दी और हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम उनके मार्गदर्शन की ओर से निराश हो गए तो उन्होंने उन्हें संबोधित करते हुए कहा कि अब तुम जो चाहते हो करो मैं भी अपने मार्ग पर चलूंगा और शीघ्र की यह बात स्पष्ट हो जाएगी कि हममें से किसे सफलता और मोक्ष प्राप्त हुआ है और यह मत सोचो कि मैं अपनी जाति और परिवार से बहुत अधिक जुड़ा हुआ हूं कि मैं अपनी जाति और परिवार से बहुत अधिक जुड़ा हुआ हूं कि तुम यह कहो कि हम उनके कारण तुम्हें छोड़ रहे हैं अन्यथा तुम्हारी हत्या कर देते। मैंने अपने पालनहार पर भरोसा किया है और मुझे उसी से अपनी मुक्ति की आशा है। यह तुम हो जो मेरे परिवार को ईश्वर से अधिक महत्त्व देते हो जबकि तुम्हें ज्ञान नहीं है कि ईश्वर तुम्हारी हर बात से अवगत है।इन आयतों से हमने सीखा कि जिस स्थान पर नसीहत और उपदेश प्रभावी नहीं होता वहां कार्य के परिणाम के संबंध में चेतावनी देना आवश्यक है।यदि हम अन्य लोगों के मार्गदर्शन की ओर से निराश हो जाएं तब भी हमें अपने मार्ग को नहीं छोड़ना चाहिए और उस पर डटे रहना चाहिए।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 94 और 95 की तिलावत सुनते हैं।وَلَمَّا جَاءَ أَمْرُنَا نَجَّيْنَا شُعَيْبًا وَالَّذِينَ آَمَنُوا مَعَهُ بِرَحْمَةٍ مِنَّا وَأَخَذَتِ الَّذِينَ ظَلَمُوا الصَّيْحَةُ فَأَصْبَحُوا فِي دِيَارِهِمْ جَاثِمِينَ (94) كَأَنْ لَمْ يَغْنَوْا فِيهَا أَلَا بُعْدًا لِمَدْيَنَ كَمَا بَعِدَتْ ثَمُودُ (95)और जब हमारा आदेश आ गया तो हमने शुऐब और उन पर ईमान लाने वालों को अपनी दया के माध्यम से मुक्ति दे दी और फिर एक भयंकर (आसमानी) चीख़ ने अत्याचारियों को आ लिया तो वे अपने घरों में औंधे मुंह पड़े रह गए। (11:94) वे इस प्रकार तबाह हुए कि मानो कभी थे ही नहीं। मदयन (ईश्वर की दया से दूर हो जाए) जिस प्रकार समूद जाति हो गई। (11:95)मदयन की अत्याचारी व उद्दंड जाति का भी वही परिणाम हुआ जो पिछली काफ़िर जातियों का हुआ था और वे इस संसार में तबाह हो गई थीं। धरती पर रहने वाले सभी लोग प्राकृतिक रूप से, या दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं किन्तु ईश्वरीय दया से दूरी के साथ मृत्यु केवल उन्हीं लोगों को मिलती है जो सत्य को स्वीकार करने और ईश्वर की अनंत दया को प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं होते अन्यथा ईश्वर की दया अत्यंत व्यापक और असीम है।इसी प्रकार उसका कोप भी अत्यंत शक्तिशाली और व्यापक होता है कि जब वह किसी क्षेत्र पर आता है तो उसे इस प्रकार तबाह कर देता है कि मानो वहां पर कोई रहता ही नहीं था। ईश्वरीय कोप आने के बाद किसी के लिए भी उससे फ़रार होने और मुक्ति प्राप्त करने का कोई मार्ग नहीं होता।इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वरीय कोप और दंड में विलंब हो सकता है किन्तु वह आता अवश्य है।ईमान, मुक्ति का और कुफ़्र तबाही का कारण है।अत्याचारियों से दूरी और उनसे विरक्तता ईश्वरीय व क़ुरआनी चरित्र है।