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    सूरए हूद, आयतें 96-101, (कार्यक्रम 368)

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    आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 96 और 97 की तिलावत सुनते हैं।وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَى بِآَيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُبِينٍ (96) إِلَى فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ فَاتَّبَعُوا أَمْرَ فِرْعَوْنَ وَمَا أَمْرُ فِرْعَوْنَ بِرَشِيدٍ (97)और हमने मूसा को भेजा अपनी आयतों और स्पष्ट तर्क के साथ(11:96) फ़िरऔन और उसके सरदारों की ओर किन्तु उन्होंने फ़िरऔन के आदेश का पालन किया जबकि फ़िरऔन का आदेश बुद्धि के अनुकूल नहीं था। (11:97)पिछली आयतों में समूद जाति की घटनाओं का वर्णन समाप्त होने के बाद इन आयतों में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और फ़िरऔन की घटनाओं का वर्णन किया गया है। ये आयतें कहती हैं कि पिछली जातियों के विपरीत, कि जहां प्रायः पैग़म्बरों को लोगों की ओर भेजा जाता था, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को आरंभ में फ़िरऔन और उसके सरदारों को ईश्वरीय निमंत्रण देने के लिए भेजा गया और उसके बाद उन्होंने बनी इस्राईल जाति का मार्गदर्शन आरंभ किया।स्वाभाविक है कि जब तक बनी इस्राईल के लोग फ़िरऔन के निमंत्रण में रहते तब तक उनके मार्गदर्शन और सुधार की संभावना नहीं होती। अलबत्ता फ़िरऔन के वर्चस्व में उसके सरदारों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी, इसी कारण फ़िरऔन के साथ उसके सरदार भी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के विशेष ध्यान का पात्र बने किन्तु उनमें से किसी ने भी उनके निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया।इन आयतों से हमने सीखा कि दासता से लोगों को स्वतंत्र कराने के लिए अत्याचार से संघर्ष पैग़म्बरों के कार्यक्रमों का महत्त्वपूर्ण भाग है।वर्चस्ववादी शासकों की ओर से दिए जाने वाले आदेश और क़ानून, मानव समाजों के उत्थान और प्रगति के कारण नहीं हैं केवल ईश्वरीय क़ानून मनुष्य को प्रगति और परिपूर्णता तक पहुंचाते हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 98 की तिलावत सुनते हैं।يَقْدُمُ قَوْمَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فَأَوْرَدَهُمُ النَّارَ وَبِئْسَ الْوِرْدُ الْمَوْرُودُ (98)प्रलय के दिन फ़िरऔन अपनी जाति के आगे आगे चलेगा और उन्हें नरक में ले जाएगा और क्या ही बुरा ठिकाना होगा जहां वे ले जाए जाएंगे। (11:98)फ़िरऔन जैसे शासकों के आदेश न केवल यह कि समाज की प्रगति व उत्थान का कारण नहीं बनते बल्कि प्रलय में मनुष्य को नरक में भी ले जाते हैं। जिन लोगों ने इस संसार में फ़िरऔन और उस जैसे लोगों के आदेशों का अनुसरण किया वह प्रलय में भी अपने इन्हीं नेताओं के पीछे पीछे नरक में जाएगें और उनके पास भागने का कोई मार्ग नहीं होगा।इस आयत से हमने सीखा कि प्रलय, संसार का प्रतिबिंबन है। संसार में हम जिस विचार और विचारधारा का अनुसरण करेंगे, प्रलय में उसी विचार के नेताओं के साथ हमें भेजा जाएगा।अच्छे कार्यक्रम और विकसित कार्य, मनुष्य को प्रलय में ईश्वरीय दया के स्वर्ग में पहुंचाते हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 99 और 100 की तिलावत सुनते हैं।وَأُتْبِعُوا فِي هَذِهِ لَعْنَةً وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ بِئْسَ الرِّفْدُ الْمَرْفُودُ (99) ذَلِكَ مِنْ أَنْبَاءِ الْقُرَى نَقُصُّهُ عَلَيْكَ مِنْهَا قَائِمٌ وَحَصِيدٌ (100)और इस संसार में उनके साथ धिक्कार लगी हुई है और प्रलय में भी ऐसा ही होगा और कितना बुरा पारितोषिक है जो इन्हें प्रदान किया जाएगा। (11:99) (हे पैग़म्बर!) ये कुछ बस्तियों के वृत्तांत हैं जिनका हम आपसे उल्लेख करते हैं। उनमें से कुछ तो बाक़ी हैं और अन्य कुछ नष्ट हो चुकी हैं। (11:100)फ़िरऔन और उसकी सेना का अंत, नील नदी में डूबने के रूप में हुआ कि जो ईश्वरीय कोप और धिक्कार का चिन्ह था जबकि प्रलय में उन्हें मिलने वाला दंड अपने स्थान पर बाक़ी है और जो कोई उनके मार्ग पर चलेगा उसे धिक्कार और अपमान के अतिरिक्त कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।क़ुरआने मजीद में पिछली जातियों के अंत का वर्णन, भावी पीढ़ियों द्वारा उससे पाठ सीखने के लिए है न कि यह कि क़ुरआन इतिहास या काल्पनिक कहानियों की कोई पुस्तक है, अतः आगे चलकर आयतें कहती हैं कि पिछली जातियों के बचे हुए अवशेष स्पष्ट रूप से यह दर्शाते हैं कि उनका अंत किस प्रकार हुआ था।इन आयतों से हमने सीखा कि क़ुरआने मजीद की पिछली जातियों के इतिहास और उनके अंत को जानने के लिए एक विश्वसनीय पुस्तक है।घटनाओं के वर्णन से पढ़ने या सुनने वाले पर काफ़ी प्रभाव पड़ता है अतः हमें दूसरों को उपदेश देते समय क़ुरआन की घटनाओं से लाभ उठाना चाहिए कि जो सब की सब वास्तविक हैं।आइये अब सूरए हूद की आयत संख्या 101 की तिलावत सुनते हैं।وَمَا ظَلَمْنَاهُمْ وَلَكِنْ ظَلَمُوا أَنْفُسَهُمْ فَمَا أَغْنَتْ عَنْهُمْ آَلِهَتُهُمُ الَّتِي يَدْعُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مِنْ شَيْءٍ لَمَّا جَاءَ أَمْرُ رَبِّكَ وَمَا زَادُوهُمْ غَيْرَ تَتْبِيبٍ (101)हमने उन पर अत्याचार नहीं किया बल्कि उन्होंने स्वयं अपने अपने आप पर अत्याचार किया, और जब तुम्हारे पालनहार का आदेश आ गया तो उनके वे देवी देवता उनके कुछ काम न आए जिन्हें वे ईश्वर को छोड़कर पुकारा करते थे और उन्होंने उनके लिए विनाश के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की वृद्धि नहीं की। (11:101)क़ुरआने मजीद की आयतों के अनुसार, कुछ जातियों के विनाश का कारण बनने वाली प्राकृतिक आपदाएं जैसे बाढ़, भूकंप और वज्रपात, ईश्वरीय कोप और दंड का चिन्ह हैं कि जो प्राकृतिक कारकों से सामने आती हैं अतः लोगों के एक गुट की मृत्यु का कारण बनने वाली घटनाएं या तो ईश्वरीय कोप हैं या फिर लोगों की परीक्षा का साधन हैं कि वे कठिनाइयों और कड़ाई के समय क्या करते हैं।जो बात महत्त्वपूर्ण है वह यह है कि मनुष्य को जान लेना चाहिए कि ईश्वर किसी पर अत्याचार नहीं करता बल्कि यह स्वयं मनुष्य है जो पापों और बुराइयों द्वारा अपने आप पर और समाज पर अत्याचार करता है और ईश्वरीय दंड आने का मार्ग प्रशस्त करता है।इस आयत से हमने सीखा कि मनुष्य का अंत हर बात से अधिक उसके कर्मों और व्यवहार से जुड़ा हुआ है।ईश्वर के इरादे के सामने कोई भी नहीं टिक सकता।