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    सृष्टि ईश्वर और धर्म़-19 ईश्वर के तुलनात्मक गुण

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    इससे पहले की चर्चाओं में हम यह बता चुके हैं कि ईश्वर के गुण दो प्रकार के होते हैं एक व्यक्तिगत और दूसरे तुलनात्मक। व्यक्तिगत गुणों पर चर्चा हो चुकी और अब बारी है तुलनात्मक गुणों की। तुलनात्मक गुण, उन गुणों को कहते हैं जो ईश्वर और मनुष्य के मध्य एक विशेष प्रकार के संपर्क को ध्यान में रखकर ईश्वर से विशेष किये जाएं उदाहरणस्वरुप सृष्टिकर्ता। हम ईश्वर को सृष्टिकर्ता कहते हैं। यह ईश्वर का एक गुण है किंतु यह गुण उसी समय ईश्वर के लिए सिद्ध होगा जब हम सृष्टि और सृष्टिकर्ता के मध्य संबंध पर ध्यान दें। इस संबंध पर ध्यान देने से ही सृष्टिकर्ता का अर्थ समझ में आता है और यदि सृष्टि न होती तो सृष्टिकर्ता का अर्थ समझना संभव न होता। ईश्वर और उसकी सृष्टि के मध्य कई प्रकार के संबंध हैं और ईश्वर और सृष्टि के मध्य संबंधों की कोई सीमा नहीं है किंतु एक आयाम और एक दृष्टि से ईश्वर और उसकी सृष्टि के मध्य संबंधों को दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले प्रकार में ईश्वर और मनुष्य के मध्य सीधा संबंध होता है जैसे बनाना और पैदा करना आदि। यह ऐसे संबंध हैं जो मनुष्य और ईष्वर के मध्य सीधे रूप से बनते हैं। ईश्वर और मनुष्य के मध्य कुछ ऐसे संबंध भी हैं जिनकी कल्पना करने के लिए कुछ अन्य वस्तुओं की कल्पना भी आवश्यक होती है तब जाकर ईश्वर और मनुष्य के मध्य उस संबंध की कल्पना की जा सकती और उसके परिणाम में ईश्वर के किसी तुलनात्मक गुण की कल्पना की सकती है। उदाहरण स्वरूप ईश्वर का एक गुण क्षमाशीलता भी है किंतु इस गुण का मनुष्य से सीधा संबंध नहीं हैं। बल्कि ईश्वर के इस गुण की सही कल्पना करने के लिए हमें कई अन्य वस्तुओं की भी कल्पना करनी होगी। ईश्वर पापों का क्षमा करने वाला है। उसके इस गुण में और मनुष्य में क्या संबंध है, इसकी कल्पना के लिए हमें कई बातों का ज्ञान होना चाहिए जैसे हमें यह स्वीकार करना होगा कि ईश्वर ने कुछ नियम बनाए हैं जिन का पालन करने वालों को फल देने और पालन न करने वालों को दंड देने में वह सक्षम है। इसके साथ यह भी मानना होगा कि नियम वह बनाता है किंतु उल्लंघन मनुष्य की ओर से होता है। जब यह सारी बातें ध्यान में रखी जाएंगी तब जाकर ईश्वर की क्षमाशीलता और मनुष्य के मध्य संबंध को समझा जा सकेगा। इस चर्चा का यह निष्कर्ष निकला कि ईश्वर के तुलनात्मक गुणों को समझने के लिए ईश्वर और उसके दासों के मध्य संबंध को देखना चाहिए और पैदा करने वाले और पैदा होने वाले के मध्य जो संबंध है उसके प्रकार को भी समझना चाहिए। अर्थात यह समझना चाहिए कि ईश्वर जो पैदा करने वाला है और मनुष्य जो पैदा होने वाला है उसके और ईश्वर के मध्य जो संबंध है वह किस प्रकार है। अर्थात संबंध की ऐसी डोर की कल्पना आवश्यक है जिसका एक सिरा ईश्वर से और दूसरा मनुष्य से जुड़ा हो और यदि इस बात पर ध्यान नहीं रखा जाएगा तो फिर ईश्वर के तुलनात्मक गुणों को सही अर्थों में समझना संभव नहीं होगा। ईश्वर के व्यक्तिगत और तुलनात्मक गुणों में यही सब से बड़ा अंतर है।यहां पर एक अन्य विषय का भी उल्लेख आवश्यक है कि जब हम ईश्वर और उसके बन्दों के बीच संपर्क की कल्पना करते हैं तो वास्तव में इस संपर्क व संबंध की डोर की एक छोर पर ईश्वर होता है और दूसरे पर मनुष्य और इसके परिणाम में ईश्वर के तुलनात्मक गुण की कल्पना होती है किंतु चूंकि इस संबंध की डोर का एक छोर मनुष्य जैसे भौतिक प्राणी से जुड़ा होता है इस लिए उस छोर के लिए समय व काल जैसी भौतिक सीमाएं भी कल्पनीय होती हैं किंतु जो दूसरा छोर होता है अर्थात कल्पना में जो छोर ईश्वर से जुड़ा होता है उसके लिए किसी भी प्रकार की सीमा व शर्त की कल्पना नहीं की जा सकती।उदाहरण स्वरूप ईश्वर का एक तुलनात्मक गुण अजीविका प्रदान करना है। किसी को रोज़ी व अजीविका देने के लिए एक निर्धारित समय व सीमा व स्थान आवश्यक है किंतु यदि देखा जाए तो यह सीमा व शर्त व आवश्यकता , अजीविका देने वाले के लिए नहीं है बल्कि अजीविका लेने वाले अर्थात मनुष्य के लिए है। ईश्वर के लिए अजीविका देने वाले के रूप में किसी भी प्रकार की सीमा व शर्त नहीं है।

    इस चर्चा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं,

    तुलनात्मक गुण, उन गुणों को कहते हैं जो ईश्वर और मनुष्य के मध्य एक विशेष प्रकार के संपर्क को ध्यान में रखकर ईश्वर से विशेष किये जाएं।

    ईश्वर के तुलनात्मक गुणों को समझने के लिए ईश्वर और उसके दासों के मध्य संपर्क की कल्पना की जानी चाहिए।

    जब हम ईश्वर और उसके बन्दों के बीच संपर्क की कल्पना करते हैं तो वास्तव में इस संपर्क व संबंध की डोर की एक छोर पर ईश्वर होता है और दूसरे पर मनुष्य और इसके परिणाम में ईश्वर के तुलनात्मक गुण की कल्पना होती है। ईश्वर से जुड़े छोर के लिए कोई सीमा नहीं किंतु मनुष्य से जुड़े छोर के लिए सीमा व स्थान आदि की कल्पना की जा सकती है।