islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. सृष्टि ईश्वर और धर्म 33- मनुष्य और उसके कर्म

    सृष्टि ईश्वर और धर्म 33- मनुष्य और उसके कर्म

    Rate this post

    सब से पहले तो हमें यह समझना होगा कि भाग्य क्या है? वास्तव में भाग्य किसी घटना के लिए ईश्वर द्वारा निर्धारित चरणों और उसके परिणाम को कहा जाता है। ईश्वर द्वारा निर्धारित भाग्य के कई प्रकार हैं किंतु यहां पर हम अत्यधिक जटिल चर्चा से बचते हुए केवल व्यवहारिक भाग्य के बारे में बात करेंगे जिसका प्रभाव स्पष्ट रूप से मनुष्य पर पड़ता और जिसका वह आभास करता है किंतु प्रश्न यह है कि व्यवहारिक भाग्य है क्या?

    ईश्वर द्वारा भाग्य के निर्धारण का अर्थ यह है कि हम विभिन्न प्रक्रियाओं और घटनाओं को उसके सभी चरणों के साथ अर्थात आरंभ से अंत तक ईश्वर के तत्व ज्ञान व सूझबूझ के अंतर्गत समझें। अर्थात यह विश्वास रखें कि जो कुछ हो रहा है वह ईश्वर का इरादा है और ईश्वर ने चाहा है कि ऐसा हो इसलिए यह हो रहा है।

    बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए हम कह सकते हैं कि जैसाकि हर वस्तु की उपस्थिति, ईश्वर की अनुमति और इच्छा पर निर्भर होती है और उसकी अनुमति के बिना किसी भी वस्तु का अस्तित्व संभव ही नहीं है उसी प्रकार हर वस्तु की उत्पत्ति को भी ईश्वर द्वारा निर्धारित भाग्य और सीमा व मात्रा से संबंधित समझना चाहिए क्योंकि ईश्वर की इच्छा के बिना कोई भी वस्तु अपने विशेष रूप व आकार तथा मात्रा तक नहीं पहुंच सकती और न ही अपने अंत तक पहुंच सकती है किंतु प्रश्न यह है कि यदि ऐसा है तो फिर कामों पर मनुष्य के अधिकार का क्या अर्थ है?

    भाग्य निर्धारित होने की चर्चा इतनी ही जटिल है कि बहुत से विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी इस चर्चा के कारण अपनी राह से भटक गये। वास्तव में इस विषय को समझना बहुत कठिन है कि हर प्रक्रिया ईश्वर से संबंधित है और उसके सभी चरणों का ईश्वर ने निर्धारित किया है जिसे भाग्य कहा जाता है किंतु इसके साथ ही मनुष्य अपने कामों में स्वतंत्र भी है और उसका अपने कामों पर अधिकार भी है।

    बहुत से लोग जो यह मानते थे कि भाग्य ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है और हर काम व प्रक्रिया उससे संबंधित होती है, मनुष्य को अपने कामों में कठपुतली और विवश समझने लगे किंतु कुछ अन्य बुद्धिजीवी जिन्हें मनुष्य को विवश समझने से पाप व पुण्य तथा प्रतिफल की व्यवस्था की ख़राबी का ध्यान था, मनुष्य को पूर्ण रूप से स्वतंत्र और ईश्वरीय इरादे को मनुष्य के कामों से पूर्ण रूप से अलग समझने लगे किंतु हमारा यह कहना है कि मनुष्य के काम और अंजाम का निर्धारण एक सीमा तक ईश्वर द्वारा निर्धारित भाग्य से और किसी सीमा तक मनुष्य के अपने कामों द्वारा होता है किंतु इसके लिए हमें एक परिणाम के बहुकारक के नियम को समझना होगा। अर्थात यह मानना होगा कि कोई परिणाम या काम संभव है कई कारकों द्वारा इस प्रकार से हुआ हो कि हर कारक की अपनी भूमिका हो।

    एक प्रक्रिया के कई कारक की कल्पना की कई दशाएं हो सकती हैं। जैसे कई कारक ऐसे हों जिनका प्रभाव एक साथ प्रक्रिया पर पड़ता है। जैसे बीज को पौधा बनाने के लिए उसे एक साथ ही बीज, पानी और तापमान की आवश्यकता हीती है और यह सारे कारक एक साथ उस पर अपना प्रभाव डालते हैं।

    बहुकारक वाली प्रक्रिया की एक दशा यह है कि कई कारक एक के बाद एक अपना प्रभाव डालें जैसे एक के बाद एक इंजन चलाने से अंत में हवाई जहाज़ उड़ने लगता है।बहुकारकों वाली प्रक्रिया के कई कारकों की एक दशा यह होती है कि कारक का प्रभाव अपने पहले वाले पर निर्भर हो जैसे क्रमबद्ध सड़क दुर्घटना या फिर मनुष्य का इरादा, फिर हाथ में क़लम उठा कर उसे चलाना तथा लिखना। तो यहां पर सारे कारक एक दूसरे पर निर्भर हैं और जब सारे कारक अपना काम करेंगे तो ही लिखावट होगी। कई कारकों की एक दशा यह भी है कि कारकों का अस्तित्व ही अपने पहले वाले कारक पर निर्भर हो। यह दशा, पहली वाली दशा से भिन्न है क्योंकि पहली वाली दशा में कारक का प्रभाव अपने पहले वाले कारक के प्रभाव पर निर्भर होता है स्वयं कारक का अस्तित्व नहीं। जैसे क़लम की लिखावट मनुष्य के हाथ हिलाने पर निर्भर है किंतु स्वंय क़लम नहीं।

    इस प्रकार से यह स्पष्ट हो गया कि एक परिणाम के कई कारक संभव हैं। बल्कि यह कहें कि कुछ प्रक्रियाएं ऐसी हैं जिनके लिए कई कारकों का होना आवश्यक है। इस प्रकार से यह भी स्पष्ट हो गया कि मनुष्य जो काम करता है उसके दो कारक होते हैं एक तो मनुष्य का इरादा और दूसरे ईश्वर का इरादा किंतु मनुष्य के काम उन बहुकारक परिणामों में से हैं जिनके कारक तीसरी दशा से संबंध रखते हैं अर्थात मनुष्य के काम वह परिणाम हैं जिनके कई कारकों में से हर कारक अपने- अपने वाले कारक पर निर्भर होता है और पहले वाले कारक के बिना दूसरे कारक का अस्तित्व ही संभव नहीं है। अर्थात मनुष्य यदि कोई काम करता है तो उसका इरादा उसका कारक होता है और स्वंय मनुष्य अपने इरादे का कारक होता है और ईश्वर जिसने उसकी रचना की वह मनुष्य और उसके इरादे का कारक होता है। इस प्रकार से मनुष्य का हर काम कई कारकों का परिणाम होता है।

    यदि कोई यह समझ ले कि एक परिणाम के कई कारक होते हैं फिर उसे भाग्य और उस पर मनुष्य और ईश्वर के प्रभाव की बात भी अच्छी तरह से समझ में आ जाएगी किंतु भाग्य के बारे में पूरी बात समझने के लिए आप हमारी अगली चर्चा अवश्य पढ़िये।