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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-४ परिपूर्णता का मार्ग

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    भले इंसान की भांति जीवन व्यतीत करने के लिए सही आयडियालोजी व विचारधारा आवश्यक है। इस बात को समझने के लिए तीन बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक हैः १, मनुष्य परिपूर्णता की खोज करने वाला प्राणी है। २, मनुष्य परिपूर्णता तक कुछ ऐसे कामों द्वारा पहुंचता है जो बुद्धि से मेल खाते हों और जिनका काना या न करना उसके अधिकार में हो। ३, बुद्धि के व्यवहारिक आदेश विशेष प्रकार की वैचारिक पहचान के अंतर्गत ही संभव होते हैं जिनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण सृष्टि के आरंभ अर्थात एकेश्वरवाद की पहचान, जीवन के अंत अर्थात प्रलय में सफलता तक पहुंचाने वाले मार्ग की पहचान। दूसरे शब्दों में सृष्टि की पहचान, मनुष्य की पहचान और मार्ग की पहचान। अब आइए इन तीनों के बारे में विस्तार से बात करते हैः जो भी अपनी भावनाओं और स्वाभाविक इच्छाओं पर विचार करेगा उसे पता चल जाएगा कि इस प्रकार की बहुत सी इच्छाओं का कारण वास्तव में परिपूर्णता तक पहुंचने की भावना होती है। मूल रूप से कोई भी व्यक्ति यह नहीं चाहता कि उसके अस्तित्व में किसी प्रकार की कमी रहे। वह सदैव यह प्रयास करता है कि जितना हो सके अपनी कमियों और बुराइयों को दूर करे ताकि परिपूर्णता तक पहुंच सके और जब तक यह कमियां उसमें रहती हैं वह उन्हें दूसरों से छिपाने का प्रयास रकता है। यह इच्छा यदि सही दिशा पा जाए तो फिर भौतिक व आध्यात्मिक विकास व उन्नति का कारण बनती है किंतु यदि विशेष परिस्थितियों के कारण अपने सही मार्ग से भटक जाए तो फिर अहंकार, दिखावा, आत्ममुग्धता आदि जैसे अवगुणों का कारण बन जाती है। बहरहाल परिपूर्णता व अच्छाई की ओर रुजहान मनुष्य के अस्तित्व में नहिति एक स्वाभाविक कारक है जिसके चिन्हों को प्रायः बहुत ध्यान देकर समझा जा सकता है किंतु यदि थोड़ा से चिंतन-मनन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इसका मुख्य स्रो मनुष्य में परिपूर्णता की खोज है। पेड़-पौधों की परिपूर्णता परिस्थितियों पर निर्भर होती है और जब उसके लिए आवश्यक परिस्थितियां बन जाती हैं तो फिर बिना किसी इच्छा व अधिकार के पेड़-पौधे उगते और बढ़ते हैं। कोई भी वृक्ष न तो अपनी इच्छा से बढ़ता है और न फल देता है क्योंकि उसके पास बोध व आभास नहीं होता। अलबत्ता पशुओं के बारे में स्थिति थोड़ी भिन्न होती है। उनमें इरादा और चयन की सीमित शक्ति होती है जो वास्तव में उनकी प्राकृतिक इच्छाओं से प्रेरित होती है। पशुओं की सीमित बोध शक्ति उनके शरीर के इन्द्रीय ज्ञान पर निर्भर होती है। किंतु मनुष्य को अपने इरादे और एक प्राणी होने के नाते उसे जो योग्यताएं प्राप्त हैं उनके अलावा आत्मिक रूप से भी दो विशिष्टताएं प्राप्त हैं। एक ओर स्वाभाविक आवश्यकताओं के दायरे में उसकी स्वाभाविक इच्छाएं सीमित नहीं होतीं और दूसरी ओर उसे बुद्धि जैसी शक्ति भी प्राप्त है जिसकी सहायता से वो अपने ज्ञान का असीमित रूप से बढ़ा सकता है और इन्हीं विशिष्टताओं के कारण मनुष्य के संकल्प व इरादे की सीमा, भौतिकता को पार करते हुए अनन्त तक फैल जाती है। जिस प्रकार से पेड़-पौधे उसी समय परिपूर्ण होते हैं जब उन्हें विशेष प्रकार की ऊर्जा व शक्ति के प्रयोग का और उससे लाभ उठाने का अवसर प्राप्त हो जाए और किसी पशु की परिपूर्णता उसी समय संभव होती है जब वह अपनी इंद्रियों और स्वाभाविक इच्छाओं का पूरी तरह पालन करे। इसी प्रकार मनुष्य के लिए भी विशेष परिपूर्णता उसी समय संभव है जब मनुष्य अपनी विशेष शक्तियों अर्थात ज्ञान व बुद्धि का सही प्रयोग करे, भलाई और बुराई के विभिन्न स्तरों को पहचाने और अपनी बुद्धि द्वारा भले कर्मों में सबसे अच्छे काम का चयन कर सके। इस आधार पर एक व्यवहार उसी समय मानवीय हो सकता है जब बुद्धि के प्रयोग के साथ और विशेष मानवीय इच्छाओं के अंतर्गत हो और जो काम पशुओं की विशेषताओं के साथ अर्थात बुद्धि व बोध के प्रयोग में लाए बिना किए जाएंगे वो निश्चित रूप से पशुओं वाले व्यवहार कहलाएंगे भले ही उसे करने वाला विदित रूप से मनुष्य दिखाई दे। इसी प्रकार मनुष्य का वह काम जो स्वभाव या किसी प्रतिक्रिया के रूप में बिना किसी इरादे के किया गया हो वह केवल शारीरिक प्रक्रिया होती है। संकल्प व इरादे के साथ किया जाने वाला काम इच्छित परिणाम तक पहुंचने का एक मार्ग होता है और उसका महत्व, परिणाम और आत्मा की परिपूर्णता में उसके प्रभाव पर निर्भर करता है तो फिर यदि कोई काम किसी आत्मिक विशेषता से हाथ धोने कारण बने तो वह नकारात्मक काम होगा। इस प्रकार मानव बुद्धि, इरादे के साथ किए जाने वाले कामों के बारे में तभी निर्णय ले सकती है और उसके महत्व को उसी समय समझ सकती है जब उसे मनुष्य की परिपूर्णता के मानदंडों और चरणों का ज्ञान हो, उसे पता हो कि मनुष्य किस प्रकार का प्राणी है? उसके जीवन की परिधि कहां तक है? एक मनुष्य आध्यात्मिक दृष्टि से कितनी ऊंचाइयों तक पहुंच सकता है? दूसरे शब्दों में बुद्धि यह समझ ले कि मनुष्य के अस्तित्व के आयाम क्या हैं और उसके जन्म का उद्देश्य क्या है?इस आधार पर सही विचारधारा तक उसी समय पहुंचा जा सकता है जब विचाराधारा स्वस्थ हो और विचारधारा के अनुसरण के समय उसे जिन समस्याओं का सामना करना पड़े उसके समाधान की उसमें शक्ति हो। क्योंकि जब तक इस प्रकार की समस्याओं के समाधान की शक्ति मनुष्य में नहीं होगी उस समय तक व्यवहार अथवा किसी काम के महत्व का बोध प्राप्त करना उसके लिए कठिन होगा। इसी प्रकार जब तक लक्ष्य स्पष्ट नहीं होगा उसम समय तक उस लक्ष्य तक पहुंचने के मार्ग का पता लगाना भी संभव नहीं हो सकता। इस चर्चा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैः १ प्रत्येक मनुष्य में प्रगति की चाहत होती है और वह स्वाभाविक रूप से अपनी कमियों को छिपाने का प्रयास करता है। प्रगति की स्वाभाविक चाहत को यदि सही दिशा मिल जाए तो वह मनुष्य की परिपूर्णता का कारण बनती है अन्यथा विभिन्न प्रकार के अवगुणों को जन्म देती है। २ पेड़-पौधों की अपनी प्रगति के लिए विशेष प्रकार की परिस्थितियां और वस्तुओं की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार पशुओं की प्रगति कुछ विशेष वस्तुओं पर निर्भर होती है। मनुष्य की प्रगति भी विशेष प्रकार की है और उसके लिए बुद्धि सहित कुछ विशेष तत्वों की आवश्यकता होती है। (जारी है)