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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-५६-ईश्वरीय दूत भी मनुष्यों की भांति होता है।

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    इससे पहले हमने ईश्वरीय दूतों और उनसे संबंधित कुछ विषयों पर चर्चा की है जिससे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि चूंकि मनुष्य के पास इतना ज्ञान नहीं होता कि वह लोक व परलोक की सफलाएं अर्जित कर सके या स्वंय को लोक परलोक में सफल बना सके इसलिए ईश्वर ने यह आवश्यक समझा कि कुछ विशेष गुणों वाले अपने दासों को अपने दूतों के रूप में मानव समाज के मार्गदर्शन के लिए धरती पर भेजे ताकि वे लोगों को सही व गलत के मध्य अंतर को समझाएं और लोगों का सही मार्ग की ओर मार्गदर्शन करें ताकि लोग अपने बुरे कर्मों के लिए अज्ञानता को बहाना न बनाएं।

    हमने यह भी आपको बताया था कि किस प्रकार के लोग ईश्वरीय दूत हो सकते हैं और ईश्वर ने क्यों कुछ विशेष लोगों को ही अपना संदेश पहुंचाने के लिए चुना? इसके साथ ही हमने बताया कि किसी भी दूत की सत्यता सिद्ध करने के कई मार्ग हो सकते हैं किंतु मोजिज़ा या विशेष अर्थों में चमत्कार उसका सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।

    इससे पूर्व की चर्चा में हमने जो कुछ कहा उससे कहीं यह सिद्ध नहीं होता कि ईश्वरीय दूत को एक से अधिक होना चाहिए किंतु वास्तव में ऐसा है अर्थात ईश्वरीय दूतों की संख्या एक से अधिक थी और इसी प्रकार विभिन्न कालों और युगों में ईश्वरीय धर्म भी अलग-अलग नामों से जाने जाते थे तो प्रश्न यह है कि एसा क्यों है?

    इस संदर्भ में पहली बात तो यह है कि ईश्वरीय दूत भी एक मनुष्य होता था और उसकी सभी शारीरिक विशेषताएं मनुष्य की ही होती थी इसलिए उसकी आयु सीमित होती थीं। अब यदि ईश्वर एक ही दूत भेजता और वही आरंभ से लेकर अंत तक लोगों का मार्गदर्शन करता तो यह प्रकृति के नियमों के विपरीत होता और हम यह बता चुके हैं कि ईश्वर इस सृष्टि की स्वाभाविक प्रक्रिया को बिना किसी बहुत बड़े और असाधारण कारण के बदलता नहीं इसीलिए यदि विश्व के समस्त लोगों के लिए आरंभ से लेकर अतं तक एक ही दूत भेजता तो यह सही नहीं होता।

    वैसे भी यदि ईश्वर ऐसा करता तो यह काम, उस दूत को मानवजाति से अलग का कोई प्राणी बना देता और लोग उसे अपने जैसा और अपना न समझते तथा यह भी हो सकता है कि उसे असाधारण समझ कर भय या आतंक के कारण दबाव में आकर उसकी बात स्वीकार करें। उदाहरण स्वरूप वह पांच हज़ार वर्ष से जीवित था तो इस दशा में ईश्वर द्वारा मनुष्य के सामने भलाई व बुराई के दोनों मार्ग रखने और मनुष्य को चयन शक्ति देने जैसे सिद्धान्त भी प्रभावहीन हो जाते। यही कारण है कि हम देखते हैं ईश्वरीय दूतों ने, असाधारण शक्तियों के स्वामी होने के बावजूद, कभी भी अपनी बात मनवाने के लिए अपनी उन शक्तियों का प्रयोग नहीं किया बल्कि सदैव ही सामान्य रूप से प्रचलित शैली में लोगों को भले कर्मों और ईश्वर की ओर बुलाया है।

    दूसरी बात यह है कि ईश्वर ने क्यों अलग-अलग धर्म भेजे हैं। यदि उद्देश्य परलोक में सफलता और अनन्य ईश्वर से निकटता है तो फिर परलोक भी एक है और ईश्वर भी एक किंतु धर्म विभिन्न युगों में अलग-अलग क्यों रहे? इस संदर्भ में हम यह कहना चाहेगें कि विभिन्न युगों और परिस्थितियों में मानव समाज और मानव जीवन, समान नहीं होता बल्कि उसमें परिवर्तन आते रहते हैं इसलिए यद्यपि धर्म का उद्देश्य लोगों का लोक व परलोक संवारना और ईश्वर की निकटता प्राप्त करना होता है किंतु परिस्थितियों के अनुसार इस उद्देश्य की प्राप्ति के साधनों में परिवर्तन स्वाभाविक है।

    यह ठीक इसी प्रकार है कि जैसे आप किसी पर्यटन स्थल की यात्रा करते हैं टैक्सी से रेलवे स्टेशन जाते हैं। ट्रेन पर बैठते हैं और वहां पहुंच कर ट्रेन से उतर कर घोड़े पर बैठ कर एक पहाड़ी पर बने होटल तक जाते हैं किंतु उसके कुछ वर्षों के बाद जब आप दोबारा उसी पहाड़ी पर बने उसी होटल तक पहुंचना चाहते हैं तो घर से रेलेव स्टेशन नहीं बल्कि हवाई अड्डे जाते हैं और विमान से उतरने के बाद घोड़े या ख़च्चर पर नहीं बल्कि कार में बैठकर उस होटल तक पहुंचते हैं। दोनों यात्राओं में आप का गतंव्य एक है किंतु साधन, परिस्थितियों के कारण बदल गये, पहले वहां हवाई अडडा नहीं था इसलिए ट्रेन से गये थे, पहले वहां रोड नहीं बना था इसलिए घोड़े पर गये थे किंतु साधन बदलने का अर्थ गतंव्य बदलना नहीं होता।

    ठीक यही दशा ईश्वरीय धर्मों की है, धर्म का उद्देश्य मनुष्य का कल्याण है। हर समाज व युग के मनुष्य की अपनी आवश्यकताएं और समस्याएं होती हैं जिनका निवारण धर्म करता है। धर्म का मूल उद्देश्य यही है जो हर युग मंक एक ही होता है। भले ही समस्याएं बदलने के कारण उसके समाधान के साधन बदल जाएं किंतु इस परिवर्तन की प्रक्रिया ईश्वरीय होना चाहिए अर्थात कल्याण के साधन में परिवर्तन का अधिकार केवल ईश्वर को ही है।

    कई ईश्वरीय दूतों और उनके विभिन्न धर्मों का एक अन्य कारण यह है कि प्राचीन काल में प्रचार व प्रसास की इतनी सुविधा नहीं थी इसलिए एक ही ईश्वरीय दूत के संदेश समस्त क्षेत्रों तक नहीं पहुंच सकते थे इसके अतिरिक्त लोगों की भाषाएं और संस्कृति भी अलग अलग थी जो स्वंय किसी एक क्षेत्र विशेष के ईश्वरीय दूत के संदेश के फैलाव के मार्ग में बड़ी बाधा थी इसलिए विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग ईश्वरीय दूत भेजे गये।

    इसके अतिरिक्त एक कारण यह भी है कि ईश्वरीय दूत जब अपने धर्म का प्रचार करते थे तो उसपर पूरी निगरानी भी रखते थे अर्थात उसमें गलत बातें और अंधविश्वास को प्रभावी नहीं होने देते थे किंतु उनके निधन के बाद, धीरे-धीरे उनके लाए हुए धर्म में परिवर्तन हो जाता है और उनके अनुयाई अपने-अपने हितों के दृष्टिगत कुछ बातें बढ़ा और घटा देते हैं जिससे एक अवधि बीत जाने के बाद ईश्वरीय दूतों द्वारा लाया गया धर्म पूर्ण रूप से बदल जाता है। इसलिए पुनः ईश्वरीय दूत भेजा जाता था जो धर्म में सुधार करता था किंतु चूंकि यह परिवर्तन इतना व्यापक होता था जिससे लोगों को यह लगने लगता कि कोई नया ही धर्म आ गया है।

    इस प्रकार से ईश्वरीय दूतों की संख्या और उनके लाए हुए धर्मों में अंतर को किसी सीमा तक समझा जा सकता है किंतु इसके साथ यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक कि यदि ईश्वरीय धर्मों के इतिहास और शिक्षाओं पर दृष्टि डाली जाए तो यह सिद्ध हो जाएगा कि उन समस्त धर्मों की मूल शिक्षाओं में कोई अंतर नहीं है और इस प्रकार के सभी धर्मों से समाजिक, धार्मिक व नैतिक नियम मूल रूप से एक ही थे। उदाहरण स्वरूप, ईश्वर की उपासना सभी ईश्वरीय धर्मों में अनिवार्य है भले ही उपासना की शैली में अंतर होता है। या फिर दान दक्षिणा तथा निर्धनों की सहायता सभी ईश्वरीय धर्मों में अनिवार्य होती है किंतु उसकी शैली अलग-अलग होती है।

    प्रत्येक दशा में ईश्वरीय धर्म में विश्वास रखने वाले के लिए सभी ईश्वरीय दूतों में आस्था रखना आवश्यक है यद्यपि उसके लिए केवल अपने काल के ईश्वरीय दूत की शिक्षाओं का पालन अनिवार्य होता है। इसके साथ यह भी निश्चित है कि यदि किसी विशेष व्यवस्था के कारण, किसी ईश्वरीय दूत की शिक्षाएं अपनी मूल रूप व ढांचे के साथ सुरक्षित रहें और आगामी पीढ़ियों की समस्याओं के समाधान की क्षमता भी उसमें हो तो फिर किसी नये ईश्वरीय दूत की आवश्यकता नहीं होती है। चर्चा के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं।

    • ईश्वरीय दूत भी एक मनुष्य होता था और उसकी सभी शारीरिक विशेषताएं मनुष्य की ही होती थी इसलिए उसकी आयु सीमित होती थी। ईश्वर इस सृष्टि की स्वाभाविक प्रक्रिया को बिना किसी बहुत बड़े और असाधारण कारण के नहीं बदलता।• विभिन्न युगों और परिस्थितियों में मानव समाज और मानव जीवन समान नहीं होता इसलिए परिस्थितियों के अनुसार इस उद्देश्य की प्राप्ति के साधनों अर्थात धर्म की शिक्षाओं में परिवर्तन स्वाभाविक है।• समस्त ईश्वरीय धर्मों की मूल शिक्षाओं में कोई अंतर नहीं है और इस प्रकार के सभी धर्मों से सामाजिक, धार्मिक व नैतिक नियम मूल रूप से एक ही थे। • यदि ईश्वरीय दूत की शिक्षाएं अपने मूल रूप व ढांचे के साथ सुरक्षित रहें तो फिर किसी नये ईश्वरीय दूत या नये धर्म की आवश्यकता नहीं होती है।