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    सृष्टि ईश्वर और धर्म ५८

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    समाज के लोग विभिन्न कारणों से ईश्वरीय दूतों और उनके संदेशों का विरोध करते थे जिनमें मुख्य रूप से अंधविश्वास,अज्ञानता, प्रभाव बनाये रखने के प्रयास, अंहकार तथा मनुष्य में निरंकुशता से प्रति लगाव का वर्णन किया जा सकता है।

    ईश्वरीय दूतों के विरोध की विभिन्न शैलियां रही हैं। कुछ लोग उपहास करते थे, कुछ लोभ व धमकी का सहारा लेते किंतु कुछ लोग हिंसा पर उतर आते और उनकी हत्या कर देते थे। अब तक हमने ईश्वरीय दूतों की आवश्यकता और उन की विशेषता तथा समाज में उनके प्रति व्यवहार तथा उनके संदेश के पर लोगों की प्रतिक्रियाओं के बारे में जाना। इसके साथ ही हमने समाज के प्रति ईश्वरीय दूतों के व्यवहार पर भी संक्षिप्त चर्चा की। अब प्रश्न यह उठता है कि जब ईश्वर ने अपने दूतों को मानव समाज के कल्याण के लिए भेजा और ईश्वरीय दूतों का दायित्व यह था कि वे मनुष्य के लोक-परलोक को संवारे तो फिर ईश्वरीय दूतों के मार्ग की कठिनाइयां दूर करना भी ईश्वर के लिए आवश्यक था। अर्थात जैसा कि हम बता चुके हैं ईश्वर ने लोक-परलोक के कल्याण के लिए इस सृष्टि को अपने चिन्हों से भर दिया है और इन चिन्हों की पहचान के लिए मनुष्य को बुद्धि जैसा उपहार दिया है किंतु परिस्थितियां और वातवारण तथा कुछ अन्य कारक इस बुद्धि के सामने पर्दे डाल देते हैं इन्हीं पर्दों को हटाने के लिए ईश्वर ने अपने दूतों को मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए भेजा। इस प्रकार से ईश्वरीय दूत वास्तव में मनुष्य को कल्याण तक पहुंचाने की ईश्वरीय प्रक्रिया के पूरक हैं।

    अर्थात ईश्वर ने मनुष्य को कल्याण के द्वीप तक पहुंचने के लिए संसार की नौका दी और बुद्धि नामक पतवार भी उसे पकड़ा दिया किंतु अज्ञानता के अथाह सागर में मनुष्य बुद्धि की पतवार थामे दिशाभ्रम का शिकार न हो जाए इसलिए उसने अपने दूतों के रूप में दिशासूचक सितारे बनाए जो कल्याण के द्वीप की सही दिशा बताते हैं। इस प्रकार से हम देखते हैं कि ईश्वरीय दूतों की भूमिका कल्याण तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया में अत्याधिक महत्वपूर्ण है किंतु प्रश्न यह है कि क्या ईश्वर ने मनुष्य द्वारा ईश्वरीय दूतों को पहचानने की प्रक्रिया में उन्हें चमत्कार प्रदान करने के अतिरिक्त भी कोई भूमिका निभाई है?

    यदि हम ईश्वरीय दूतों के काल पर दृष्टि डालें और ध्यान से अध्ययन करें तो हमें यह स्पष्ट रूप से दिखाई देगा कि ईश्वर ने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं कि जिनमें लोगों को यह लगा कि उन्हें ईश्वर और उसके दूतों की आवश्यकता है क्योंकि यदि ध्यान दिया जाए तो हमें यह तथ्य स्वीकार करना पड़ेगा कि ईश्वर और धर्म के इन्कार का सबसे मुख्य कारण यह है कि मनुष्य को यह ज्ञान ही नहीं होता कि उसे हर क्षण, अनन्त शक्ति के स्रोत अर्थात ईश्वर की आवश्यकता है। यही कारण है कि बहुत से युगों में ईश्वर ने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं जिनमें अपनी समस्याओं के समाधान के लिए मनुष्यों को ईश्वर की शक्ति पर भरोसे के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नज़र नहीं आया।

    अर्थात स्पष्ट शब्दों में यदि हम कहें तो हमारी इस बात का अर्थ यह होगा कि कभी-कभी ईश्वर अपनी उपस्थिति याद दिलाने और मनुष्यों को अपनी आवश्यकता का आभास दिलाने के लिए कठिन परिस्थितियां और समस्याएं उत्पन्न करता है ताकि लोग, अज्ञानता व अनभिज्ञता के अंधकार से बाहर निकलें और इस वास्तविकता से परिचित हों कि उन्हें हर क्षण ईश्वर की आवश्यकता है। निश्चित रूप से यह मानव जाति पर ईश्वरीय कृपा का एक भाग है और यदि वह कठिनाई और समस्याएं उत्पन्न करता है तो चूंकि इसका उद्देश्य मानव जाति का कल्याण होता है इसलिए यह भी उसकी असीम कृपा का एक भाग है।

    ठीक उस पिता की भांति जो बार-बार अपना हाथ छुड़ा कर भाग जाने वाले बच्चे का हाथ, अचानक किसी अंधेरी गली में छोड़ कर छुप जाता है किंतु उस पर नज़र रखता है कि कहीं वह गुम न हो जाए या कोई गाड़ी उसे टक्कर न मार दे किंतु बच्चा जब थोड़ी देर बाद स्वंय को अकेला और अपने चारो ओर अंधेरा पाता है तो डर कर रोने लगता है और फिर जब उसका पिता अचानक उसके सामने आकर उसका हाथ पकड़ लेता है तो फिर वह घर पहुंचने तक हाथ छुड़ाने का प्रयास नहीं करता।

    तो इस प्रकार से यह स्पष्ट हुआ कि कभी-कभी उपस्थिति का महत्व दूर्शाने के लिए अनुस्थिति बन जाना प्रभावी होता है। यूं भी वस्तुओं को उनके विलोम से पहचाना जाता है। यदि अंधकार न हो तो उजाले का महत्व समझ में नहीं आता, यदि रात न हो तो दिन का महत्व सही रूप से स्पष्ट नहीं होता और रात के अंधकार में लोग दिन के उजाले की प्रतीक्षा करते हैं और दिन के उजाले में ही शांतिदायक नींद के लिए लोग रात की प्रतीक्षा करते हैं। इस प्रकार से यह स्पष्ट है कि ईश्वर एक क्षण के लिए भी मनुष्य को अकेला नहीं छोड़ता उसकी कृपा सदैव मनुष्य के साथ रहती है किंतु कभी-कभी यह कृपादृष्टि की निरतंरता, मनुष्य के भीतर ईश्वर की उपस्थिति और उसकी कृपा का आभास ही समाप्त कर देती है। जीवन और संसार में विभिन्न समस्याएं और दुख, मनुष्य को ईश्वर की याद दिलाते हैं और यह बताते हैं कि कोई है जिसने आपका हाथ छोड़ दिया है क्योंकि आप उसका आभास नहीं कर पा रहे थे। समाजों के संचालन में ईश्वर की यही परंपरा रही है। उसने अपने दूत भेजे, समस्याओं में उन्हें ग्रस्त किया और उन समस्याओं का निवारण किया। अब इस प्रक्रिया में जिन लोगों के मन में सत्य का प्रकाश पहुंच गया वह तो कल्याण तक पहुंच गये किंतु जिन लोगों ने इतनी व्यवस्थाओं और कृपाओं के बाद भी इन्कार और हठधर्मी का मार्ग अपनाया तो फिर उन्हें ईश्वरीय प्रकोप का सामना करना पड़ा और पूरे इतिहास पर नज़र डालने से हमें यह प्रक्रिया बार बार दोहराई जाती नज़र आती है।

    ईश्वरीय दूतों ने लोगों को सही मार्ग पर लाने का भरसक प्रयास किया और यह काम केवल संदेशों और प्रचारों से नहीं किया बल्कि जहां परिस्थितियां अनुकूल रहीं वहां उन लोगों ने संसारिक शक्ति भी प्राप्त की और सत्ता हाथ में लेकर, असत्य व गलत विचारधाराओं से ज़बान से ही नहीं तलवार से भी युद्ध किया और एक आदर्श समाज के गठन का प्रयास किया। अर्थात ईश्वरीय दूतों ने ईश्वरीय संदेश को मनुष्य तक पहुचांने के लिए सभी उपलब्ध व ईश्वरीय मार्ग अपनाए ताकि मनुष्य के पास इन्कार और ईश्वरीय संदेश न पहुंचने का कोई बहाना न रहे क्योंकि ईश्वर कभी किसी को अनभिज्ञता में दंड नहीं देता और न ही सारे बहाने समाप्त किये बिना किसी को उसके पापों के कारण नर्क में डालता है।

    ईश्वरीय दूतों पर अपनी चर्चा को जारी रखते हुए हम अगले कार्यक्रम में अंतिम ईश्वरीय दूत हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम पर चर्चा करेगें फिलहाल आज की चर्चा के मुख्य बिन्दुः

    • ईश्वरीय दूतों के काल पर दृष्टि डालने से यह पता चलता है कि ईश्वर ने ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं जिनमें लोगों को यह लगा कि उन्हें ईश्वर और उसके दूतों की आवश्यकता है।

    • कभी कभी लोग अज्ञानता और इस सोच के कारण कि उन्हें ईश्वर की कोई आवश्यकता नहीं है, धर्म और ईश्वर का इन्कार करते हैं जिसके बाद ईश्वर उन्हें सचेत करने के लिए समस्याएं व कठिनाइयां उत्पन्न करता है किंतु चूंकि उसका उद्देश्य मनुष्य का कल्याण होता है इसलिए यह भी उसकी कृपा का भाग है।

    • ईश्वरीय दूतों ने मनुष्य को ईश्वरीय मार्ग दिखाने और उन्हें कल्याण तक पहुंचाने के लिए सभी उपलब्ध व ईश्वरीय मार्गों का प्रयोग किया और इसके लिए उन्होंने यदि परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो सत्ता का प्रयोग भी किया है और असत्य के विरुद्ध तलवार से भी युद्ध लड़े हैं।