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    सृष्टि ईश्वर और धर्म- 63

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    इस्लामी इतिहास का ज्ञान रखने वालों को पता है कि इस ग्रंथ की सुरक्षा के बारे में ईश्वरीय मार्गदर्शकों और शासकों तथा मुसलमानों में अत्याधिक संवेदनशीलता पाई जाती है इसी लिए वे बड़ी सरलता से इस बात पर विश्वास कर लेगा कि कुरआन में कुछ बढ़ाया या घटाया नहीं गया है

    कुरआन में जिस प्रकार के शब्दों का चयन किया गया है और जिन वाक्यों का प्रयोग किया गया है उनसे मिल कर कुरआन का ढांचा बना किंतु स्पष्ट रूप से दिखायी देने वाले ढांचे के साथ ही कुरआन के अर्थों का भी एक अदृश्य ढांचा है जो शब्दों में किसी भी प्रकार के फेर बदल से बिगड़ सकता है।

    इतिहासिक तथ्यों के आधार पर किसी ने कुरआन में फेर बदल करने या कुछ घटाने अथवा बढ़ाने का दावा नहीं किया है और न ही इसका कोई प्रमाण है।

    और अब आज की चर्चा

    अब तक की चर्चाओं में हमने पैग़म्बरे इस्लाम, क़ुरआन तथा अन्य विषयों पर चर्चा की थी आज पैग़म्बरे इस्लाम के लाए हुए धर्म पर एक संक्षिप्त सी चर्चा करेंगे। इस संदर्भ में सब से पहला प्रश्न यह उठता है कि क्या पैग़म्बरे इस्लाम का संदेश विश्व के सभी समुदायों के लिए था या फिर अरब के क्षेत्र से ही विशेष था या इससे भी कम केवल उनके क़बीले और परिजनों के लिए था।

    यह तो स्पष्ट है कि इस विषय को पूर्ण रूप से बौद्धिक तर्कों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता किंतु स्वंय पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों और क़ुरआन की आयतों से यह सिद्ध होता है कि इस्लाम का संदेश विश्व के किसी विशेष क्षेत्र के लिए नहीं था। इसके अतिरिक्त बहुत से एसे इतिहासिक प्रमाण भी हैं जिनसे यह तथ्य सिद्ध होता है उदाहरण स्वरूप इस्लाम का प्रचार आंरभ करने के कुछ ही दिनों बाद पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने रोम और ईरान के साम्राटों को पत्र लेकर अपना संदेश स्वीकार करने का निमंत्रण दिया। इस प्रकार के बहुत से पत्रों पर आधारित एक पुस्तक भी लिखी गयी है और वह सारे पत्र आज भी मौजूद हैं।

    इसके साथ ही कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इस्लाम कुछ विशेष समुदायों के लिए था और चूंकि पैग़म्बरे इस्लाम के काल में उस क्षेत्र के ईसाई व यहूदी समुदाय को मान्यता दी गयी थी और वे इस्लामी सरकार के अंतर्गत रहते थे इस लिए इससे यह सिद्ध होता है कि पैग़म्बरे इस्लाम इन धर्मों को औपचारिक रूप से स्वीकार करते थे और इसी लिए उन्हों ने इस्लाम के अतिरिक्त अन्य धर्मों के अनुयाइयों के साथ भी लेन देन किया और उन्हें अपनी सरकार के अंतर्गत जीवन व्यतीत करने की अनुमति दी।

    किंतु इस शंका के उत्तर में यह कहा जा सकता है कि यह सही है कि जब अरब जगत में इस्लाम फैल गया और पूरे अरब में इस्लाम व्यवस्था लागू हो गयी तो उस दौरान इस क्षेत्र में बहुत से ईसाई व यहूदी समूदाय के लोग रहते थे और इस्लामी सरकार से उनका लेनदेन जारी रहता था किंतु इस का यह अर्थ कदापि नहीं है कि इस्लाम धर्म में या पैग़म्बरे इस्लाम ने इन धर्मों को सही माना था।

    निश्चित रूप से इस्लाम में ईसाई और यहूदी धर्म को ईश्वरीय धर्म माना जाता है किंतु इस्लाम के अनुसार, इन धर्मों के अनुयाइयों ने अपने ईश्वरीय दूतों की शिक्षाओं में अत्याधिक फेर बदल कर दिया जिसके बाद ही पैग़म्बरे इस्लाम ने नये धर्म का प्रचार किया किंतु यदि उस काल के बहुत से अरब यहूदी या ईसाई अनुयाइयों ने पैग़म्बरे इस्लाम के संदेश को स्वीकार नहीं किया तो इस्लाम चूंकि शांति व सुरक्षा का धर्म था इस लिए उन लोगों को अपने धर्म पर रह कर इस्लामी सरकार को कर देने की शर्त पर इस्लामी क्षेत्रों में रहने की अनुमति दी गयी अलबत्ता उनसे लिया जाने वाले कर के बदले में पैग़म्बरे इस्लाम की इस्लामी सरकार ने, उनकी रक्षा और सरकारी सुविधाएं देने का दायित्व स्वीकार किया था। क्योंकि उस काल की इस्लामी सरकार में सरकारी, कर नहीं था बल्कि ज़कात रूपी धार्मिक कर मुसलमानों से लिया जाता था किंतु ईसाईयों या यहूदियों से यह कर नहीं लिया जा सकता था क्योंकि वे मुसलमान नहीं थे और ज़कात मुसलमानों के लिए अनिवार्य कर था इस लिए उनसे सरकारी कर के रूप में कुछ रक़म ली जाती थी।

    इस प्रकार से हम देखते हैं कि यदि पैग़म्बरे इस्लाम की सरकार में यहूदी व ईसाई तथा अन्य धर्मों के मानने वाले रहते थे तो इसका कदापि यह अर्थ नहीं है कि उनके धर्म को सही समझा जाता था बल्कि इसका अर्थ यह है कि पैग़म्बरे इस्लाम की सरकार में, धर्म के चयन की उनके मूल अधिकार को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया था और शक्ति व सेना होने के बावजूद उनसे यह नहीं कहा गया कि या तो इस्लाम धर्म स्वीकार करो या फिर यह क्षेत्र छोड़ कर चले जाओ।

    इस संदर्भ में हम मक्का नगर पर मुसलमानों के अधिकार की घटना की ओर संकेत कर सकते हैं। वास्तव में पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने धर्म का प्रचार मक्का नगर से आरंभ किया था किंतु वहां के लोगों ने उनके मार्ग में इतनी समस्याएं उत्पन्न की और उनके अनुयाइयों को इतनी यातनाएं दीं कि उन्हें मक्का छोड़ कर मदीना नगर पलायन करना पड़ा किंतु उसके बाद भी मक्का में उनके शत्रुओं ने कई बार मदीना नगर पर आक्रमण किया और अन्ततः एक निर्णायक लड़ाई में मक्का वासियों को पराजय का सामना करना पड़ा और मक्का पर पैग़म्बरे इस्लाम का अधिकार हो गया किंतु अधिकार के बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने घोषणा कर दी कि जो भी अपने घर की चहारदीवारी के अंदर रहेगा उसके कोई हानि नहीं पहुंचाई जाएगी उसके बाद सब बंदी बनाए गये सैनिकों और उनके कमांडरों को पैग़म्बरे इस्लाम के सामने पेश किया गया तो उन्हों ने उन सब से कहा कि जाओ तुम सब स्वतंत्र किये जाते हो।

    इसी प्रकार बहुत से युद्धों में बंदी बनाए जाने वालों के लिए पैग़म्बरे इस्लाम यह शर्त रखते थे कि एक या दो मुसलमान को शिक्षित करने के बदले उन्हें रिहा कर दिया जाएगा और एसा ही करते थे इस प्रकार से हम देखते हैं पैग़म्बरे इस्लाम की पूरी जीवनी दया व कृपा से भरी है इसी लिए उन्हें क़ुरआन में पूरी सृष्टि के लिए कृपा कहा गया है तथा स्वंय पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा है कि मुझे नैतिक गुणों को परिपूर्ण करने के लिए भेजा गया है।

    इसके अतिरिक्त क़ुरआन मजीद में बार बार सम्पूर्ण मानव जाति को संबोधित किया गया है जो स्वंय इस बात का प्रमाण है कि इस्लाम सर्वव्यापी और सर्वकालिक है अलबता हमारे कार्यक्रमा का यह विषय नहीं है बल्कि हमारी इस चर्चा में मूल रूप से धर्म की बात की जाती है और यह बताने का प्रयास किया जाता है कि धर्म का महत्व क्या है और मानव जीवन में ईश्वर में आस्था और धर्म आवश्यक है किंतु ईश्वर के अस्तित्व से आरंभ होने वाली हमारी चर्चा अब पैग़म्बरे इस्लाम और उनके लाए हुए धर्म तक पहुंची है हम अगले कार्यक्रम में इस बात पर चर्चा करेंगे कि क्यों मुसलामन यह कहते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम अंतिम ईश्वरीय दूत हैं और उनके बाद कोई ईश्वरीय दूत नहीं बनाया गया तथा ईश्वरीय दूतों को भेजने का क्रम समाप्त क्यों हो गया और यह कि उसके बाद मानव जाति के मार्गदर्शन की क्या व्यवस्था की गयी किंतु फिलहाल हमारी आज की चर्चा के मुख्य बिन्दु

    यह कहना सही नहीं है कि पैग़म्बरे इस्लाम का संदेश केवल एक क्षेत्र से विशेष था क्योंकि इतिहासिक तथ्यों से यह सिद्ध होता है कि उनका संदेश पूरी मानव जाति के लिए था।

    यदि पैग़म्बरे इस्लाम के काल में कुछ अन्य धर्मों के लिए सरकार के साथ लेन देन करते थे तो इसका अर्थ यह नहीं है कि पैग़म्बरे इस्लाम उन धर्मों की सत्यता को औपचारिक रूप से स्वीकार करते थे बल्कि इसका अर्थ यह है कि वे धर्म के चयन में मनुष्य के मूल अधिकार में विश्वास रखते थे।(ak)