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    सृष्टि ईश्वर और धर्म 68

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    हम यह बता चुके हैं कि संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं एक वह जो इसी संसार को सब कुछ समझते हैं और दूसरे वह जो इस संसार के बाद भी अन्य लोक में विश्वास करते हैं और निश्चित रूप से इन दोनों प्रकार के लोगों के व्यवहार उनके विश्वास से प्रभावित होते हैं। मनुष्य की इन दोनों प्रकार की विचारधाराओं के प्रभाव को उनके व्यक्तिगत जीवन पर ही नहीं बल्कि उनके सामाजिक जीवन तथा अन्य लोगों के उनके व्यवहारों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

    अर्थात जो लोग यह विश्वास रखते हैं कि इस संसार के बाद भी एक लोक है जहां कर्मों का हिसाब देना होगा तो उसका व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन भिन्न होता है। इस प्रकार का व्यक्ति इस ससांर को ही सब कुछ और मृत्यु को हर चीज़ का अंत नहीं समझता बल्कि इस संसार को, अनन्त परलोक तक जाने का मार्ग समझता है तो एसा व्यक्ति अपनी कार्यशैली एसी रखता है जो उसे अनन्त कल्याण तक पहुंचा दे और एसे काम करने का प्रयास है जो उस लोक में लाभ पहुंचाए। दूसरी ओर संसार के दुख व कठिनाइयां उसे निराश भी नहीं करतीं और न ही इस से कल्याण व सफलता की प्राप्ति में उसके प्रयास रूकते हैं।

    वास्तव में परलोक में विश्वास तथा सदैव रहने वाले दंड व प्रतिफल में विश्वास इस बात का कारण बनता है कि एसा मनुष्य अन्य लोगों के अधिकारों पर ध्यान दे और आवश्यकता रखने वालों की सहायता करे, त्याग व बलिदान करे और यही कारण है कि जिस समाज में इस प्रकार का विश्वास होता है वहां न्याय की स्थापना और शोषितों के अधिकारों की रक्षा तथा क़ानून लागू करने के लिए अपेक्षाकृत कम बल प्रयोग की आवश्यकता पड़ती है और स्वाभाविक रूप से यदि यह भावना व विश्वास विश्व व्यापी हो जाए तो निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय समस्याओं में असाधारण रूप से कमी आएगी ।

    क़यामत या प्रलय वास्तव में परलोक का पहला ठिकाना और हिसाब किताब का स्थान है और प्रलय पर विश्वास का महत्व इसी लिए अधिक है क्योंकि यह मात्र धार्मिक विषय नहीं है बल्कि इस पर विश्वास मनुष्य के व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है। यही कारण है कि यदि हम यह कहें कि केवल ईश्वर व धर्म पर विश्वास अकेले ही मानव जीवन को सही दिशा देने में सक्षम नहीं है बल्कि क़यामत और प्रलय के दिन पर विश्वास भी आवश्यक है तो ग़लत नहीं होगा। और यही कारण है कि समस्त ईश्वरीय धर्मों में कर्मों के हिसाब के लिए एक विशेष दिन पर बल दिया है यद्यपि उसे अलग अलग नामों से याद किया गया है।

    यह भी एक वास्तविकता है कि परलोक के जीवन पर विश्वास उसी दशा में मानव जीवन को सही रूप से दिशा देने में प्रभावी हो सकता है जब इस संसार के कर्मों को उस लोक में फल पाने का साधन समझा जाए और कम से कम परलोक की सुखों और दंडों को इस लोक के अच्छे व बुरे कर्मों का परिणाम माना जाए। अर्थात परलोक पर विश्वास हमारी जीवन धारा को उसी दशा में बदलने की क्षमता रखता है जब हम यह मानें कि इस संसार के हमारे कर्मों और उस लोक में मिलने वाले प्रतिफल के मध्य एक अटूट संबंध है। और कोई यह न समझे कि जिस प्रकार इस लोक के सुखों को इसी लोक में प्रयास करके प्राप्त किया जाता है उसी प्रकार परलोक के सुखों को भी परलोक में ही प्रयास द्वारा प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि यदि एसा होगा तो फिर इस संसार में भले कर्मों का आकर्षण और बुरे कर्मों की चिंता समाप्त हो जाएगी। यही कारण है कि क़यामत या प्रलय तथा परलोक के जीवन के बारे में चर्चा से पूर्व यह विश्वास आवश्यक है कि लोक व परलोक के मध्य संबंध है।

    वास्तव में यदि मनुष्य इस संसार में सही मार्ग का चयन करना चाहता है और यह चाहता है कि उसका कल्याण हो तो सब से पहले उसे इस बात का पूरी गहरायी से विचार करना चाहिए कि क्या जीवन मृत्यु के साथ समाप्त हो जाता है या उसके बाद भी जीवन रहेगा। वास्तव में जो लोग परलोक पर विश्वास रखते हैं उनका यह मानना है कि यह संसार एक नगर है, मृत्यु यात्रा और परलोक वह गतंव्य है जिस तक हम सब को पहुंचना है इस लिए उस नगर में जिन वस्तुओं की आश्यकता होगी उसे अपने साथ ले जाना आवश्यक है।

    हम क़यामत और परलोक पर विश्वास को एक साधारण से उदाहरण द्वारा सिद्ध कर सकते हैं। जो लोग परलोक में विश्वास रखते हैं वह तो रखते हैं और परलोक के लिए तैयार भी करते हैं उसी व्यक्ति की भांति जिसे यह पता होता है कि वह जिस नगर या क्षेत्र में जा रहा है वहां कौन कौन सी वस्तुओं की आवश्यकता होगी किंतु जिसे विश्वास नहीं है और जो यह मानता है कि जीवन मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाता है और मृत्यु के बाद कोई लोक नहीं है और न ही परलोक में जीवन की बात सही है तो बुद्धि के अनुसार एसे व्यक्ति को भी परलोक के लिए कर्म करना चाहिए क्योंकि यदि परलोक में विश्वास रखने वालों की बात सही हुई तो उसके पास तैयारी पूरी रहेगी और यदि ग़लत हुई तो उसका कोई नुक़सान नहीं होगा । ठीक उस व्यक्ति की भांति जो किसी एसे क्षेत्र में जा रहा हू जहां के बारे में उसे पूर्ण रूप से ज्ञान नहीं है, यात्रा की तैयारी के समय यदि कोई उससे यह कहता है कि तुम जिस क्षेत्र में जा रहे हो वहां कई सौ किलोमीटर तक पानी नहीं है और यदि तुम अपने साथ पानी नहीं ले जाए तो मर सकते हो तो यदि यात्रा पर जाने वाला व्यक्ति बुद्धिमान होगा तो वह थोड़ा सा पानी अपने साथ अवश्य रख लेगा भले ही उसे उस कहने वाले व्यक्ति की बात पर भरोसा न हो क्योंकि यदि उसकी बात गलत होगी और जहां वह जा रहा है वहां पानी मिल रहा होगा तो वह अपने साथ लाया हुआ पानी फेंक देगा और इससे उसे कोई हानि भी नहीं होगी किंतु यदि वह उसकी बात सुनने के बाद भी अपने साथ पानी न लाया होगा और उसकी बात सही होगी तो फिर उसका जीवन ख़तरे में पड़ जाएगा।

    परलोक के बारे में भी मनुष्य इसी प्रकार से सोच सकता है कि परलोक के बारे में इतने लोगों को विश्वास है और यह कहा जाता है कि अच्छे कर्म करने वाले को स्वर्ग और बुरे कर्म करने वाले को नर्क मिलेगा तो फिर यदि कोई बुद्धिमान है तो वह इस संसार में भले कर्म करेगा क्योंकि परलोक की बात कहने वाले यदि सच्चे हुए तो उसे लाभ ही लाभ होगा और यदि झूठे हुए तो भी उसे कोई हानि नहीं होगी क्योंकि संसार में उसने अच्छे कर्म किये जिससे लोग उससे प्रसन्न रहे और उसे एक अच्छे व्यक्ति के रूप में जाना गया। किंतु यह भी एक वास्तविकता है कि इस यात्रा पर निकलने के सही मार्ग और गतंव्य का ज्ञान भी आवश्यक है। {