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    सृष्टि ईश्वर और धर्म-८० ईमान क्या है?

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    वास्तव में ईमान का अर्थ विश्वास होता है अर्थात किसी विषय या वस्तु या अर्थ पर विश्वास और चूंकि ईमान और विश्वास अर्थ की दृष्टि से समान हैं इस लिए निश्चित रूप से ईमान उसी वस्तु या अर्थ पर हो सकता है जिस पर हमें पूर्ण रूप से विश्वास हो। इस लिए ईश्वर और धर्म पर विश्वास होने की दशा में ही हम धार्मिक हो सकते हैं क्योंकि विश्वास उसी समय हो सकता है जब उसमें किसी भी प्रकार की शंका न हो और यह एसी वस्तु है जिसका स्वंय मनुष्य को ज्ञान होता है अलबत्ता यह भी एक वास्तिवकता है कि विश्वास के लिए यह आवश्यक नहीं है कि जिस वस्तु पर विश्वास हो वह हर दशा में सत्य ही होगी क्योंकि विश्वास वास्तव में एक प्रकार की मनोदशा है जो किसी भी मनुष्य में विभिन्न कारणों से उत्पन्न होती है किंतु इसके साथ यह हर दशा में आवश्यक है कि मनुष्य को जिस बात पर विश्वास हो, उस संदर्भ में उसकी समस्त इंद्रियां उसकी पुष्टि करती हों।

    उदाहरण स्वरूप विश्व में इतने धर्म हैं और उन सब धर्मों के करोड़ों लोग मानने वाले हैं, सब की बातें अलग अलग हैं विचारधाराएं भिन्न हैं धार्मिक शिक्षाएं अलग अलग हैं किंतु हर एक को अपने अपने धर्म पर विश्वास है जब कि यह तो निश्चित है कि सारे धर्म और सारी विचारधाराएं सही नहीं हो सकतीं क्योंकि परलोक में कल्याण और ईश्वर से निकटता एसा गंतव्य है जिसकी ओर एक समय में एक ही मार्ग जाता है और जो उस मार्ग को खोजने में सफल हो गया वही परलोक में सफलता के गतंव्य तक पहुंच सकता है।

    इस प्रकार से हम इस बात से बहुत अधिक सहमत नहीं है कि सारे धर्म एक हैं और सारे मार्ग ईश्वर की ओर जाते हैं बस रास्ते अलग अलग हैं यद्यपि यह कथन बहुत अधिक प्रसिद्ध है और बहुत से लोगों को इस में पूर्ण विश्वास भी है किंतु यहां पर यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि धर्म और परलोक में कल्याण, एसा महत्वपूर्ण लक्ष्य है जिसकी राह में बाधाएं विभिन्न रूप में बहुत अधिक हैं इस लिए यद्यपि संभव है ईश्वर तक पहुंचने और परलोक में सफलता का एक से अधिक मार्ग हो किंतु चूंकि हमारे लिए यह राह अंजानी है इस लिए तार्किक रूप से हमें उसी मार्ग का चयन करना चाहिए जिसके सही होने की पुष्टि एसे मार्गदर्शक करते हों जिन्हें परलोक व ईश्वर के संबंध में ठोस ज्ञान हो और उनके ज्ञान की पुष्टि ईश्वर ने की हो।

    उदाहरण स्वरूप हमें किसी दुर्गम चोटी पर विजय प्राप्त करने का केवल एक अवसर मिले और हम जब उस पहाड़ के नीचे, ऊपर चढ़ने की तैयारी कर रहे हों तो हमें निश्चित रूप से ऊपर जाने के कई मार्ग नज़र आएंगे और नीचे से देखने में यही लगेगा कि यह सारे मार्ग ऊपर की ओर और चोटी तक जा रहे हैं किंतु यदि हम किसी एसे व्यक्ति को पहचानते हों जो उसी पहाड़ी क्षेत्र का रहने वाला हो और कई बार उस चोटी पर जा चुका हो तो हमारा यही प्रयास होगा कि हम उससे पूछें कि नज़र आने वाले कई मार्गों में से कौन सा मार्ग चोटी तक सुरक्षित पहुंचा सकता है और इसके लिए हम अपनी यात्रा में विलंब भी कर सकते हैं क्योंकि देर से पहुंचना, न पहुंचने के अच्छा है और जब वह हमें किसी मार्ग का पता बता दे तो फिर हम कदापि अन्य लोगों की बातों पर ध्यान नहीं देंगे जो यह कह रहे होंगे कि हर मार्ग चोटी तक जाता है।

    इसी प्रकार धर्म और परलोक के मार्ग के चयन में भी हमें सब से पहले तो यह समझ लेना चाहिए कि इस संसार में हमें एक ही बार आने का अवसर मिला है और यह अवसर बार बार मिलने वाला नहीं है इसी लिए जीवन रूपी परलोक के इस मार्ग में हम कर्म द्वारा अपने जिस गंतव्य का चयन करते हैं उसके बारे में हमें सब से पहले जानकारी प्राप्त करनी चाहिए और जानकारी के लिए सब से पहले यह आवश्यक है कि हम विश्वस्त स्रोत की खोज करें और जब स्रोत की विश्वस्नीयता का पता चल जाए तब हम यह देखें कि उस विश्वस्त स्रोत ने परलोक की सफल यात्रा के लिए कौन सा मार्ग सुझाया है।

    विश्व में फैले हुए धर्मों पर यदि हम दृष्टि डालें तो हमें दो प्रकार के धर्म नज़र आएंगे। कुछ धर्म एसे हैं जिनमें आधार, तर्क व बुद्धि है और कुछ अन्य धर्म एसे हैं जिनका आधार, उन धर्मों के संस्थापको के कथन मात्र हैं। अर्थात बहुत से धर्म एसे होते हैं कि जो भी आरंभ में उस धर्म की शिक्षाओं को सुने तो वह शिक्षाएं उसे बुद्धि के अनुसार लगेंगी किंतु कुछ अन्य धर्म की शिक्षाएं बुद्धि के आधार पर नहीं होतीं और उन पर आंख मूंद कर केवल विश्वास करने को कहा गया होता है।

    जैसा कि हमने कहा, सच्चा ईमान वही होता है जिसमें बुद्धि भी शामिल हो अर्थात बुद्धि उस विश्वास की पुष्टि करे उदाहरण स्वरूप यदि हमसे यह कहा जाएगा कि दो और दो चार होते हैं तो निश्चित रूप से हम कहने वाले की बात पर विश्वास करेगें किंतु इसके साथ ही हमारी बुद्धि भी इस बात की पुष्टि करेगी किंतु यदि हम किसी से अत्यधिक आस्था रखते हों और वह कहे कि दो और दो पांच होते हैं और यह धर्म का आदेश है तो फिर भी हम उसकी बात स्वीकार कर लेंगे किंतु स्वीकार करने का कारण आस्था और कहने वाले के प्रति हमारा विश्वास होगा यद्यपि हमारी बुद्धि कभी यह स्वीकार नहीं करेगी।

    इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि सच्चा विश्वास व सही ईमान वही होता है जिसमें शंका न हो, जिसकी हमारी मनोदशा व बुद्धि पुष्टि करती हो और जो किसी के आदेश पर न हो बल्कि स्वेच्छा से हो। ईश्वर पर ईमान और उसके प्रति विश्वास भी इसी प्रकार है यदि कोई किसी के कहने पर ईश्वर पर विश्वास करता है तो निश्चित रूप से धर्म में विश्वास करने वालों में गिना जाएगा किंतु उसका ईमान व विश्वास पूर्ण और सच्चा नहीं होगा क्योंकि ईमान, मनोदशा है और मनोदशा की रचना यदि तार्किक चरणों के गुज़रने के बाद हो तभी स्थायी व विश्वस्त होती है और परलोक की सफलता में सहायक सिद्ध होती है अन्यथा वह एक भ्रांति से अधिक नहीं होगी और भ्रांति किसी भी दशा में किसी को लाभ नहीं पहुंचा सकती।

    चर्चा के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं ः

    वास्तव में ईमान का अर्थ विश्वास होता है अर्थात किसी विषय या वस्तु या अर्थ पर विश्वास और चूंकि ईमान और विश्वास अर्थ की दृष्टि से समान हैं इस लिए निश्चित रूप से ईमान उसी वस्तु या अर्थ पर हो सकता है जिस पर हमें पूर्ण रूप से विश्वास हो। धर्म और परलोक में कल्याण, एसा महत्वपूर्ण लक्ष्य है जिसकी राह में बाधाएं विभिन्न रूप में बहुत अधिक हैं इस लिए तार्किक रूप से हमें उसी मार्ग का चयन करना चाहिए जिसके सही होने की पुष्टि एसे मार्गदर्शक करते हों जिन्हें परलोक व ईश्वर के संबंध में ठोस ज्ञान हो। ईमान, मनोदशा है और मनोदशा की रचना यदि तार्किक चरणों के गुज़रने के बाद हो तभी स्थायी व विश्वस्त होती है और परलोक की सफलता में सहायक सिद्ध होती है अन्यथा वह एक भ्रांति से अधिक नहीं होगा।